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Devendra Pratap Singh

Ye sapna kyu aate hai aur acche bure sapno mai kya antar hai

Ye sapna kyu aate hai aur acche bure sapno mai kya antar hai

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  • Om Prakash Sahuशृद्धालु

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    सपने दो प्रकार के होते है

    1 सामान्य स्वप्न

    2 अन्य स्वप्न

    हम यहां दूसरे सपने के बारे में बात करेंगे

    कुछ सपने ऐसे होते हैं जिसे हमें संकेत रूप में देवता, महापुरुष या अन्य पारलौकिक शक्तियाँ दिखाती हैं।

    ऐसे सपने जो हमारे हित का संकेत करें अच्छे सपने हैं किन्तु जिससे हमारे अनिष्ट होने के विषय मे बताया जाए बुरे सपने हैं।

    सपने संकेत मात्र हैं जब हमारे हित का संकेत हो तो हम उसे अच्छा स्वप्न और जब अहित का संकेत हो तो बुरा स्वप्न कहते हैं। किंतु इन्हें समझना कठिन होता है यदि बुरे स्वप्न समझ में आ गए तो आप कुछ उपाय करके उसके प्रभाव को कम कर सकते हैं कुछ स्वप्नों के दुष्प्रभाव को पूरी तरह समाप्त भी किया जा सकता है।

  • Vishal Vaishnav

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    "देव द्विज श्रेष्ठ वीर गुरू वृहद तपस्विन:।

    यद्वदन्ति नरं स्वप्ने सत्य मेविति तद्विदु।"

    यदि सपने में वेद अघ्ययन देखा तो श्रेष्ठ है। देव, ब्राह्मन, श्रेष्ठ वीर, गुरू, वृहद तपस्वी जो कुछ आपको स्वप्न में कहें उसे सत्य मानें ।

    सूर्योदय से कुछ पहले अर्थात ब्रह्म मुहूर्त में देखे गए सपने का फल दस दिनों में सामने आ जाता है। रात के पहले पहर में देखे गए सपने का फल एक साल बाद, दूसरे पहर में देखे सपने का फल छह महीने बाद, तीसरे पहर में देखे सपने का फल तीन महीने बाद और आखिरी पहर के सपने का फल एक महीने में सामने आता है ।

    स्वप्न के सन्दर्भ में स्वप्न ज्योतिष के अनुसार स्वप्न चार प्रकार के होते हैं:--

    पहला दैविक,

    दूसरा शुभ,

    तीसरा अशुभ

    चौथा मिश्रित |

    दैविक व शुभस्वप्न कार्य सिद्ध की सूचना देते हैं। अशुभ स्वप्न कार्य असिद्धि की सूचना देते हैं तथा मिश्रित स्वप्न मिश्रित फलदायक होते हैं। यदि पहले अशुभ स्वप्न दिखे और बाद में शुभ स्वप्न दिखे तो शुभस्वप्न के फल को ही पाता है।

    => स्वयं शिव और पार्वती गोस्वामी तुलसीदासजी के स्वप्न में आए। उन दोनों ने उन्हें रामचरितमानस लोक भाषा में लिखने का आदेश दिया। गोस्वामी तुलसीदासजी के शब्दों में -

    "सपनेहुं साथि मोपर,

    जो हर गौरी पसाउ।

    तेफुट होइजो कहहीं,

    सब भाषा मनिति प्रभाउ।"

    लोक-भाषा अवधि में लिखा गया रामचरितमानस और तुलसी दोनों अमर हो गए। भूख लगने पर आप सपने में रोटी खाते हैं। प्यास लगने पर पानी पीते हैं। ये आवश्यकता-पूर्ति-कारक स्वप्न हैं। ऐसे स्वप्न सामान्य कोटि के होते हैं। ये कम-से-कम आपकी निद्रा में बाधा नहीं डालते हैं। कुछ स्वप्नों में आप फूलों भरी वादियों में घूमते हैं या अन्य आकर्षक द्रव्य देखते हैं, तो इन्हें आनंददायक कोटि का स्वप्न कहा जा सकता है। कुछ स्वप्न ऐसे होते हैं जिनमें आप किसी भय से भागते रहते हैं, तो ये भयकारक हैं । अंग्रेजी-भाषा में इन्हें नाइट मेयर्स कहते हैं ।

    हरे कृष्णा

  • Vishal Vaishnav

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    स्वप्न के सन्दर्भ में चिकित्सा-विज्ञान और जीव-विज्ञान का दृष्टिकोण:--

