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sab se bada dan kon sa he? kanyadan. gau dan. rakt dan. ya. ann ka dan.

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  • शिव दास

    दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे।
    देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्।।17/20

    दान देना ही कर्तव्य है ऐसा मानकर अनुपकारी को(जिसने हम पर उपकार नहीं किया अर्थात उपकार के प्रति की गई सहायता प्रतिफल है दान नहीं) उचित स्थान पर,उचित समय में तथा उचित पात्र(जरूरतमंद व्यक्ति)को जो दान दिया जाता है बिना फल की इच्छा के वह दान सात्विक कहा गया है।

    यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुन:।
    दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम।।21/17

    किन्तु जो (दान) क्लेशपूर्वक और प्रत्युपकार के लिये अथवा फल-प्राप्ति का उद्देश्य बनाकर फिर दिया जाता है, वह दान राजस कहा जाता है।

    अदेशकाले यद्दानम् अपात्रेभ्यश्च दीयते।
    असत्कृतम् अवज्ञातम् तत्तामसमुदाहृतम्।।22/17

    जो दान बिना सत्कार के तथा अवज्ञापूर्वक अयोग्य देश (स्थान)और काल (समय)में कुपात्रको दिया जाता है, वह (दान) तामस कहा गया है।
    गऊदान और कन्यादान बहुत बड़े हैं किन्तु ज्ञान दान सर्वोत्तम हैं। अन्न से पेट भरता है,रक्त दान जीवन रक्षा करता है,गऊदान और कन्यादान बहुत बड़े हैं किन्तु ज्ञान मनुष्य को मोक्ष की ओर ले जाता है यदि कोई मोक्ष न चाहे तो भक्ति भी पा सकता है ।ज्ञान का तात्पर्य यहाँ अध्यात्म ज्ञान से है सांसारिक वस्तुओं के ज्ञान से नहीं।आध्यात्मिक ज्ञान से रहित मनुष्य प्राकृत कहलाता है। आध्यात्मिक ज्ञान वह मार्ग है जिसकी सहायता से आप परमात्मा को जान सकते हैं ,समझ सकते हैं, उन्हें प्राप्त कर सकते हैं। हम आत्मा हैं, अविनाशी,आयु रहित,रोगरहित,अत्यंत,सूक्ष्म हैं।शरीर नाशी है हम नहीं।परमात्मा सर्वत्र हैं, सब के भीतर भी वहीं हैं।परमात्मा एक अथाह सागर हैं जिनकी हम बूंदे हैं जैसे प्रत्येक बूँद में जल है ऐसे ही प्रत्येक सजीव-निर्जीव में परमात्मा हैं।यह ही जन्म कर्मयोनि है जिसमे आप परमात्मा को पाने का कर्म कर सकते हैं अन्य योनियाँ तो भोग योनि हैं।कोई भी मनुष्य कभी भी कर्म कर ही नहीं सकता,बिना कर्म किये मनुष्य एक क्षण भी नहीं रह सकता इत्यादि ज्ञान है जब कोई मनुष्य इस ज्ञान में स्थित हो जाता है तो वह स्वत: ही परमात्मा को प्राप्त हो जाता है इन आध्यात्मिक ज्ञान से लोगों को अवगत कराना ही ज्ञानदान है । यदि आप तामस दान को 1 मानते हैं तो राजस दान 10 के समान है यदि आप राजस दान 10 मानें तो सात्विक दान 100 के समान है इस प्रकार तीनों प्रकारों के दान में अंतर है। आप गीता पढ़िये क्योंकि ये ज्ञान स्वरूप हैं जब आप लोगों से इसके विषय मे चर्चा करेंगे उन्हें इनके ज्ञान से अवगत कराएंगे तो उनके प्रति किया गया आपका ये ज्ञानदान होगा। आप अन्य दान करें तो भी आपको सात्विक भाव से करना चाहिए तब उनके आपको सात्विक फल मिलेंगे।
    य इदं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति।
    भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशय:।।68/18

    मुझमें पराभक्ति करके जो इस परम गोपनीय संवाद (गीताग्रन्थ) को मेरे भक्तोंमें कहेगा, (वह) मुझे ही प्राप्त होगा— इसमें कोई सन्देह नहीं है।

    न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तम:।
    भविता न च मे तस्मादन्य: प्रियतरो भुवि।69/18

    उसके समान मेरा अत्यन्त प्रिय कार्य करने वाला मनुष्यों में कोई भी नहीं है और इस पृथ्वी पर उसके समान मेरा दूसरा कोई प्रियतर होगा भी नहीं।

    अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयो:।
    ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्ट: स्यामिति मे मति:।।70/18

    जो मनुष्य हम दोनों के इस धर्ममय संवाद का अध्ययन करेगा, उसके द्वारा भी मैं ज्ञानयज्ञ से पूजित होऊँगा— ऐसा मेरा मत है।
    इन सब कारणों से मुझे ज्ञानदान श्रेष्ठ लगता है। शिव शिव शिव

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