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  • सावन मास ओर शिव महिमा

    आज सावन का महीना शुरू हो गया है. इस साल सावन इसलिए भी खास है क्योंकि यह सोमवार से यानी आज से शुरू हो रहा है और इसका समापन भी सोमवार से ही हो रहा है. सावन के महीने में सोमवार भोलेनाथ की पूजा की सर्वाधिक महत्व है. सावन भगवान शिव का सबसे प्रिय महीना है, वहीं सावन में सोमवार के दिन भगवान शिव भगवान शिव एंव माता पार्वती के पूजन के साथ ही शिवलिंग की पूजा करने से भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है.सावन का महीना और भी कई कारणों से विशेष है क्योंकि इस दौरान भक्ति, आराधना तथा प्रकृति के कई रंग देखने को मिलते हैं। सावन में ही कई प्रमुख त्योहार जैसे- हरियाली अमावस्या, नागपंचमी तथा रक्षाबंधन आदि आते हैं, जो हमें प्रकृति, जीवों व रिश्तों का महत्व बताते हैं। सावन में प्रकृति का सौंदर्य अपने चरम सीमा पर पर होता है।
    इसलिए यह भी कहा जाता कि यह महीना प्रकृति को समझने व उसके निकट जाने का है। सावन की रिमझिम बारिश और प्राकृतिक वातावरण बरबस में मन में उल्लास व उमंग भर देती है। ज्योतिषियों के अनुसार, इस मास की पूर्णिमा पर श्रवण नक्षत्र का योग बनता है। इसलिए श्रवण नक्षत्र के नाम से इस माह का नाम श्रावण हुआ। यह महीना चातुर्मास के चार महीनों में बहुत शुभ माना जाता है।इस बार भगवान शिव का प्रिय माह सावन बेहद खास है. वजह है इस बार विशेष योग का बनना. दरअसल इस बार सावन माह में पांच सोमवार हैं. ये पवित्र माह सोमवार से ही शुरू हुआ है और सोमवार को ही इसका समापन (7 अगस्त) भी होगा. ये खास योग कई वर्षों के बाद ही बनता है.
    तीन सोमवार को सर्वार्थ सिद्धि योग
    इस बार सावन माह में तीन सोमवार सर्वार्थ सिद्धि योग बन रहे हैं. पहला सोमवार सर्वार्थ सिद्धि योग में शुरू होगा और आखिरी सोमवार के सर्वार्थ सिद्धि योग में खत्म भी होगा. सर्वार्थ सिद्धि योग का वक्त बेहद शुभ होता है. सर्वार्थ सिद्धि योग यानी अपने आप में सिद्ध. इस दिन की गई पूजा या हवन-यज्ञ का महत्व काफी अधिक होता है. शिव पुराण के अनुसार शिव-शक्ति का संयोग ही परमात्मा है। शिव की जो पराशक्ति है उससे चित्‌ शक्ति प्रकट होती है। चित्‌ शक्ति से आनंद शक्ति का प्रादुर्भाव होता है, आनंद शक्ति से इच्छाशक्ति का उद्भव हुआ है, इच्छाशक्ति से ज्ञानशक्ति और ज्ञानशक्ति से पांचवीं क्रियाशक्ति प्रकट हुई है। इन्हीं से निवृत्ति आदि कलाएं उत्पन्न हुई हैं। चित्‌ शक्ति से नाद और आनंदशक्ति से बिंदु का प्राकट्य बताया गया है। इच्छाशक्ति से 'म' कार प्रकट हुआ है। ज्ञानशक्ति से पांचवां स्वर 'उ' कार उत्पन्न हुआ है और क्रियाशक्ति से 'अ' कार की उत्पत्ति हुई है। इस प्रकार प्रणव (ॐ) की उत्पत्ति हुई है।
    शिव से ईशान उत्पन्न हुए हैं, ईशान से तत्पुरुष का प्रादुर्भाव हुआ है। तत्पुरुष से अघोर का, अघोर से वामदेव का और वामदेव से सद्योजात का प्राकट्य हुआ है। इस आदि अक्षर प्रणव से ही मूलभूत पांच स्वर और तैंतीस व्यजंन के रूप में अड़तीस अक्षरों का प्रादुर्भाव हुआ है। उत्पत्ति क्रम में ईशान से शांत्यतीताकला उत्पन्न हुई है। ईशान से चित्‌ शक्ति द्वारा मिथुनपंचक की उत्पत्ति होती है। और भक्ति की शक्ति से हर राह आसान हो जाती है सावन के महीने में शिव और पार्वती माता की पूजा करें अर्चना करें और भक्ति में डूब जाएं

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