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  • ब्रह्माजी के इन 3 वरदानों से बदल गया संसार....

    ब्रह्मा (ब्रह्म नहीं) हिन्दू धर्म में एक प्रमुख देवता हैं। ये हिन्दुओं के 3 प्रमुख देवताओं (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) में से एक हैं। ब्रह्मा को सृष्टि का रचयिता कहा जाता है। सृष्टि रचयिता से मतलब सिर्फ जीवों की सृष्टि से है। तीनों देवताओं में ब्रह्माजी का चित्रण प्रथम और सबसे वृद्ध देवता के रूप में किया गया है।
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    बहुत से लोग ब्रह्मा और सरस्वती की कहानी को सारा और अब्राहम से जोड़कर देखते हैं। राजा मनु की कहानी को नूह से जोड़कर देखते हैं और आदम की कहानी को स्वायंभुव मनु से जोड़कर देखते हैं। हालांकि इसमें कितनी सचाई है, यह हम नहीं जानते। खैर...

    अक्सर देवता (सुर) और दैत्य (असुर) प्रतिद्वंदिता के चलते अपनी शक्ति बढ़ाने के लिए ब्रह्मा की तपस्या करके उनसे अजर-अमर होने का वरदान प्राप्त करते रहते हैं। इसके अलावा भी सामान्य मनुष्यों ने भी ब्रह्मा की तपस्या करके वरदान हासिल किए हैं। हम यहां बताएंगे ब्रह्मा के वे 10 वरदान जिनके कारण देवता ही नहीं, खुद ब्रह्मा, विष्णु और महेश की मुसीबत में पड़ गए थे।
    हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु को दिया वरदान : ब्रह्माजी ने ऋषि कश्यप के असुर पुत्र हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु को अजर-अमर होने के वरदान दिया था जिसके चलते दोनों भाइयों ने संपूर्ण धरती पर अपना साम्राज्य स्थापित कर खुद को ईश्वर घोषित कर दिया था। चारों ओर हाहाकार मचा हुआ था। देवी-देवता, मानव-वानर आदि सभी त्रस्त हो चले थे।
    हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु की कथा...

    तब भगवान विष्णु को इनका वध करने के लिए अवतार लेना पड़ा। हिरण्याक्ष को मारने के लिए वराह अवतार और हिरण्यकशिपु को मारने के लिए नृसिंह अवतार लेना पड़ा। दोनों की कहानी से आप अवगत ही होंगे।

    तारकासुर : तारकासुर असुरों में सबसे शक्तिशाली असुर था। उसके अत्याचारों से सभी देवी-देवता त्रस्त हो गए थे। सभी ने ब्रह्माजी की शरण ली। ब्रह्माजी ने कहा कि शिवजी से प्रार्थना करो, क्योंकि शिव-पार्वती का पुत्र ही तारकासुर का वध कर सकता है।
    लेकिन उस वक्त शिवजी गहन समाधि में थे। उनकी समाधि तोड़ने की कौन हिम्मत कर सकता था। उनकी समाधि तोड़ना भी जरूरी थी, क्योंकि उनकी समाधि टूटने के बाद ही शिव-पार्वती का मिलन होता और फिर उनसे जो पुत्र उत्पन्न होता, वह देवताओं का सेनापति बनता।

    तब देवताओं ने युक्ति अनुसार कामदेव को समाधि भंग करने के लिए राजी कर लिया। देवताओं के कहने पर कामदेव ने उनकी समाधि भंग कर दी, लेकिन उसे शिव के क्रोध कर सामना करना पड़ा और अपना शरीर गंवाना पड़ा।

    क्रोध शांत होने के बाद सभी देवता शिवजी के पास गए। उन्होंने शिवजी से प्रार्थना की कि तारकासुर हमें परेशान कर रहा है। आपका पुत्र ही इस समस्या का समाधान कर सकता है, ऐसा ब्रह्माजी का वरदान है।

