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  • नन्दिकेश्वर अवतार

    ब्रम्हा जी ने कहा - हे नारद ! अब मैं तुम्हे नन्दिकेश्वर अवतार का वृत्तान्त कहता हूँ। शिलाद मुनि शिव जी के परम भक्त थे।शिव कृपा से वे महाधनी और ऐश्वर्यवान हुए,परंतु उनके कोई पुत्र नहीं था,इसलिए उन्होंने इंद्र की अत्यंत कठिन उपासना की।उनकी साधना से प्रसन्न होकर इंद्र ने उनसे कहा - हे शिलाद ! हम तुम पर अत्यन्त प्रसन्न हैं तुम वर मांगो। यह सुनकर शिलाद मुनि ने प्रणाम करके हाथ जोड़कर कहा - हे देवराज ! आप मुझे ऐसा पुत्र दीजिये जो माता के गर्भ से उत्पन्न न हो तथा सदैव अमर बना रहे। उस समय इंद्र ने कहा हे शिलाद हम ऐसा पुत्र नहीं दे सकते,हम तो केवल जन्मने मरने वाला और माता के गर्भ से उत्पन्न होने वाला ही पुत्र दे सकते हैं।
    हे नारद ! इंद्र के वचन सुन शिलाद मुनि बोले किन्तु मुझे तो ऐसा ही पुत्र चाहिए आप दे सकते हैं तो दें, अन्यथा रहने दें।तब इंद्र उनसे यह कहकर अपने लोक चले गए कि ऐसा पुत्र तुम्हें शिवजी द्वारा ही प्राप्त हो सकता है।
    तब शिलाद मुनि शिव की तपस्या करने लगे । वे निरन्तर एक दिव्य सहस्त्र वर्षों (एक दिव्य वर्ष मनुष्यलोक के लगभग एक युग के बराबर होता है।)तक उग्र तप करते रहे।(सतयुग की आयु कई करोड़ वर्षों की होती है उस समय साधारण मनुष्य की आयु कई हजार वर्ष होती थी,कलयुग में एक दिन,द्वापर में एक माह,त्रेता में एक वर्ष और सतयुग में दस वर्ष तप का फल बराबर होता है।सतयुग में लोगों को झूठ बोलना भी नहीं आता था न ही वे धन संचय करते थे उस समय खाने के सामान एक स्थान पर एकत्रित होते जिन्हें जितना चाहिए लेकर जाता,उस समय धर्म के चार पैर थे झूठ बोलने वाले उस समय के अत्यंत पापी मनुष्य कहलाते थे,अब कलयुग में केवल एक ही पैर धर्म के हैं शायद कोई न हो जो अब झूठ ही नहीं बोलते।)उनकी तपस्या से शिव प्रसन्न होकर उनके पास पहुँचे।जैसे ही उन्होंने शिलाद जी के शरीर से अपने हाथ का स्पर्श कराया वे पुन: पहले की तरह हृष्ट-पुष्ट हो गए।तदुपरान्त शिव जी ने उनसे पूछा - हे शिलाद ! तुम क्या चाहते हो? तुम जो मांगोगे हम वही देंगे।यह सुनकर शिलाद स्तुति एवं प्रार्थना करते हुए बोले - हे प्रभु ! मैं एक ऐसा पुत्र चाहता हूँ, जो माता के गर्भ के बिना उत्पन्न हो और कभी भी मृत्यु को प्राप्त न हो।
    हे नारद ! शिलाद के ऐसे वचन सुनकर शिवजी बोले - हे नारद ! संसार मे उत्पन्न होने वाला कोई भी जीव ऐसा नहीं है,जो मृत्यु के हाथ से बाकी बचा रहे।केवल हमीं मृत्युंजय हैं तथा बिना माता के गर्भ से उत्पन्न हुए हैं।इसलिए अब हम स्वयं ही तुम्हारे पुत्र होंगे,उस समय हमारा नाम नंदी होगा।ब्रम्हा ने भी हमारे पृथ्वी पर अवतार लेने के लिए पहले तपस्या की थी।तब हमने उन्हें यह वर दिया था कि समय पाकर हम पृथ्वी पर जन्म लेंगे।अस्तु,इस प्रकार हमारे अवतार लेने पर ब्रम्हा की इच्छा भी पूर्ण हो जाएगी और तुम्हारी अभिलाषा भी तृप्त होगी।अब तक हम संसार के पिता थे परंतु अब तुम हमारे पिता होगे। इतना कहकर शिवजी अन्तर्धान हो गए। उस समय शिलाद अत्यंत प्रसन्न हुए।
    कुछ समय बाद शिलाद जी एक यज्ञ किये उसी यज्ञ कुंड के बीच से प्रलयकाल की अग्नि के समान देदीप्यमान शिवजी की उत्पत्ति हुई।उनका स्वरूप ऐसा था कि उसे देखने से तीनों लोक मोहित हो जाते थे।उनके हाथों में शूल, शंख,गदा और असि तथा कानों में कुंडल विराजमान थे।वे देखने में बालक के समान प्रतीत होते थे।उस समय आकाश से पुष्प वर्षा होने लगी,अप्सरायें, किन्नर आदि नृत्य -गायन करने लगे , देवता स्तुति करने लगे।