    जीव वैज्ञानिकों द्वारा किये गए एक अघ्ययन के अनुसार निद्रावस्था के दौरान दबाव कम करने वाला हॉर्मोन "कॉर्टिसोल" का स्त्राव ज्यादा होता है और इंसानी मन की स्मृतियां धीरे-धीरे मंद होती जाती हैं। ऎसे में अवचेतन मस्तिष्क से शेष बची स्मृतियां ही स्वप्न के रू प में साकार होती हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि सपनों का संबंध घटित हुई या होने वाली घटनाओं से किसी ना किसी रू प में होता है। हां इनमें स्थान, पात्र व घटना की निरंतरता बीच-बीच में परिवर्तित हो सकती है ।

    चिकित्सा-विज्ञान और जीव-विज्ञान के अनुसार स्वप्न दबी इच्छाओं के लिए एक तरह का सेफ्टी वाल्व है। सामान्यत: हर व्यक्ति हर रात करीब 2 घंटे स्वप्न देखता है। स्वप्न कुछ और नहीं, नींद के दौरान पैदा होने वाले विचारों, तस्वीरों और भावनाओं से जुड़ी मानसिक क्रिया है।

    हमारी नींद कई चक्रों में बंटी होती है और हर चक्र कई चरणों में। हर चक्र की शुरुआत हल्की नींद से होती है। अंतिम 2 चरणों में गहरी नींद और रेम (रैपिड आई मूवमेंट) का नंबर आता है। हम हर रात 4 से 5 रेम पीरियड से गुजरते हैं। इनकी अवधि 5 से लेकर 45 मिनट तक की होती है। सारे सपने सिर्फ रेम पीरियड में ही दिखते हैं और सिर्फ स्तनधारियों को ही। रेंगने वाले जन्तुओं और कोल्ड ब्लडेड (ठंडे खून वाले) जीव-जन्तुओं को सपने नहीं आते, क्योंकि नींद के दौरान वे रेम पीरियड से नहीं गुजरते हैं।

    नींद की शुरुआत में रेम पीरियड काफी छोटा होता है, लेकिन जैसे-जैसे नींद की अवधि लंबी होती जाती है, रेम पीरियड की अवधि भी बढ़ती जाती है। यही वजह है कि हम ज्यादातर सपने सुबह या नींद के आखिरी चक्र में देखते हैं। इसी वजह से कई बार जब हमारी नींद सुबह में खुलती है तो हम रेम पीरियड में होते हैं और थोड़े समय पहले देखे गए सपने दिमाग में मौजूद रहते हैं। अक्सर जो बुरे सपने याद रहते हैं, वह भी सुबह के वक्त ही देखे गए होते हैं। इसकी एकमात्र वजह है रेम पीरियड में नींद का खुलना। रेम पीरियड के बाद नींद खुलने पर व्यक्ति को कुछ भी याद नहीं रहता है। न ही अच्छा न ही बुरा ।

    चिकित्सा-विज्ञान और जीव-विज्ञान के अनुसार यदि कोई व्यक्ति स्वप्न देखें तो बुरे सपने (दु:स्वप्न) कुछ और नहीं बल्कि बढ़-चढ़ कर देखे गए सपने ही हैं। ऐसे सपने देखने का मतलब यह नहीं है कि कोई भूत, प्रेत या पिशाच पीछे पड़ा है। दरअसल ये सपने हम भीतरी तनाव, निराशा, व्याकुलता, मदिरा या फिर ड्रग्स के प्रभाव के कारण देखते हैं। इन चीजों के कारण रेम पीरियड बढ़ जाता है और हम लंबे-लंबे और ऊटपटांग सपने देखते हैं। वहीं कैफिनयुक्त पेय पदार्थों और कुछ दूसरे ड्रग्स का प्रभाव ठीक इसके विपरीत होता है। ये रेम पीरियड को छोटा कर देते हैं। कैफिन या रेम पीरियड को घटाने वाले ड्रग ऊटपटांग सपने देखने वालों के लिए काफी फायदेमंद साबित होते हैं ।

    चिकित्सकों का सामना अक्सर ऐसे मरीजों से होता रहता है, जो दु:स्वप्न के शिकार होते हैं। ऐसे लोगों की सामान्य रूप से डर और चिंता के मारे नींद खुलने की शिकायत होती है। नींद खुलने के पीछे अधिकतर का यही कहना होता है कि स्वप्न में वे किसी मृत या जिंदा (जाने-अनजाने) व्यक्ति को देखते हैं। ऐसी स्थितियों को साधारण लोग भूत-प्रेत या पिशाच से जोड़ देते हैं। फिर अशिक्षा या अंधविश्वास के कारण वे ओझा, पुजारी, बाबा, तांत्रिक या किसी ठग के चक्कर में फंस जाते हैं।

