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  • जन्म - मरण चक्र (एक ईश्वरीय खेल)

    यह ज्ञान अत्यंत गोपनीय है इनको जानकर सावधान साधक जन्म मरण चक्र से मुक्त हो जाता है।
    परमात्मा का खेल भी निराला है मैं आपको जिस खेल के बारे में बता रहा हूँ वह मानव या देव रचित नहीं स्वयं परमात्मा जिन्हें हम शिव कृष्ण आदि नामों से पुकारते हैं द्वारा रचित है।
    संसार में दो रूप है परमात्मा का जिसे हम जड़ और चेतन कहते हैं। यहां जिनमें मन, बुद्धि,पंच इन्द्रियाँ नहीं वे जड़ हैं तथा जिनमें चेतना अर्थात मन,बुद्धि,इन्द्रियाँ इत्यादि हैं वे चेतन हैं।
    जड़ परमात्मा के ही रूप हैं जड़ को आप निर्जीव भी कह सकते हैं यह शरीर,अन्य वस्तु इत्यादि जड़ हैं इनमें परमात्मा को समझने की सामर्थ्य नहीं है।
    चेतन हम सभी हैं क्योंकि हममें मन, बुद्धि,अहंकार,इन्द्रियाँ इत्यादि है सरल शब्दों में कहें तो हममें चेतना है।हम शरीर नहीं आत्मा हैं। संसार चक्र में फँसे होने के कारण जीवात्मा नाम से संबोधित होते हैं । श्रीकृष्ण गीता 15 वें अध्याय में पुरुष (इसका अर्थ गीता में आत्मा है)नाम से संबोधित कर रहे हैं।हममें परमात्मा को जानने,उनके दर्शन करने तथा उनको प्राप्त होने हेतु सामर्थ्य है इसलिए हम परमात्मा की जड़ प्रकृति से श्रेष्ठ हैं।
    परमात्मा हमसे भी अत्यन्त श्रेष्ठ हैं हम चेतन और शरीर इत्यादि जड़ प्रकृति उनके ही अंश हैं।वे हम आत्मा से परम् श्रेष्ठ होने के कारण परम आत्मा (परमात्मा)तथा हमसे परम श्रेष्ठ (उत्तम) होने के कारण पुरुषोत्तम नाम से संबोधित किये जाते हैं ।इनका विस्तार आप श्रीमद्भगवद्गीता में 15वें अध्याय पुरुषोत्तम योग में देख सकते हैं।
    मैं यहाँ उनके खेल की बात कर रहा हूँ वे ही जड़ और चेतन रूप में संसार में स्थित हैं वे ही संसार,ब्रम्हांड तथा सम्पूर्ण अंतरिक्ष भी वे ही हैं।ऐसा कुछ या कोई नहीं जिनमें वे नहीं क्योंकि सब उनसे ही निर्मित (अंश) है।
    परमात्मा के ये दो प्रकार के कर्म हैं सत और असत इनके दो प्रकार के फल हैं पूण्य और पाप जिनसे दो प्रकार की गति होती है सद्गति और दुर्गति । शुभ कर्म की अधिकता आपको स्वर्ग तथा उससे ऊँचे लोकों की प्राप्ति करायेगी इस पुण्य के बल पर ब्रम्हा जी के लोक भी जाया जा सकता है किंतु ध्यान रहे जितने ऊंचे लोक उतनी तीव्रता से पुण्य का नाश । पूण्य को आप धन समझ सकते हैं जिसके अनुसार शरीर,स्वर्ग इत्यादि प्राप्त होते हैं। जब कर्म गलत होने लगते हैं तो उसका फल पाप होता है इनके कारण दुर्गति होती है पशु इत्यादि मूढ़ योनि प्राप्त होता है ज्यादा ही पाप हो तो उसे शीघ्रता से काटने के लिए नरकों की रचना की गयी उतने शुभलोक नहीं जितने नर्क हैं।
    केवल मनुष्य जन्म कर्मजन्म है इसमें आप पूर्वकृत कर्म के शुभ अशुभ फल भोगते हैं और सांथ में नए कर्म भी करते हैं। देव योनियाँ , पशु योनियाँ ये सभी केवल भोग योनि हैं आप केवल पूर्वकृत (पहले जन्मों में किये कर्म)का फल ही भोगेंगे नवीन कर्म का इस जन्म में आपको अधिकार नहीं।पाप पुण्य दोनों नाशवान फल हैं अर्थात खर्च होते जाते हैं।
    किन्तु यदि आप जन्म मरण चक्र से मुक्ति या परमात्मा की प्राप्ति चाहते हैं तो यह देने में पूण्य तथा पाप दोनों ही असमर्थ हैं इसके लिए आपको भक्ति करनी होगी सत्य यह है कि जब मनुष्य के सारे कर्म ज्ञान द्वारा अकर्म हो जाते हैं तब मनुष्य केवल मुक्ति प्राप्त करता है किंतु परमात्मा कदापि नहीं।भक्ति में परमात्मा आपको (आप अर्थात पुरुष,आत्मा को ) जीवन चक्र से मुक्ति तथा परमात्म प्राप्ति दोनों कराते हैं इस समय हमारा पूण्य पाप शून्य हो जाता है और हम उनके इस जन्म मरण चक्र रूपी अत्यंत विशाल खेल जिसमें पाप पुण्य, इनके भोगने हेतु शुभ अशुभ लोक (स्वर्ग, नर्क इत्यादि) इत्यादि से मुक्त हो अपने शांत स्वरूप को प्राप्त होते हैं।इसलिये यदि आप मुक्ति(मोक्ष) या परमात्मा चाहते हैं तो भक्ति के पीछे भागिए पूण्य के नहीं।यहाँ परमात्म भक्ति भी सत्कर्म कहलाता है किंतु पहले जिस कर्म का बात किया वो ये सत्कर्म नहीं, उनकी भक्ति विषय से अलग किये शुभ कर्म हैं।आशा करता हूँ आपको यह अत्यंत गोपनीय ज्ञान समझ में आया होगा । मैं इसे सरल शब्दों में समझाने का पूरा कोशिश किया । आप भगवद्गीता पढ़ इस ज्ञान को अच्छे से समझ सकते हैं ।जय श्री शिव - हरि । शिव शिव शिव...

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