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  • स्वप्न अपनों के लिये

    शिव दास

    हमारे घर के बगल में छोटा सा मैदान है जहाँ लोग दूर से आकर बसे हैं, इनके कार्य मुझे पता नहीं किन्तु यहां की स्त्रियां मेरे घर में किचन के पास भिक्षा मांगने आयी हैं।वे झूठ बोल रही हैं भिक्षा लेने हेतु,मुझे अच्छा नहीं लग रहा न ही मेरे घर वालों को मैंने उन्हें खाली हाथ भेज दिया । वहीं उनके जाने के बाद एक स्त्री दिखीं वे मुझे सहीं लगीं ।

    मुझे उनकी गरीबी पर दया आ रहा है,मैं उन्हें कुछ देना चाहता हूँ सोंचा की क्यों न उन्हें शिवलिंग ही दे दूं शिव पूजा से उनकी सारी गरीबी चली जायेगी । नहीं किसी पर इतना दया आये की मैं उन्हें अपना आराध्य ही दे दूं यह सहीं नहीं। मैं उन्हें शिवलिंग जी के पास रखी नंदी भैया की मूर्ति,त्रिशुल या हनुमान जी के पास रखी उनकी गदा देने की सोंच रहा हूँ। पर मम्मी बहुँत डाँटेगी ये सभी चाँदी से बनी हैं जो महंगी है , कितना लाचार हूँ मैं बेचारी भिक्षुक माता को देने के लिए कुछ नहीं मेरे पास। मम्मी देने के लिए कुर्सी में तांबे की कुछ रखी है (क्या था अब याद नहीं) वह पाँच या छ: piece ही है लग रहा है वो भिक्षा मांगने वाली माता एक नहीं सात स्त्रियां हैं । मैं एक और शिव जी से संबंधित वह सामान ढूँढने लगा। बहन आकर बोल रही है कि वो माता चोरी कर रहीं थीं मम्मी और मैं उन्हें देख रहे हैं वो सामने खड़ी हैं। लगा जैसे हॉल और टी.वी.रूम में कैमरा लगा है बहन उसी से देखीं।

    मुझे अब उन पर गुस्सा आ रहा है मैं उन्हें जाने के लिये बोल रहा हूँ मम्मी भी उन्हें डाँट रही हैं,माता बोलीं तुम लोग एक चीज भी दान नहीं कर सकते ? आप चोरी कर रहीं थीं मन में सोंच शांत रहा वो चली गयीं।

    एक बच्चा है जो मेन दरवाजे के बाहर खड़ा है उनके सांथ एक बच्चा और है दोनों क्रमश: 5 या 6 तथा 7 या 8 साल के लग रहे हैं। 5 - 6 साल का बच्चा हमारे लोहे के मेन दरवाजे को कंधे से धक्का दे रहा है मैं दरवाजे के अंदर की तरफ (घर में) हूँ पर बाहर सब दिख रहा है नहीं पता कैसे ? मैं दरवाजे का सिटकिनी बन्द कर दरवाजे से सटा हुआ देख रहा हूँ।वो बच्चा उस लोहे के दरवाजे को केवल भुजा से धक्का देकर अंदर की तरफ मोड़ दिया मुझे विश्वास नहीं हो रहा है मैं भग कर अंदर आया एक और लोहे का दरवाजा है उसे सिटकिनी देकर बन्द कर दिया वो उसे भी अंदर की तरफ मोड़ दिया मुड़ने से बनीं छोटी जगह से दोनों बच्चे अंदर घुस गए। ये लगभग तीन - चार बार हो रहा है बड़ा बच्चा बस उसके सांथ खड़ा है और उसके सांथ अंदर आ रहा है अब मुझे गुस्सा आया मैं स्वयं उस बच्चे को रोकने लगा मैं पूरा उससे लिपट गया हूँ दोनों जमीन पर गिर गए पर उसे भीतर की ओर आगे बढ़ने से रोक नहीं पा रहा । अजीब बात है न मैं उसे मार रहा हूँ न वो मुझे मैं रोकने की पूरी कोशिश कर रहा हूँ और वो अंदर आने का, दूसरा बच्चा बगल में खड़ा देख रहा है वो उसके सांथ ही आगे बढ़ता है। मैं सोंच रहा हूँ कि मेरा यह शरीर युवा है और मैं अन्यों की तुलना में थोड़ा ज्यादा ताकतवर हूँ कम ही लोग हैं जो मुझे सकते हैं (शारीरिक गुण के प्रति भरोसा या शायद घमंड) ये छोटे से शरीर में स्थित है ये कैसे मुझे सक रहा है (सामना कर रहा है)। जब फिर से ऐसा हुआ तो मैं फिर से मेन डोर पर हूँ देख रहा हूँ कि कोई व्यक्ति हैं जो उन्हें ऐसा करने को बोल रहे हैं बच्चे के सिर में दो सिंघ हैं जिसे वो गुस्से में छू रहा है फिर उससे दरवाजे को मार रहा है उसके बाद कंधे से धक्का दे लोहे के दरवाजे को मोड़ रहा है अंदर घुसने लायक जगह बनने पर वो और उसका साथी अंदर उसी जगह से आ रहे हैं मैं यहाँ अपनी बुद्धि का उपयोग किया (जल्दी - जल्दी सिटकिनी बंद करने में)और शारीरिक बल का भी उपयोग कर रहा हूँ (उसे रोकने तथा दरवाजे से सटकर खड़े होने में) पर उसे रोक पाने में असमर्थ हूँ । शिव से प्रार्थना करूँ की वो हमारा रक्षा करें या शिव नाम बल से उन्हें रोकूँ ऐसा विचार नहीं आ रहा।

