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  • ऐसा भक्त जिसके कारण हनुमान जी को मिला सिख

    शिव दास

    एक समय की बात है एक व्यक्ति नित्य प्रतिदिन राम नाम भजते थे।उनके भजने का कोई नियम न था। वे सोकर उठते तो उनके मुख से राम नाम उच्चारण शुरू हो जाता ,उन्हें ध्यान भी न रहता कि वे नाम जप रहे हैं। बहुत लंबे समय से वे राम नाम का रसपान कर रहे थे अब उन्हें इनका आदत हो चुका था।जैसे हम नित्य सांस लेते हैं, मन में बहुत से विचार करते हैं किंतु वे हमें याद नहीं रहते ऐसी ही दशा उनकी भी हो गयी थी।

    एक दिन वे प्रात:काल उठकर शौचादि कार्यों से निवृत्त होने चले गए किन्तु उनके मन में राम नाम जप चल रहा था।वहाँ से हनुमान जी गुजर रहे थे अचानक राम राम सुन उनके मन मे उन भक्त के दर्शन करने की इच्छा हुई।

    उन भक्त को उस दशा में नाम जपते देख उन्हें बहुत गुस्सा आया।मेरे प्रभु का नाम लेने के लिए आपको यही समय मिला है सोंचकर वे उन्हें सबक सिखाने का विचार करने लगे । हनुमान जी उन पर जोर से गदा का प्रहार किए, गदा उनके शरीर से पार हो गया,वे पुन: प्रयास किये किन्तु पुन: गदा उनका कुछ बिगाड़ न सका , ऐसा वे कई बार किये किन्तु वे उन भक्त को सबक सिखाने में असमर्थ रहे । वे भक्त, हनुमानजी को देख नहीं पा रहे थे इसलिए उन्हें इस घटना की कोई जानकारी नहीं हुई।

    हनुमान जी को बहुत आश्चर्य हुआ वे इसका कारण विष्णु जी से पूछने वैकुण्ठ चले गये।वैकुण्ठ में राम स्वरूप विष्णु जी शेष शय्या पर लेटे थे माता सीता स्वरूपा लक्ष्मी माता उनके चरण दबा रहीं थीं।हनुमान जी को आया देख विष्णु जी उन्हें पास बुलाये और बैठने को बोले । हनुमान जी उनसे पूछना चाहते थे की वे भक्त को चोट क्यो नहीं पहुंचा पाये । परन्तु राम जी के गाल पर चोट का निशान देख वे बहुत दुखी हुए और हाँथ जोड़कर राम जी से पूछने लगे - हे प्रभु ! आपकी ऐसी दशा किसने किया । राम मुस्कुराते हुए बोले - हनुमान ! मेरी ऐसी दशा तुम्हारे गदा के प्रहार से हुआ है।हनुमान को अब और भी आश्चर्य हुआ वे समझ न सकें।राम उनकी शंका का समाधान करते हुए बोले - तुमने जो प्रहार मेरे भक्त पर किया उससे ही मेरा यह दशा हुआ है।

    हनुमान जी के द्वारा इसका कारण पूछने पर राम बोले - हे हनुमान ! जिस समय तुम मेरे भक्त पर प्रहार कर रहे थे उस समय वह मेरे नाम के जप में लीन था , इसलिए उस पर हुआ प्रहार मुझे सहना पड़ा । जो भी भक्त जिस भी दशा में मुझे प्रेम और विश्वास से याद करते हैं उनकी सुरक्षा तथा उनका कल्याण करना मेरा परम् कर्तव्य हो जाता है।

    हनुमान जी यह सुनकर रोने लगे और राम जी से क्षमा माँगे। तब राम जी बोले - हे हनुमान इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं है मैंने ही नाम की महिमा तुम्हें समझाने के लिए यह लीला की थी। राम जी को लगा चोट अब ठीक हो गया था क्योंकि यह रामलीला थी।

    जय श्रीराम जय माता सीता जय हनुमान । शिव शिव शिव...

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