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करवाचौथ पर चन्द्रमा की पूजा क्यों की जाती है?

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  • Sana Gopika Adani

    ह्रदय के स्वामी होने के कारण चन्द्रमा हमारी खुशियाँ और चल-अचल चीज़ों को निर्धारित करता है। हमारी दोनों भौं के मध्य भाग में चन्द्रमा का निवास होता है। चंद्र की ख़ुशी के लिए हम चन्दन, टीका आदि लगते हैं और महिलायें बिंदी लगाती हैं।

    करवाचौथ के दिन, चन्द्रमा के आशीर्वाद की प्राप्ति के लिए स्त्रियां निर्जल व्रत रखती हैं और सर्वप्रथम चंद्र को जल अर्पित करती हैं जिसे *अर्घ* कहा जाता है। इसके पश्चात ही विवाहित स्त्रियाँ भोजन और जल ग्रहण करती हैं। करवाचौथ मनाने का मुख्य कारण पति की लम्बी आयु की प्रार्थना करना है।

    *चन्द्राज्ञ उपनिषद* के चौथे अध्याय के बारहवे भाग में कहा गया है कि जो ब्रह्मा को चंद्र में निवास करा कर उसकी पूजा करता है वो हर दुःख से मुक्त हो जाता है और लम्बी आयु जीता है।

    *हस्तयोग* और *तंत्र शास्त्र* के अनुसार चन्द्रमा को बहुत महत्वपूर्ण माना गया है। अर्ध चंद्र भगवन शिव के शीश पर विराजमान है। और अर्ध चंद्र आशा और प्रार्थना का प्रतीक है।

    *ब्रह्मवैवर्त पुराण* के अनुसार चन्द्रमा का विवाह प्रजापति दक्ष की पुत्रियों से हुआ था। उनमे से चंद्र रोहिणी को अधिक प्रेम करते थे। दक्ष की बाकी पुत्रियों ने इस बात की शिकायत अपने पिता से की तो दक्ष ने चन्द्रमा और उनकी 16 कलाओं को श्राप दे दिया जिससे चंद्र निर्बल हो गए। चंद्र भगवन शिव के पास गए और महादेव ने उन्हें अपने शीश पर जगह दी। दक्ष ने भगवन शिव से चंद्र को लौटाने के लिए कहा और श्राप के विषय में बताया तो शिव विष्णु जी के पास पहुंचे।

    विष्णु जी ने तब चंद्र के 2 हिस्से किये। एक हिस्सा दक्ष को दिया और बाकी का एक हिस्सा शिव जी के शीश पर रहा। इस प्रकार चंद्र श्राप से निर्बल होते हुए भी बलवान रहे। इसी कारण चंद्र 15 दिन कमजोर होते हैं और 15 दिन बलवान।

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