    वे दोनों बच्चे किचन के पास आ गए उनके सांथ वो व्यक्ति भी हैं जो उन्हें अंदर आने के लिए उकसा रहे थे मुझे वो उनके पिता लग रहे हैं और ऐसा भी लग रहा है जैसे वे पिता शिव हैं। वे भिक्षुक माता जो चोरी कर रहीं हैं सोंच मैं जाने के लिए बोला वो माँ थीं ऐसा लगा । शायदिसलिये वो बच्चे घर में जबर्दस्ती घुसे हैं।

    पिताजी, माँ को घर से खाली हाँथ जाने के लिये कहने पर मम्मी से बातों से विवाद कर रहे हैं (शिव को पिता माना पार्वती माँ को माँ यह मेरा उनसे रिश्ता है कहते हैं आप उनसे प्रेम कीजिये उन्हें अपना मानिये वे आपसे प्रेम करेंगे,अपना मानेंगे इसलिये मैं उन्हें माँ - पिताजी मानता हूँ।) मम्मी भी गुस्सा कर उनसे विवाद कर रही हैं,दोनों बच्चे अब खड़े - खड़े देख रहे हैं । मैं शान्त होने के लिए बोल रहा हूँ दोनों ही नहीं शान्त हो रहे मैं जोर - जोर से चिल्ला रहा हूँ शान्त करने के लिये, परंतु कोई मेरी ओर ध्यान ही नहीं दे रहे। बड़ी मुश्किल से दोनों शांत हुए अब मैं हाँथ जोड़कर पिताजी से माफी मांग रहा हूँ मुझे और मेरे परिवार को माफ कर दीजिए कहकर। वे ठीक है जैसा कुछ बोल कर बच्चों को लेकर चले गये। मुझे उस समय बिल्कुल ध्यान नहीं आया कि वो मेरे पिता हैं न ही ये ध्यान आया कि वो मेरी माँ थीं।

    मैं उस बच्चे को बाहर निकल उस लोहे के दरवाजे के पास खड़ा - खड़ा देख रहा हूँ।वो अन्य बच्चों के साँथ खेल रहे हैं हैं उनका छोटा सा शरीर है हाथ ,पैर, गाल इत्यादि एक मोटे शरीर वाले बच्चे की तरह गोल - मटोल है पर वे मोटे नहीं हैं उनका रंग साँवला है। पिता भी साधारण लग रहे थे हल्का काला रंग,मुंछ, सामान्य सा कद माँ भी साधारण स्त्री की तरह लग रहीं थीं छोटे बच्चे का सांथी एकदम दुबला - पतला और छोटे से बच्चे से लम्बा था इसलिए वो मुझे छोटे बच्चे से आयु में बड़ा लग रहा था।

    यह एक स्वप्न है जिसे आज दोपहर को देखा करीब 6 - 6:30 बजे सोकर उठा । कल नन्दिकेश्वर अवतार लिख रहा था दोपहर को । सोंच रहा था भगवद्गीता पढ़ लूँ पर कथा लम्बी थी शिव महापुराण से देखकर लिख रहा था इसी में लगभग 7 बज गये फिर रात को आलस्य के कारण भगवद्गीता भी नहीं पढ़ा। लगता है नन्दिकेश्वर कथा लिखने के कारण नंदी भैया स्वप्न दिये। वो बच्चा मुझे नंदी जी ही लग रहे हैं और वे स्त्री - पुरुष शिव - माँ । नंदी भैया की कथा लिखा,लोग पढ़ें होंगे शायद इसलिए भैया ऐसा स्वप्न दिए स्वप्न का मतलब तो समझ नहीं आया पर इतना जरूर पता है कि कथा लिखना उन्हें अच्छा लगा। आप सभी को भी ऐसी कथाएँ लिखनी चाहिये जिसके विषय में आपको लगता है कि लोग इन्हें पढ़ेंगे तो उनका कुछ भला होगा । आवश्यक नहीं कि केवल हरिभक्ति या शिवभक्ति ही उनकी सेवा है उनके भक्तों की सेवा करना भी उनकी प्रसन्नता का कारण होता है। मैंने नन्दिकेश्वर कथा लिखी शायद उन्हें पढ़कर शिव - नंदी जी के प्रति किसी के मन में भक्ति जगी हो या उनका कुछ हित हुआ हो इसलिए ऐसा स्वप्न भैया दिये।

    कथाएँ लिखिये अन्यों की कथाएँ पढ़िये,प्रश्नों के उत्तर दीजिये,फ़ोटो देखिये । कमेंट या लाइक करना न करना आपकी इच्छा है यह भी एक प्रकार की भक्ति ही है आपके कारण कुछ लोगों के मन में हरि अथवा शिव भक्ति जग सकती है तो ये कितनी अच्छी बात है। जैसे हमें कोई अच्छा लगे और अन्य कोई उनका भला करने का कशिश करे तो हमें अच्छा लगेगा ऐसे ही हम सभी भी तो हरि - लक्ष्मी माता के हैं, शिव - माँ के हैं उनके भक्तों की सेवा का प्रयत्न अवश्य उनकी प्रसन्नता का कारण होगा। किन्तु इस सेवा का सात्विक होना अत्यंत आवश्यक है इनसे वे ज्यादा प्रसन्न होंगे राजसी में कम तामस भाव से सेवा तो आप बिल्कुल मत कीजियेगा । सत भाव का फल 100 है तो रजभाव का फल केवल 10 और तम का फल को मात्र 1 ही है इसलिए सात्विक भाव से भक्तों की सेवा ही उचित है।

    आप सभी शिव - हरि भक्तों तथा आपमें स्थित मेरे आराध्यों को मेरा कोटि - कोटि नमन। शिव शिव शिव ...

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