    ब्रम्हा जी ने कहा कि - हे नारद ! उस बालक को देखकर शिलाद मुनि ने कहा - हे बालक ! तुमने उत्पन्न होकर मुझे अत्यंत आनंद प्रदान किया है,अत: तुम्हारा नाम नन्दी होगा।तुम साक्षात शिव स्वरूप हो अत: मैं तुमसे तुम्हारी भक्ति मांगता हूं । ऐसा कहकर शिलाद मुनि उनकी स्तुति करने लगे। तदुपरांत वे नंदी जी को लेकर अपने निवास स्थान चले गए । उस बीच नन्दी जी ने यह चरित्र किया कि वे अपने पहले शरीर को छोड़कर मनुष्य रूप धारण कर लिए।
    हे नारद ! शिलाद मुनि के घर आकर नंदी बालकों के समान खेलने लगे। जब वे दस वर्ष के हुए तो एक दिन शिव जी की आज्ञा से मित्रा तथा वरुण नामक दो मुनि शिलाद जी के समीप पहुँचकर यह कहने लगे - हे शिलाद मुनि ! यह बालक सम्पूर्ण विद्याओं का स्वामी होगा,परन्तु इसकी आयु बहुत कम है।इतना कहकर जब वे दोनों मुनि चले गए ,तब शिलाद अत्यन्त दुखी हो नन्दी से लिपटकर रोने लगे और बार बार मूर्छित होने लगे । उस समय नंदी बोले - हे पिता ! आप व्याकुल न हों । हम शिव जी की सेवा करके काल को जीत लेंगे और आपकी चिंता को दूर करेंगे। इतना कहकर नंदी रुद्रजप करने लगे। उस जप के प्रभाव से शिवजी गिरिजा माँ सहित उनके समीप आये और उन्हें संबोधित करते हुए इस प्रकार कहने लगे - हे नन्दी ! तुम्हे मृत्यु का कोई भय नहीं है तुम साक्षात मृत्युंजय हो और तीनों लोकों में तुम्हें कुछ भी भय नहीं है। इतना कहकर शिव जी नंदी जी को हाथों से स्पर्श किये तदुपरान्त उन्होंने गिरिजा माँ एवं सब गणों की ओर देखते हुए यह कहा - हे प्रियजनों यह नन्दीश्वर मृत्यु से रहित होकर मेरे पास रहकर मुझे बहुँत प्रिय होगा। इतना कहकर शिव जी ने अपनी माला नंदी जी के कंठ में पहना दी।तब नंदी जी उस समय तीन नेत्र और दस भुजाधारी शिव जी के समान स्वरुपवान हो गए । उस समय शिवजी ने नंदी जी का हाथ पकड़कर अपनी जटा के ऊपर से थोड़ा सा पानी छोड़ दिया।उन पानी से अनेक नदियाँ बहने लगीं।
    हे नारद ! उनके नाम जटोदक,त्रिसत्रोता,वृषध्वनी, स्वर्णोद्क तथा जटक हुए।उस स्थान पर नन्दीश्वर जी ने शिवलिंग स्थापित किये थे जो भुवनेश्वर के नाम से विख्यात हुए और वह स्थान भी सरमद नामक तीर्थ के रूप में अत्यन्त पूज्य हुआ।
    शिव जी की आज्ञा से सभी शिवगण उन शिवपुत्र नंदी जी का अभिषेक करने लगे और उन्हें अपना अधिपति स्वीकार किये। उस समय मैं , विष्णु जी तथा अन्य सब देवता भी वहां जा पहुंचे और शिव जी की स्तुति करते हुए यह कहने लगे कि हे प्रभो ! जो आपने नन्दीश्वर के ऊपर कृपा की है वह सर्वथा प्रशंसनीय है।ये नन्दीश्वर साक्षात आपके ही स्वरूप हैं।अस्तु, हम सब इन्हें प्रणाम करते हैं । इतना कहकर हम लोगों ने नन्दीश्वर का अभिषेक किया।तदुपरान्त शिव जी की इच्छा जानकर मैंने मरुत की कन्या सुयशा के सांथ नंदी का विवाह करा दिया । उस विवाह में बड़ा उत्सव मनाया गया।तदुपरान्त नन्दीश्वर अपनी पत्नी के साथ सिंहासन पर विराजमान हुए और सब लोग उन्हें भेंट देने लगे । लक्ष्मी माता ने नंदी जी को मुकुट आदि भूषण दिए,गिरिजा माँ अपने कंठ का हार दीं, विष्णु जी ने रथ की ध्वजा दी तथा मैंने स्वर्णहार पहनाया।
    इस प्रकार जब अन्य सब लोग भी नंदी जी को भेंट दे चुके ,तब शिवजी उन्हें परिवार सहित अपनी पूरी को ले गए।तब से वे वहीं रहकर शिवजी - गिरिजा माँ का ध्यान किया करते हैंऔर उन्हीं की सेवा में संलग्न रहते हैं। हे नारद ! इस तैंतालिसवे शिव अवतार की कथा को जो व्यक्ति मन लगाकर पढ़ता,सुनता अथवा किसी दूसरे को सुनता है, वह इस लोक में सुख पाकर अंत में शिवलोक को प्राप्त होता है। शिव शिव शिव।।

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