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यज्ञोपवीत को स्नान के समय कान पर क्यों लपेट लिया जाता है?

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  • Bishakha Seshadri

    *मनु स्मृति (1/92)* के अनुसार -
    *ऊर्ध्वम नाभेर्मेध्यतरः परुषः परिकीर्तितः।
    तस्मानिध्यतामाम त्वस्य मुखमुक्ताम स्वयम्भुवा।।*

    अर्थात, नाभि से ऊपर का भाग पवित्र होता है और नीचे का भाग अपवित्र। नीचे के भाग में मल होता है और शौच करते समय अपवित्र होता है। इसलिए *यज्ञोपवीत* को कान पर लपेट लिया जाता है।

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