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  • अहंकार

    hamindra Nilofer

    .

    ये बात उस समय की है

    जब महाभारत का युद्ध

    समाप्त होने के बाद

    पांडवो ने अश्मेघ यज्ञ

    किया !

    .

    "भगवान् श्रीकृष्ण" जी

    ने कहा :- ये यज्ञ तब पूरा

    माना जायेगा जब इस धरा

    के सभी ऋषि यहाँ भोजन

    ग्रहण करेंगे और आसमान

    में घंटा बजेगा !

    .

    तब पांडवो ने सभी ऋषियों

    को भोजन करवाया परन्तु

    घंटा नहीं बजा,

    .

    तब उन्होंने "भगवान् श्रीकृष्ण"

    जी से पूछा की कहाँ कमी

    रह गई !

    .

    तब "भगवान् श्रीकृष्ण"

    जी ने अंतर्ध्यान हो कर देखा

    और कहा की :-

    .

    दूर एक जंगल में सुपच नाम

    के महामुनि बैठे है वो रह

    गए है इसलिये घंटा नहीं बजा !

    .

    पांडवो ने दूत भेजकर

    महामुनि को भोजन के लिए

    निमंत्रण भेजा

    .

    ऋषिसुपच ने दूत को कहा

    की उनको स्वयं आना चाहिए

    था और दूत को वापिस भेज

    दिया !

    .

    तब पांडवो ने स्वयं महामुनि

    को भोजन के लिए निमंत्रण

    दिया !

    .

    परन्तु ऋषिसुपच ने शर्त रखी

    की वे तब ही जायेंगे जब

    उन्हें १०० अश्वमेघ

    यज्ञो का फल मिलेगा

    .

    पांडव परेशान हो कर वापिस

    आ गए सारी बात "भगवान्

    श्रीकृष्ण" जी को बताई !

    .

    जब ये बात द्रौपदी को पता

    लगी तो द्रौपदी ने कहा ये मेरे

    ऊपर छोड दो !

    .

    तब द्रौपदी ने नंगे पैर कुए से

    पानी लाकर खाना पकाया

    और नंगे पैर चल कर

    ऋषिसुपच को बुलाने के

    लिए गई

    .

    वहा ऋषिसुपच ने फिर वही

    शर्त बताई तो द्रौपदी ने कहा

    की मैंने आप जैसे किसी

    साधू से सुना है की जब कोई

    नंगे पैर आप जैसे किसी महान

    संत के दर्शन करने जाता है..

    .

    तो उसका एक एक कदम

    एक एक अश्वमेघ यज्ञ के

    बराबर है इस तरह आप

    अपने १०० अश्वमेघ यज्ञ का

    फल लेकर बाकि मुझे दे दे !

    .

    इस तरह मुनि सुपच जी द्रौपदी

    की बात सुनकर द्रोपदी के

    साथ आ गए

    .

    जब उनको खाना परोसा गया

    तो उन्होंने पांडवो और सारी

    रानियों द्वारा बनाये गए खाने

    को मिला लिया और खाना

    शुरू कर दिया ,

    .

    ये सब देखकर द्रौपदी के मन

    आया की अगर एक एक करके

    खाते तो द्रौपदी द्वारा बनाये गए

    खाने के स्वाद का भी पता

    लगता की कितना स्वादिष्ट

    बना है !

    .

    इस दोरान ऋषि ने खाना

    समाप्त कर दिया परन्तु घंटा

    फिर भी नहीं बजा !

    .

    तो पांडवो ने "भगवान्

    श्रीकृष्ण" जी से पूछा की

    अब क्या कमी रह गई ?

    .

    "भगवान् श्रीकृष्ण"

    ने कहा की ये तो सुपच जी

    ही बतायेगे !

    .

    इस पर ऋषिसुपच ने उन्हे

    जवाब दिया की ये तो द्रौपदी

    से पूछ लो की घंटा क्यों नहीं

    बजा !

    .

    इस तरह जब द्रौपदी को इस

    बात का अहसास हुआ तो

    उन्होंने सुपच जी से अपने

    अहंकार के लिए माफ़ी मांगी

    तो आसमान में घंटा बजा और

    उनका यज्ञ पूरा हुआ !

    .

    इस वृतांत के ज़रिये संतो

    द्वारा बताया गया है की संत

    महात्मा स्वाद को महत्व न

    देकर श्रधा को देखते है और

    प्रभु से आत्मा के मिलाप में

    अहंकार सबसे बड़ा रोड़ा है...

    राधे राधे 🙏

    🌺🌹🌺🌹🌺🌹🌺🌹🌺🌹🌺🌹

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