    देवताओं की प्रार्थना का असर शिवजी पर हुआ। देवताओं की प्रार्थना से ही शिव दूल्हा बने और उन्होंने पार्वती से विवाह किया। शिव-पार्वती के पुत्र हुए कार्तिकेय। कार्तिकेय देवताओं की सेना के सेनापति बने। उन्होंने तारकासुर का वध कर देवताओं को असुरों के भय से मुक्त कर दिया।
    त्रिपुरासुर : असुर बालि की कृपा प्राप्त त्रिपुरासुर भयंकर असुर थे। महाभारत के कर्ण पर्व में त्रिपुरासुर के वध की कथा बड़े विस्तार से मिलती है। भगवान कार्तिकेय द्वारा तारकासुर का वध करने के बाद उसके तीनों पुत्रों ने देवताओं से बदला लेने का प्रण कर लिया। तीनों पुत्र तपस्या करने के लिए जंगल में चले गए और हजारों वर्ष तक अत्यंत दुष्कर तप करके ब्रह्माजी को प्रसन्न किया। तीनों ने ब्रह्माजी से अमरता का वरदान मांगा। ब्रह्माजी ने उन्हें मना कर दिया और कहने लगे कि कोई ऐसी शर्त रख लो, जो अत्यंत कठिन हो। उस शर्त के पूरा होने पर ही तुम्हारी मृत्यु हो।
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    तीनों ने खूब विचार कर ब्रह्माजी से वरदान मांगा- हे प्रभु! आप हमारे लिए तीन पुरियों का निर्माण कर दें और वे तीनों पुरियां जब अभिजीत नक्षत्र में एक पंक्ति में खड़ी हों और कोई क्रोधजित अत्यंत शांत अवस्था में असंभव रथ और असंभव बाण का सहारा लेकर हमें मारना चाहे, तब हमारी मृत्यु हो। ब्रह्माजी ने कहा- तथास्तु!

    शर्त के अनुसार उन्हें तीन पुरियां (नगर) प्रदान की गईं। तारकाक्ष के लिए स्वर्णपुरी, कमलाक्ष के लिए रजतपुरी और विद्युन्माली के लिए लौहपुरी का निर्माण विश्वकर्मा ने कर दिया। इन तीनों असुरों को ही त्रिपुरासुर कहा जाता था। इन तीनों भाइयों ने इन पुरियों में रहते हुए सातों लोकों को आतंकित कर दिया। वे जहां भी जाते, समस्त सत्पुरुषों को सताते रहते। यहां तक कि उन्होंने देवताओं को भी उनके लोकों से बाहर निकाल दिया।

    सभी देवताओं ने मिलकर अपना सारा बल लगाया, लेकिन त्रिपुरासुर का प्रतिकार नहीं कर सके और अंत में सभी देवताओं को तीनों से छुप-छुपकर रहना पड़ा। अंत में सभी को शिव की शरण में जाना पड़ा। भगवान शंकर ने कहा- सब मिलकर के प्रयास क्यों नहीं करते?

    देवताओं ने कहा- यह हम करके देख चुके हैं। तब शिव ने कहा- मैं अपना आधा बल तुम्हें देता हूं और तुम फिर प्रयास करके देखो, लेकिन संपूर्ण देवता सदाशिव के आधे बल को संभालने में असमर्थ रहे। तब शिव ने स्वयं त्रिपुरासुर का संहार करने का संकल्प लिया।

    सभी देवताओं ने शिव को अपना-अपना आधा बल समर्पित कर दिया। अब उनके लिए रथ और धनुष-बाण की तैयारी होने लगी जिससे रणस्थल पर पहुंचकर तीनों असुरों का संहार किया जा सके। इस असंभव रथ का पुराणों में विस्तार से वर्णन मिलता है।

    पृथ्वी को ही भगवान ने रथ बनाया, सूर्य और चन्द्रमा पहिए बन गए, सृष्टा सारथी बने, विष्णु बाण, मेरू पर्वत धनुष और वासुकि बने उस धनुष की डोर। इस प्रकार असंभव रथ तैयार हुआ और संहार की सारी लीला रची गई। जिस समय भगवान उस रथ पर सवार हुए, तब सकल देवताओं द्वारा संभाला हुआ वह रथ भी डगमगाने लगा। तभी विष्णु भगवान वृषभ बनकर उस रथ में जा जुड़े। उन घोड़ों और वृषभ की पीठ पर सवार होकर महादेव ने उस असुर नगर को देखा और पाशुपत अस्त्र का संधान कर तीनों पुरों को एकत्र होने का संकल्प करने लगे।

    उस अमोघ बाण में विष्णु, वायु, अग्नि और यम चारों ही समाहित थे। अभिजीत नक्षत्र में उन तीनों पुरियों के एकत्रित होते ही भगवान शंकर ने अपने बाण से पुरियों को जलाकर भस्म कर दिया और तब से ही भगवान शंकर त्रिपुरांतक बन गए।

    त्रिपुरासुर को जलाकर भस्म करने के बाद भोले रुद्र का हृदय द्रवित हो उठा और उनकी आंख से आंसू टपक गए। आंसू जहां गिरे, वहां 'रुद्राक्ष' का वृक्ष उग आया। 'रुद्र' का अर्थ शिव और 'अक्ष' का अर्थ आंख अथवा आत्मा है।

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