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  • *श्रीराम* और *श्रीकृष्ण* दोनों हीं भगवान *विष्णु *के अवतार माने जाते हैं। यह कहानी भगवान के श्रीकृष्ण अवतार की है।

    द्वापर युग की बात है जब द्वारका में भगवान श्रीकृष्ण अपनी रानी *सत्यभामा* के साथ दरबार में बैठे थे। तभी सबके गुणों की चर्चा चल पड़ी। सभी ने अपने-अपने गुणों के बारे में भगवान को बताया।

    जब *सुदर्शन चक्र* की बारी आई तो उसने कहा कि मैं दुनिया का सबसे खतरनाक अस्त्र हूँ। मुझमे इन्द्र के वज्र को भी रोकने की क्षमता है। उसी तरह *गरूड़ *ने भी कहा कि इस पूरी सृष्टि में मुझसे तेज उड़ने वाला कोई नही है। मैं पलक झपकते हीं कहीं भी जा सकता हूँ। अब *सत्यभामा* की बारी आई तो उन्होने कहा कि मेरे जैसी खुबसूरत स्त्री इस पूरे संसार में दूसरी कोई नही है।

    श्रीकृष्ण समझ गए कि इन तीनों को अपने ताकत, गति और खुबसूरती का घमण्ड हो चुका है। इनका घमण्ड तोड़ना ही होगा। ये सोचकर भगवान ने गरूड़ से कहा कि मलय पर्वत पर मेरा *भक्त हनुमान* रहते हैं। तुम जाकर उनसे कहो कि श्रीराम ने उन्हे याद किया है और उन्हे अपने साथ लेकर आना। गरूड़ वहाँ से चले गए।

    फिर श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र से कहा कि तुम द्वार पर खड़े हो जाओ और बिना मेरी आज्ञा के किसी को अंदर मत आने देना। उसके बाद उन्होने सत्यभामा से कहा कि हनुमान आने वाले हैं इसलिए तुम अच्छे से तैयार हो कर आओ और खुद श्रीकृष्ण ने श्रीराम के रूप में सिंहासन पर विराजमान हो गए।

    उधर गरूड़ मलय पर्वत पर जाकर हनुमान जी से बोले कि प्रभु श्रीराम ने आपको याद किया है। यह सुनते हीं हनुमान जी तुरन्त उड़ने को तैयार हो गए तो गरूड़ ने कहा आप मेरे साथ चलिए, मैं आपको कुछ हीं पलों में वहाँ पहुँचा दूंगा। आप अपनी गति से आइयेगा तो देर हो जाएगी। हनुमान जी ने कहा आप आगे-आगे चलिए, मैं आपके पीछे-पीछे आता हूँ।

    गरूड़ चल दिए लेकिन हनुमान जी पवन गति से उड़कर गरूड़ से पहले हीं द्वारका पहुँच गए। अभी वो अन्दर जाने ही वाले थे कि सुदर्शन चक्र ने उन्हे रोक दिया। हनुमान जी जल्दी से जल्दी अपने प्रभु के दर्शन करना चाहते थे इसलिए उन्होने सुदर्शन चक्र से उलझे बिना उसे पकड़ कर अपने मूँह में दबा लिया और तेजी से दरबार में पहुँच गए।

    वहाँ जाकर उन्होने श्रीराम रूप धारी श्रीकृष्ण को प्रणाम किया। फिर सत्यभामा की तरफ देख कर बोले- प्रभु, माता सीता कहाँ हैं और यह आपने अपने बगल में किस दासी को स्थान दे रखा है। इतना सुनना था कि अपने को संसार की सबसे सुंदर स्त्री समझने का सत्यभामा का घमण्ड चूर चूर हो गया। इतने में गरूड़ भी वहाँ आ गए और वहाँ पहले से हनुमान जी को मौजूद देख कर सबसे तेज गति से उड़ने का उनका भी घमण्ड टूट गया।

    प्रभु ने पूछा, ये बताओ हनुमान जब तुम महल के अन्दर आ रहे थे तब तुम्हे किसी ने रोका नही था? प्रभु की बात सुनकर हनुमान बोले, "आपके सुदर्शन चक्र ने रोका तो था लेकिन मै आपके दर्शन के लिए इतना व्याकुल था कि सुदर्शन से उलझने में देर न हो जाए यह सोचकर मैने बिना उलझे उसे अपने मूँह में दबा लिया और यहाँ चला आया। इतना कहकर उन्होने मूँह से सुदर्शन चक्र को भी बाहर निकाल दिया। सबसे शक्तिशाली अस्त्र होने का सुदर्शन चक्र का भी घमण्ड टूट चुका था।

    सुदर्शन चक्र, गरूड़ और सत्यभामा समझ गए कि ये सारा खेल प्रभु ने उनके घमण्ड को तोड़ने के लिए हीं रचा था। फिर उन तीनों ने प्रभु से माफी मांगी। उसके बाद श्रीकृष्ण ने हनुमान जी से कुछ देर बात करने के बाद उन्हे भी विदा कर दिया। सच हीं कहा गया है कि भगवान अपने भक्तों का हमेशा हीं भला चाहते हैं।

    जय श्री राम।

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