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  • भक्तियोग महिमा

    श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार परमात्मा की प्राप्ति करने तथा संसार के जन्म-मृत्यु चक्र से मुक्ति पाने हेतु तीन मार्ग हैं। ज्ञानयोग,कर्मयोग तथा भक्तियोग । हम यहां भक्तियोग के संदर्भ में बात करेंगे किन्तु पहले जानते हैं योग क्या है। योग का तात्पर्य जुड़ने अर्थात मिलने से है । अत: वह मार्ग जो हमें परमात्मा से मिलाये योग कहलाता है। भक्ति मार्ग ,यह मार्ग अन्य दो मार्गों से श्रेष्ठ है । कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
    मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥ ४७॥
    कर्तव्य-कर्म करनेमें ही तेरा अधिकार है, फलोंमें कभी नहीं (अत: तू) कर्मफलका हेतु (भी) मत बन (और) तेरी कर्म न करनेमें (भी) आसक्ति न हो। यह मार्ग कर्मयोग का है अर्थात इस प्रकार बिना कर्म फल की इच्छा के कर्म करते हुए परमात्मा को प्राप्त किया जा सकता है,ऐसे साधक (प्रयत्नकर्ता) को कर्मयोगी कहते हैं। जातस्य हि ध्रुवो मृत्युध्रुवं जन्म मृतस्य च।
    तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि॥ २७॥
    कारण कि पैदा हुए की जरूर मृत्यु होगी और मरे हुए का जरूर जन्म होगा। अत: (इस जन्म-मरण-रूप परिवर्तनके प्रवाहका)निवारण नहीं हो सकता। (अत:) इस विषयमें तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये।
    अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत।
    अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना॥ २८॥
    हे भारत! सभी प्राणी जन्मसे पहले अप्रकट थे (और) मरनेके बाद अप्रकट हो जायँगे, केवल बीचमें ही प्रकट दीखते हैं। (अत:) इसमें शोक करनेकी बात ही क्या है? इस प्रकार के मार्ग से यदि परमात्म प्राप्ति का प्रयत्न किया जाये तो ऐसे साधक ज्ञानयोगी कहलाते हैं। किंतु मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
    मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे॥ ६५॥
    (तू) मेरा भक्त हो जा, मुझमें मनवाला (हो जा), मेरा पूजन करनेवाला (हो जा और) मुझे नमस्कार कर। (ऐसा करनेसे तू) मुझे ही प्राप्त हो जायगा (—यह मैं) तेरे सामने सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ; (क्योंकि तू) मेरा अत्यन्त प्रिय है। यह मार्ग भक्तियोग कहलाता है । भक्तियोग सर्वश्रेष्ठ मार्ग है परमात्मा को पाने का। यदि आप ज्ञान या कर्म द्वारा मुक्ति चाहते हैं तो आप को प्रयत्न स्वयं करना होगा आप जन्म मरण से अवश्य मुक्त होंगे किन्तु इसमें बहुत जन्म लगेंगे , यदि आप भक्ति द्वारा मुक्ति अथवा परमात्म प्राप्ति चाहते हैं तो इसमें अन्य मार्ग पर चलने की अपेक्षा कम समय लगेगा यह अन्य मार्गों से सरल भी है क्योंकि इसमें आप परमात्मा को पाएं यह आपका नहीं बल्कि परमात्मा का दायित्व (कर्तव्य) हो जाता है इसलिए हम सभी को उनकी सच्चे हृदय से भक्ति करनी चाहिए। हनुमान,नंदी,सुदामा,तुलसीदास, माता मीरा, व्रज की गोपिकाएँ ये सभी भक्तियोगी हैं । भगवदगीता हम सभी को पढ़ना चाहिए क्योंकि ये हमे परमात्मा तक पहुंचने का सरल मार्ग दिखाते हैं।गंगा माता तो हरि चरणों से निकली किन्तु गीता उनके मुख से निकली है। यह (गीता)स्वयं कृष्ण के विचार हैं उनका विचार ही धर्म है , धर्म बनाये नहीं जाते शाश्वत होते हैं कृष्ण वाणी शाश्वत धर्म हैं जिनके उपासक स्वयं शिव हैं। शिव शिव शिव

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