    बार-बार दु:स्वप्न देखने को ड्रीम एंग्जाइटी डिसॉर्डर कहा जाता है। इसके इलाज की जरूरत होती है। ठीक तरह से इलाज न होने पर इनसे पारिवारिक-जीवन के लिए भी परेशानी पैदा होने का खतरा रहता है। दु:स्वप्नदेखने की बीमारी पुरुषों की तुलना में महिलाओं में ज्यादा पाई जाती है। महिलाओं में यह समस्या युवा अवस्था में शुरू हो जाती है ।

    स्वप्न के सन्दर्भ में ज्योतिषीय दृष्टिकोण:--

    ऐसा माना जाता है कि यदि कोई बुरा स्वप्न दिखाई दे, तो नींद खुलते ही अपने आराध्य को ध्यान करके पानी पी लेना चाहिए। इसके पश्चात् फिर सोना नहीं चाहिए | ऐसी मान्यता भी है कि दिन में दिखे स्वप्न निष्फल होते हैं ।

    हरे कृष्णा

  • Vishal Vaishnav

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    ऋषि याज्ञवल्क्य ने कहा है कि यह संसार स्वप्न की तरह है। जिस प्रकार जागने पर स्वप्न झूठा प्रतीत होता है, उसी प्रकार आत्मा का ज्ञान प्राप्त होने पर यह संसार मिथ्या प्रतीत होता है । स्वप्न का संसार बड़ा ही अदभुत है और चमत्कारी भी है । क्योंकि इस निद्रा यज्ञ में इंसान उन ऊंचाइयों को छू लेता है, जिसकी कल्पना तक जाग्रत अवस्था में कोई व्यक्ति नहीं कर पाता । हमारे मस्तिष्क को दिन भर जो सिगनल मिलते हैं और भावनाएं जागृत होती है जिन्हें हम चाह कर के भी नहीं प्रकट कर पाते वह हमारे अवचेतन मन में दर्ज होते जाते हैं रात को जब शरीर आराम कर रहा होता है तब यह स्वप्न रूप में प्रकट होते हैं |

    उपनिषदों के अनुसार आत्मचेतना में आत्मा की गति स्थूल कोषों से सूक्ष्म कोषों की ओर होती है। किन्तु वह सूक्ष्मतम आनन्दमय कोष में नहीं, बल्कि स्वयं आनन्दमय है। इसी प्रकार चेतना की दृष्टि से आत्मा की चार अवस्थाएँ होती हैं-

    (१)--जाग्रत- (जागने की स्थिति, जिसमें सब इन्द्रियाँ अपने विषयों में रमण करती रहती हैं) ।

    (२)--स्वप्न- (वह स्थिति जिसमें इन्द्रियाँ तो सो जाती हैं, किन्तु मन काम करता रहता है और अपने संसार की स्वयं सृष्टि कर लेता है) ।

    (३)--सुषुप्ति- (वह स्थिति, जिसमें मन भी सो जाता है, स्वप्न नहीं आता, किन्तु जागने पर यह स्मृति बनी रहती है कि, नींद अच्छी तरह आई) |

    (४)--तुरीया- (वह स्थिति, जिसमें सोपाधिक अथवा कोषावेष्टित जीवन की सम्पूर्ण स्मृतियाँ समाप्त हो जाती हैं।)

    स्वप्न के सन्दर्भ में कुछ प्रसिद्द घटनाएँ:--

    ‘‘दि अंडर-स्टैंडिंग आफ ड्रीम्स एंड देयर एन्फ्लूएन्सेस ऑन दि हिस्ट्री ऑफ मैन’’ हाथर्न बुक्स न्यूयार्क द्वारा प्रकाशित पुस्तक में एडाल्फ हिटलर के एक स्वप्न का जिक्र है, जो उसने फ्रांसीसी मोर्चे के समय सन् १९१७ में देखा था । उसने देखा कि उसके आसपास की मिट्टी भरभराकर बैठ गई है, वह तथा उसके साथी लोहे में दब गये हैं- हिटलर बचकर भाग निकले, किंतु तभी बम विस्फोट होता है- उसी के साथ हिटलर की नींद टूट गयी । हिटलर अभी उठकर खड़े ही हुए थे कि सचमुच तेज धमाका हुआ, जिससे आसपास की मिट्टी भरभराकर ढह पड़ी और खंदकों में छिपे उनके तमाम सैनिक बंदूकों सहित दबकर मर गये। स्वप्न और दृश्य का यह सादृश्य हिटलर आजीवन नहीं भूले ।

    टीपू सुल्तान को अपने स्वप्नों पर आश्चर्य हुआ करता था, सो वह प्रतिदिन स्वप्न डायरी में नोट किया करता था। उनके सच हुए स्वप्नों के विवरण कुछ इस प्रकार हैं-

