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  • ।। कर्म बड़ा या भाग्य ।।

    Deven rathore

    करम बड़ा या भाग्य , यह बहस तो जब से संसार बना है चलती ही आ रही है इसका निष्कर्ष सब अपने अपने तरीकों से निकालते रहते हैं , जब के दोनों एक दुसरे के पूरक हैं यानी करम के बिना भाग्य अधूरा है तो भाग्य के बिना करम अधूरा है ! करम करेंगे तो भाग्य बनेगा यानी करम रुपी बीज बोयेंगे तो कभी न कभी भाग्य रुपी फल भी खाने को मिलेगा और कहीं न कहीं हर आदमी की इच्छा तो यही रहती है की करम का फल जरूर मिले , कोई माने या न माने अंदर से इच्छा तो सदैव से सब की रहती आई है की बात तो बस इतनी सी है की करम करना ही हमारे बस में है उसका फल मिलना या न मिलना या देर से मिलना या कम मात्र में मिलना ये सब हमारे हाथ में नहीं है जिसके हाथ में है उसका नाम विधाता है और उस पर हमारा कोई बस नहीं चलता , क्यों कुछ ऐसी ही सोच रहती है हर व्यक्ति की तो ये सोच सिर्फ एक तरफ़ा है और ये सोच बस इतनी भर सी है की जैसे मृग जिसके के अंदर ही कस्तूरी होती है वो उसकी तलाश में इधर उधर भटकता फिरता रहता है , हमारा हाल भी कुछ ऐसा ही होता है हम या तो अज्ञानताबस अनजान बने रहते हैं या अपने आपको चतुर मानते फिरते रहते हैं की हमने सब ज्ञान प्राप्त कर लिया है कहने का भाव बस इतना सा ही है की हमारे सब कर्मों का अच्छा या बुरा फल हमारे खुद के ही करम होते हैं , जैसा बोयोगे वैसा ही काटोगे यही मूल मंत्र है विधाता का या करम थ्योरी का तो हमारे साथ जो कुछ भी अच्छा बुरा घटता है वो हमारे ही कर्मों का फल मात्र होता है तो हमें सिर्फ अच्छे और शुभ करम करते रहना चाहियें तभी हमारा भाग्य अच्छा बनेगा !

    अब ग्रह क्या हैं क्या गृह ही जिमेदार होते हैं हमारी किस्मत के लिए , नहीं ये बात बिलकुल गलत है बल्कि तत्वज्ञान के हिसाब से गृह तो मात्र निमित बनते हैं हमारे कर्मो का फल देने के लिए उन्हें तो ये चार्ज सोंपा जाता है वो तो मात्र इंडिकेटर ही होते हैं और करम और फल की ज़िम्मेदारी तो हमारे खुद के ही हाथ में होती है बस हम अनजान बने रहते हैं ! इश्वर एक पूरण सत्य है क्यों की इश्वर क्या है वो उर्जा है , वो इस ब्रह्माण्ड के रूप में है वो ॐ के रूप में है वह अनादी है अजन्मा है और सूक्ष्म से भी सूक्ष्म है तो विशाल से भी विशाल है जैसा की श्रीक्रिशन ने महाभारत के युद्ध के समय अर्जुन को अपने अंदर ही विराट पुरुष के दर्शन करवाए तो इश्वर को , भाग्य को दोष देते रहने से कुछ नहीं होने वाला , दोष देना हो तो अपने आप को दो अपने कर्मो को देखो उन्हें सुधारो , हमें तो इस जनम के ही करम ज्ञात रहते हैं तो पता नहीं किन किन जन्मों के रूप में हमने क्या क्या करम किये होंगे , रामायण में तुलसीदास जी ने भी यही कहा है के हमारे कर्मों के उतरदायी हम स्वयं होते हैं और उनके लिए दूसरा कोई ज़िम्मेदार नहीं होता हम अपने ही कर्मो का फल भोगते हैं और उसी पीड़ा में रोते और हँसते रहते हैं तो जब हमें ये ज्ञात हो जाए की करम करना और उसका फल प्राप्त करना दोनों में हम ही उतरदायी होते हैं तो हमें जयादा न सोचते हुए सिर्फ अच्छे और शुभ करम करने चाहिए और दिल में दृढ विश्वास बनाए रखना चाहिए तब इश्वर की कृपा हम पे बनी रहेगी !

    ज्योतिष के दृष्टिकोण में , इस से हम किसी भी होरोस्कोप में नवंम और दसम भाव के साथ साथ लगन और पंचम भाव को मुख्यतया देखते हैं , ऋषि पराशर का सिधांत बहुत सूक्ष्म और परिष्कृत है के हर कुंडली में यानी हर लग्न में सिर्फ एक मुख्या गृह माना जाता है तो उसका दुसरे शुभ भाव के साथ संयोग राजयोग या अच्छा भाग्य योग बनाता है बस कंडीशन इतनी सी रहती है की उन अच्छे योगों में त्रिक या बुरे भाव न मिलते हों और योग कारक गृह अस्त , नीच या पाप प्रभाव में न हों तो उन भावों और योगों का पूरण फल प्राप्त होने में कोई संदेह नहीं रहता , दूसरी और जैमनी ऋषि ने भी आत्मकारक और अमात्यकारक के रूप में यही राज योगों यानी अच्छी किस्मत के योगों की कल्पना की, हाँ उन शुभ योगों के रूप में उन उन ग्रहों की दशा और अन्तरदशा जरूर आनी चाहिए तभी उनका पूरण फल प्राप्त हो पाता है !

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