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  • पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ,पंडित भया न कोय।

    जंगल मे एक शिवमंदिर था,वहाँ एक पंडित प्रात: काल सदैव पूजा करने आते थे। उसी जंगल में एक शिकारी भी शिकार किया करते थे ।एक दिन जब शिकारी शिकार पर निकले थे वे शिकार की खोज में घूमते घूमते सूरज ढलते मंदिर के पास पहुंचे। मंदिर वीरान था । न कोई लोग न ही दरवाजे इत्यादि , शिकारी सोचने लगे कि इस वीरान(सुनसान) जंगल में शिव अकेले हैं उनकी रक्षा करने वाला कोई भी नहीं, वे खरगोश का शिकार कर नरम नरम मांस और छत्ते से शहद निकाल उन्हें पत्ते के दोने में डाल मंदिर ले आये। उनके एक हाथ में मांस दूसरे में शहद था इसलिये वे शिवलिंग में समर्पित फूलों को पैरों से साफ किये, मुख में भरे पानी से शिव का अभिषेक किये फिर शहद और मांस के दोने शिवलिंग के पास रख सारी रात उनकी रखवारी कर सुबह होते ही चले गये।

    सुबह जब पुजारी आये तो मांस-शहद रखा देख क्रोधित हुए और पूरा मंदिर अपवित्र हो गया सोंच मंदिर को धोकर शिव
    की दूध ,जल,शहद इत्यादि से अभिषेक कर बेलपत्र समर्पित कर चले गये।शिकारी फिर शाम होते होते मंदिर पहुँचे और फिर उसी प्रकार जलाभिषेक,तथा भोजन देकर उनकी रात भर रखवाली करने लगे,सुबह पंडित क्रोधित हो पुन: मंदिर को धोने लगे।ऐसा कई दिनों तक चलता रहा । अब पुजारी मांस मंदिर में रखने वाले को पकड़ने के लिये छूपकर उनकी प्रतिक्षा करने लगे। शाम होने पर पुन: शिकारी आये उनके हाथों में शहद,खरगोश का गोश तथा मुख में जल था यह सब पुजारी पेड़ के पीछे से छुपकर देख रहे थे।

    शिकारी पुन: पहले की भाँति जलाभिषेक,फूल-पत्तों को साफ करना,मांस और शहद भेंट करना इत्यादि कार्य करने लगे, अचानक शिवलिंग की एक आँख से खून बहने लगा शिकारी को देखकर दुख हुआ वे वन से औषधीय पत्ते लाकर शिव की आँखों में लगाने लगे ,खून का बहना बंद न होता देख वे प्रेमवश अपनी एक आँख तीर से निकालकर शिवलिंग में बने आँख के ऊपर लगा दिये अब खून का बहना रुक गया, कुछ ही देर में शिव की दूसरी आँख से भी रक्त बहने लगे शिकारी पुन: अपना दुसरा नेत्र भी निकालकर उन्हें शिव के नेत्र के ऊपर लगा दिये।यह देख शिव,शिवलिंग से प्रकट हो गये और प्रसन्नता के कारण उन्हें अपने सीने से लगा लिये।यह सब पुजारी छूपकर देख रहे थे वे जीवनभर शिव - सेवा कर रहे थे किन्तु उन्हें शिवदर्शन नहीं हुए,शिकारी के कारण उन्हें आज दर्शन भी हो गये । वे शिकारी का प्रेम देख दूर से ही उनको प्रणाम कर
    आंखों में आँसू और हृदय में शिव के प्रति प्रेम लिये शिव गुण गाते घर चले गये।

    पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ,पंडित भया न कोय। ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय ।।
    वेद पुराण की मोटी - मोटी पोथियाँ पढ़ - पढ़ कर संसार के न जाने कितने लोग मर गये किन्तु उनमें से कोई भी पंडित (ईश्वर को सच मे जाननेवाले ) न हुए।
    परन्तु जो मात्र ढाई अक्षर प्रेम का पढ़ लेते हैं वहीं पंडित हो जाते हैं।। (प्रेम,प्यार शब्द में ढाई अक्षर ही हैं)
    सीख - परमात्मा प्यार और विश्वाश से मिलते हैं नियम मात्र से नहीं। परमात्मा की सेवा पुर्ण नियम से करने में तो ब्रम्हा भी असमर्थ हैं हम तो ब्रम्हा की रचना हैं हम कैसे समर्थ हो सकते हैं।शिव शिव शिव

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