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swarag narak

inshan ke dwra kiya gaya karam ka fal puthvi lok me hi milta he ya upar swarg narak jesa kus he???

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  • शिव दास

    यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत्।
    तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिपद्यते॥ १४॥

    जिस समय सत्त्वगुण बढ़ा हो, उस समय यदि देहधारी मनुष्य मर जाता है तो वह उत्तमवेत्ताओं के निर्मल लोकों में जाता है।(यह निर्मल लोक स्वर्ग तथा अन्य उनसे भी ऊँचे लोक हैं)
    रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते।
    तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते॥ १५॥

    रजोगुण के बढऩे पर मरने वाला प्राणी कर्मसंगी मनुष्ययोनि (पृथ्वीलोक में मनुष्य बनता है)में जन्म लेता है तथा तमोगुण के बढऩे पर मरने वाला मूढ़ योनियों में (पशुयोनि)जन्म लेता है।
    कर्मण: सुकृतस्याहु: सात्त्विकं निर्मलं फलम्।
    रजसस्तु फलं दु:खमज्ञानं तमस: फलम्॥ १६॥

    विवेकी पुरुषों ने— शुभ कर्म का तो सात्त्विक निर्मल फल कहा है, राजस कर्म का फल दु:ख कहा है और तामस कर्म का फल अज्ञान (मूढ़ता) कहा है।

    कर्मों के फल पशु योनि और मनुष्य योनि तथा देव योनि में मिलते ही हैं चाहे कर्म फल शुभ हो या अशुभ।परंतु अत्यधिक अशुभ कर्मों के फल शीघ्रता से देने हेतु नर्क और शुभ कर्मों के फल शीघ्रता से देने हेतु स्वर्ग की स्थापना स्वयं परमात्मा द्वारा की गई है।इसलिए कुछ फल वहां मिलते हैं तो कुछ फल जन्म लेने के बाद।

    आपके फल आपका पीछा कभी नहीं छोड़ते आप कई ऐसे कर्मों के फल इस जन्म में भोग रहे होंगे जो आपके कई जन्मों पहले के कर्म से उत्पन्न हैं। मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
    मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे॥ ६५॥
    (तू) मेरा भक्त हो जा, मुझमें मनवाला (हो जा), मेरा पूजन करनेवाला (हो जा और) मुझे नमस्कार कर। (ऐसा करनेसे तू) मुझे ही प्राप्त हो जायगा (—यह मैं) तेरे सामने सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ; (क्योंकि तू) मेरा अत्यन्त प्रिय है। सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
    अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच:॥ ६६॥
    सम्पूर्ण धर्मोंका आश्रय छोड़कर (तू) केवल मेरी शरणमें आ जा। मैं तुझे सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त कर दूँगा, चिन्ता मत कर। अत: परमात्मा के शरण होने पर वे हमें पाप पुण्य दोनो से मुक्त कर देते हैं और उनकी दया से हम जन्म मरण चक्र से मुक्त हो जाते हैं।शिव शिव शिव...

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