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  • अघोरी का पुनर्जन्म

    शिव दास

    एक अघोरी साधु थे वे शिव भक्त थे जंगल में रहा करते जंगल में वे जहाँ रहते वहाँ बहुत से साधु कुटिया बनाकर रहते थे।मैं जिन साधु की बात कर रहा हूँ वे साधुओं में अपना प्रमुख स्थान रखते थे इनको शिव दर्शन भी हो चुका था, ये सभी साधु नाग वंश से थे ।एक समय की बात है साधु अकेले साधना करने वन में ही स्थित अपनी एक अन्य कुटिया में गये वे वहां शिवलिंग की पूजा ,जप इत्यादि करते वेद,शास्त्र का अध्ययन किया करते थे।जब वे नाम जप कर रहे थे एक स्त्री उन्हें समीप स्थित पेड़ के पीछे से देख रहीं थीं वे ऐसा कई दिनों से कर रहीं थी साधु उन्हें देखते तो वो मुस्कुरा देती थीं अघोरी साधु अपना जीवन केवल शिव को समर्पित करना चाहते थे छोटी सी उम्र थी उनकी जब वे घर छोड़ साधुओं की कुटिया में आये थे वे कभी विवाह नहीं करना चाहते थे इसलिए उन स्त्री की अनदेखी किया करते वो स्त्री उनसे प्रेम करती थीं इसलिए बार बार उन्हें देखतीं।अघोरी उन्हें इस एकांत स्थित कुटिया में आने से मना करते,अपने ब्रम्हचारी होने की बात भी कहते पर स्त्री नहीं मानी, धीरे धीरे अघोरी को उनसे प्रेम हो गया वे शिव - माँ से भी बोले कि अब वे विवाह करना चाहते हैं ।दोनो एक दूसरे से बात करने लगे एक दिन साधु उनके घर गए वे भी नागकन्या थी इसलिए उनका घर नगर नहीं वन में था ।उनके माता पिता से उनका हाथ मांग शादी कर लिए ,समय बीतता गया ।वे सभी अघोरियों के साथ कुटिया में रहते थे वो कुटिया अन्य कुटियों के पास था यह वह स्थान है जहां अन्य अघोरी परिवार रहते थे वह स्थान नहीं जहां मैं जिनकी कथा सुना रहा हूँ वे पूजन इत्यादि करते थे।एक समय ऐसा भी आया जब उनके राज्य के राजा अघोरियों से सहायता मांगने आये उनके राज्य पर शत्रु राजा हमला करने वाला था ।

    इस अघोरी प्रमुख के नेतृत्व में सभी नागवंशी अघोरी युद्ध लड़े हार शत्रु पक्ष की हुई और इनका राज्य सुरक्षित हो गया।शत्रु पक्ष के राजा इन अघोरी प्रमुख पर कुपित हुए क्योंकि इनके साथ देने के कारण इनके राजा जीत गये।शत्रु राजा के आदेश पर उनके सिपाही वन में स्थित इन अघोरी की कुटिया में पहुँचे वहां कुटिया में इनकी पत्नी ही थीं अघोरी एकांत स्थित कुटिया में ध्यान मग्न बैठे थे ,उनकी पत्नी से उनका पता पूछने पर वो नहीं बतायी जिसके कारण खंजर उनके पेट में भोंक हत्या कर सिपाही चले गये। अघोरी यह जान बहुँत दुखी हुए वे पूरी तरह टूट गए ,जीने की इच्छा भी शेष न रही जब साधु कुछ दिन बाद उन्हें ढूंढते हुए कुटिया पहुंचे तो अघोरी अपना बचाव भी न किये और उनकी मृत्यु हो गयी।

    उनका पुनर्जन्म हुआ सबकुछ तो नहीं किन्तु अपनी मृत्यु ,प्रेम ,विवाह ,पत्नी की मृत्यु ,युद्ध ,शिव दर्शन ये उन्हें याद था।उन्हें बहुँत स्त्रियां पसंद किं किन्तु वो किसी के न हुए ,एक बार जब वे ॐ नमो नारायणाय जप रहे थे स्वतः ध्यान में शिवलिंग, शिव मूर्ति इत्यादि दिखने लगा,ॐ नमः शिवाय जपने के एक इच्छा सी होने लगी वे जपते चले गए इस प्रकार उनको शिव ने अपनी ओर खींचा।अपना पूर्वजन्म भी उनको शिव ध्यान में ही स्मरण कराये थे।उन्हें एक बार उनकी पत्नी दिखीं भी वे उन्हें देखकर पहचान गए उन्हें एहसास हुआ जैसे वो वहीं हैं किंतु अफसोस वो किसी और कि हो चुकी थीं।।

    हमारा विवाह यदि एक से हो तो यह आवश्यक नहीं कि हर जन्म में हमें वही मिलेगी ,साधु को उन स्त्री के सिवा किसी से प्यार न हुआ पर स्त्री को हो गया,इस प्रकार हर जन्म में पुरुषों के पत्नी ,भाई, बहन, माता, पिता बदलते हैं स्त्रियों के साथ भी ऐसा ही होता है।परंतु यदि आप शिव ,हरि से प्यार करते हैं तो वे कभी नहीं बदलते हम शरीर छोड़ने पर उन्हें भूल जाते हैं किंतु वे शरीर नहीं त्यागते हमें याद रखते हैं ।हमारे मन में उनके प्रति जो प्यार होता है वो बस सोया होता है परमात्मा हमे अपनी ओर किसी न किसी माध्यम से पुनः खींच लेते हैं और हमारा प्यार पुनः उनके प्रति जग जाता है।किंतु सांसारिक लोगों से प्यार करने पर उनको पाना अनिवार्य नहीं होता क्योंकि दोनों ही मरने पर भूल जाते हैं,इसलिये किसी से सच्चा प्यार करें न करें शिव, हरि इनसे जरूर करना चाहिये।

    उदाहरण-1.पहला जन्म श्रीदामा, दूसरा जन्म सुदामा तीसरा जन्म शंखचूड़ 2.पहले जन्म में महान तपस्वी साधु,दूसरे जन्म में भी व्रज की गोपिकाएँ जो कृष्ण से रास रचाईं,3.ध्रुव घमंड हुआ कि मैंने मात्र 6 महीने में हरि दर्शन किये श्रीहरि जी ने उनके शरीर के कंकालों के पहाड़ ही दिखा दिये इतने जन्म उनके हरि दर्शन हेतु तप करते बीते थे इत्यादि ।आपकी भक्ति प्रत्येक जन्म में बढ़ती है घटती नहीं यही कारण है कि एक समय ऐसा भी आता है जब जन्म लेते ही प्रभु भक्ति शुरू हो जाती है जैसे तुलसीदास जी जन्म लेते ही पहला शब्द राम बोले जिससे उनका बचपन का नाम रामबोला पड़ गया उनकी भक्ति की गहराई आप सभी जानते ही हैं ।शिव शिव शिव

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