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  • 🌼शुकदेव जी महाराज की पूर्व जन्म कथा 🌼

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    शुकदेव जी पूर्व जन्म मेंराधा जी केनिकुंज के शुक (तोता) थे| निकुंज में गोपिओं के साथ प्रभु क्रीडा करते थे और शुकदेव जी सारा दिन राधा-राधा कहते थे| यह देख एक दिन राधा जी ने हाथ उठाकर तोते को अपनी ओर बुलाया | तोता आकर राधा जी के चरणों कि वंदना करता है | वह उसे उठाकर अपने हाथ में ले लेती हैं और तोता फिर श्री राधे राधे बोलने लगा | तब राधा जी ने कहा, “अब तू राधा राधा नहीं, कृष्ण कृष्ण कृष् बोल” | शुकदेव जी ऐसा ही करने लगे। इन्हें देखकर दूसरे तोता भी कृष्ण-कृष्ण बोलने लगे। राधा की सखी सहेलियों पर भी कृष्ण नाम का असर होने लगा। पूरा नगर कृष्णमय हो गया, कोई राधा का नाम नहीं लेता था।

    इस तरह से एक बार राधा जी कृष्ण से मिलती है और राधा जी ने उनसे कहा कि यह तोता कितना मधुर बोलता है और उसे प्रभु के हाथ में दे दिया | इस प्रकार राधा जी ने ब्रह्म के साथ प्रत्यक्ष सम्बन्ध कराया | इसलिए उस जन्म में शुकदेव जी कि सद्गुरु श्री राधा जी हैं और इसीलिए सद्गुरु होने के कारण भागवत में राधा जी का नाम नहीं लिया अर्थात अपने गुरु का नाम नहीं लिया |

    जिस प्रकार यदि पत्नी अपने पति का नाम ले, तो उसकी आयु घटती है, उसी प्रकार सद्गुरु को मन में स्मरण कर ‘सद्गुरु कि जय” कहना चाहिए, मर्यादा भंग नहीं करनी चाहिए | ऐसा शास्त्रों में वर्णन आता है |

    एक दिन कृष्ण उदास भाव से राधा से मिलने जा रहे थे। राधा कृष्ण की प्रतीक्षा कर रही थी।

    तभी नारद जी बीच आ गए। कृष्ण के उदास चेहरे को देखकर नारद जी ने पूछा कि प्रभु आप उदास क्यों है। कृष्ण कहने लगे कि राधा ने सभी को कृष्ण नाम रटना सिखा दिया है। कोई राधा नहीं कहता, जबकि मुझे राधा नाम सुनकर प्रसन्नता होती है।

    कृष्ण के ऐसे वचन सुनकर राधा की आंखें भर आईं। महल लौटकर राधा ने शुकदेव जी से कहा कि अब से आप राधा-राधा ही जपा कीजिए। उस समय से ही राधा का नाम पहले आता है फिर कृष्ण का।

    लेकिन अगर भागवत कथा में शुकदेव जी राधा नाम लेते तोपरीक्षित के जीवन के केवल 7 ही दिन बचे हुए थे। और कथा पूरी नही हो पाती।राधा रानी सतगुरु है शुकदेव जी की। अगर वो अपने गुरुदेव का नाम लेते थे तो समाधि में चले जाते थे। इसलिए भागवत में उन्होंने राधा नाम को गुप्त रूप से लिया है।

    लेकिन आज आप कहीं भी जाकर देख लीजिये। वृन्दावन, बरसाने में सभी राधे राधे ही रटते है। यही कारण है की हमारे कृष्ण जी को श्री राधा रानी का नाम अत्यंत प्रिय है।तुलसीदास जी जबवृन्दावन गए थे तो हैरान रह गए थे की यहाँ सभी लोग राधे-राधे जपते है। इसलिए बंधुओं कलयुग में श्री राधा जी का नाम सर्वोपरि है।

    राधा कृष्ण की तरह सीता का नाम भी राम से पहले लिया जाता है। असल में राम और कृष्ण दोनों ही एक हैं और राधा एवं सीता भी एक हैं। यह हमेशा नित्य और शाश्वत हैं।

    क्योंकि यही लक्ष्मी और नारायण रूप से संसार का पालन करते हैं। नारायण लक्ष्मी से अगाध प्रेम करते हैं। यह हमेशा अपने हृदय में बसने वाली राधा का नाम सुनना चाहते हैं। इसलिए ही कृष्ण नाम से पहले राधा नाम लिया जाता है।

    श्री शुक देव महाराज की जय ,राधे राधे 🙏🙏

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