    ‘‘शनिवार 24 तारीख रात को मैंने सपना देखा। एक वृद्ध पुरुष कांच का एक पत्थर लिए मेरे पास आए हैं और वह पत्थर मेरे हाथ में देकर कहते हैं- सेलम के पास जो पहाड़ी है उसमें इस काँच की खान है, यह कांच मैं वहीं से लाया हूँ। इतना सुनते-सुनते मेरी नींद खुल गई ।" टीपू सुल्तान ने अपने एक विश्वास पात्र को सेलम भेजकर पता लगवाया, तो ज्ञात हुआ कि सचमुच उस पहाड़ी पर काँच का भंडार भरा पड़ा है। इन घटनाओं से इस बात की पुष्टि होती है कि समीपवर्ती लोगों को जिस तरह बातचीत और भौतिक आदान-प्रदान के द्वारा प्रभावित और लाभान्वित किया जा सकता है, उसी तरह चेतना के विकास के द्वारा बिना साधना भी आदान-प्रदान के सूत्र खुले हुए हैं ।

    एक अंधे से पूछा गया कि क्या तुम्हें स्वप्न दिखाई देते हैं इस पर उसने उत्तर दिया-मुझे खुली आँख से भी जो वस्तुएँ दिखाई नहीं देतीं, वह स्वप्न में दिखाई देती हैं। इससे फ्रायड की इस धारणा का खंडन होता है कि मनुष्य दिन भर जो देखता और सोचता-विचारता है, वही दृश्य मस्तिष्क के अंतराल में बस जाते और स्वप्न के रूप में दिखाई देने लगते हैं। निश्चय ही यह तथ्य यह बताता है कि स्वप्नों का संबंध काल की सीमा से परे अतींद्रिय जगत से है अर्थात् चिरकाल से चले आ रहे भूत से लेकर अनंत काल तक चलने वाले भविष्य जिस अतींद्रिय चेतना में सन्निहित हैं, स्वप्न काल में मानवीय चेतना उसका स्पर्श करने लगती है ।

    स्वप्न में मनुष्य की रुचि हमेशा से ही है। हमारे वेदों-पुराणों में भी स्वप्न के बारे में जिक्र किया गया है। 'अग्नि पुराण' में स्वप्न विचार और शकुन-अपशकुन पर भी विचार किया गया है । हमारे ऋषि-मुनियों के अनुसार सपनों का आना ईश्वरीय शक्ति का वरदान है और निद्रा की चतुर्थ अवस्था या रात्रि के अंतिम प्रहर में आए स्वप्न व्यक्ति को भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं का पूर्वाभास कराते हैं । हमारे आदि ऋषि-मुनियों ने स्वप्न के मर्म को समझते हुए इनके ज्योतिषीय पक्ष के शुभा शुभ फलों के बारे में तो बताया, लेकिन यह पहेली अनसुलझी रह गई कि स्वप्न क्यों आते हैं और इनका मनोवैज्ञानिक आधार क्या है ?

    स्वप्न के सन्दर्भ में मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण:--

    प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक वैवस्टर के अनुसार स्वप्न सोए हुए व्यक्ति के अवचेतन मस्तिष्क में चेतनावस्था के दौरान घटित घटनाओं, देखी हुई आकृतियों, कल्पनाओं व विचारों का अपरोक्ष रूप से चित्रांकन होना है। प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक फ्रॉयड के अनुसार हमारे दो मस्तिष्क होते हैं- पहला चेतन और दूसरा अवचेतन । हमारा जब चेतन मस्तिष्क सुप्तावस्था में होता है तो अवचेतन मस्तिष्क सक्रिय होना प्रारंभ होता है और इंसान के जीवन में घटी घटनाओं या निर्णयों के उन पहलुओं पर गौर करता है जिन पर चेतन मस्तिष्क में गौर नहीं कर पाता । स्वप्न के बारे में सन 1953 ईस्वी में यूसिन सेरिन्स्की सन १९७६ ईस्वी में मनोवैज्ञानिक ऎलेने हॉबसन व रॉबर्ट मैकार्ले ने अघ्ययन किया और इन्होंने फ्रॉयड के अवचेतन मस्तिष्क की अवधारणा को परिवर्तित रूप में प्रतिपादन किया जिसके कारण इन्हें आलोचनाओं का सामना भी करना पड़ा। इनके अनुसार नींद की चार अवस्था होती हैं। चौथी अवस्था में "रेम" सिद्धांत कार्य करता है। इसमें चेतन मस्तिष्क द्वारा उपेक्षित घटनाओं या अवस्थाओं का समेकित रूप होकर प्रतिकृति के रूप में सामने आते हैं । फ्रॉयड के ही अनुसार बुरे सपने आपको भावनात्मक अवसाद से बचाने के लिए आपका मनोबल बढ़ाते हैं और साथ ही भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं का पूर्वाभास भी कराते हैं ।

    हरे कृष्णा