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  • क्या दानव होना दुष्टता की निशानी है ?

    Akash Mittal

    नहीं। दानव, मानव, देवता ये तीन विभाजन हैं श्रष्टि के। किसी भी कुल का नाम या बदनाम उसके सदस्य ही करते हैं। सबके रचइता ईश्वर है जो न देव है, न दानव और न मानव। और उन्हें इन तीनो में कोई भेद नहीं है।

    दानव कुल दुष्ट नहीं है अपितु उसके सदस्य अपने अभिमान, लोभ, और घृणा में दुष्टता कर देते हैं। परन्तु उसी दानव कुल में कुछ सदस्य ऐसे हुए हैं जिन्होंने उस कुल का नाम रोशन किया है। उन्होंने ईश्वर को समझा है और अपना प्रिय माना है।

    प्रहलाद, जो दानव कुल में जन्मे श्री हरी के भक्त थे। जिसकी रक्षा के लिए श्री हरी बार बार पृथ्वी पर आते थे। उस प्रहलाद ने अपने कुल का नाम रोशन किया और दुनिया को बताया कि दानव कुल में पैदा होना दुष्टता की निशानी नहीं है।

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    राजा बली जो प्रहलाद के पोते थे उन्होंने तीनो लोक जीत लिए थे। तीनों लोकों के आधिपति थे पर दानवीर और वचन के पक्के होने के कारण सब कुछ श्री हरी को दान कर दिया और अंत में अपने आप को भी। उस राजा बली ने अपने कुल का नाम रोशन किया।

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    रावण, जिसका बल अपार था, जो शिव का सबसे बड़ा भक्त था, जो ज्ञान में सर्वोपरि था, जो हर विद्या का ज्ञाता था उसने अपने शिव प्रेम में एक भूल कर दी। अपने इष्ट को अपने साथ लंका ले जाना चाहता था। गणेश जी को रोकना पड़ा जो उसे छल लगा और अपने अभिमान और घृणा के कारण मूर्खता पर मूर्खता करता चला गया। उसी रावण ने संसार को शिव तांडव स्त्रोत दिया जो शिव को अत्यंत प्रिय है। उस रावण ने कुल का नाम रोशन किया और उसे बदनाम भी।

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    घटोत्कछ, जो एक राक्षसी का पुत्र था उसने धर्म के लिए अमोक वाशवी शक्ति को अपने काका अर्जुन के स्थान पर स्वयं के ऊपर ले लिया और धर्म के इस युद्ध में अमोक बलिदान दिया। उसने अपने कुल, अपने पिता, अपनी माता और श्री कृष्ण, सबका नाम रोशन किया।

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    विभीषण, दानव कुल में जन्मे, रावण के भाई। धर्म के लिए भाई का साथ छोड़ दिया और युद्ध के अंतिम निर्णायक बने। अपने कुल को नयी दिशा दी।

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    वाणासुर, जिन्हे हम शिव पुत्र के नाम से भी जानते हैं। इनसे युद्ध जीतना असंभव है क्योंकि इनकी रक्षा स्वयं महादेव करते हैं। अपनी मूर्खता के चलते इन्होने शिव को अपने प्रिय श्री हरी के विरुद्ध युद्ध करने को विवश कर दिया था। परन्तु अपनी भूल का एहसास हुआ और अंततः श्री कृष्ण के रिश्तेदार बने।

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    ऐसे अनगिनत उधारण हैं जो बताते हैं कि किसी भी कुल में जन्म लेना आपका निर्णय नहीं होता परन्तु आपको जीवन कैसे जीना है वो आप पर ही निर्भर करता है। दानवों को हमेशा ऐसा लगता था कि उनके साथ छल हो रहा है। इसीलिए वो मूर्खता करते थे। किसी दानव पुत्र का मन चाहे कैसा भी हो परन्तु जब वो अपने पिता की मृत्यु का समाचार सुनता था तो अंततः वो दुःख, बदले की भावना और अपने पिता के श्रष्टि का आधिपति बनने के स्वप्न को पूरा करने निकल पड़ता था। उसके ऊपर एक बोझ होता था अपने दानव कुल को मानवों और देवताओं से उच्च बनाने का। अगर वो ऐसा नहीं करेगा तो उसका समाज उसे धिक्कारेगा। ये डर ही है जो हमें हमारे मन से कार्य करने नहीं देता। ये डर ही है जो हमारे पथ को हमसे दूर कर किसी दुसरे पथ पर पहुंचा देता है। जो इस डर से लड़ जाता है वो अपनी पूरी आने वाली पीढ़ी के लिए एक नया रास्ता खोल जाता है। उसका उधारण था प्रहलाद।

    शायद यही कारण है कि महादेव कभी भी दानवों को अपने हृदय से दूर नहीं करते। उनकी लाख मूर्खता पर भी उन्हें क्षमा कर देते हैं। वो जानते हैं कि ये वो मन के भाव ही हैं, ये वो सामाजिक दबाव ही है, ये वो अपेक्षाओं का बोझ ही है जो किसी को भी गलत मार्ग पर ला सकता है। महादेव उनके भी हृदय को पढ़ते हैं और जानते हैं कि किसी कोने में एक मानवीय गुण है जो दानवीय अवगुणों के बीच कहीं फंस गया है और इसे मेरी आवश्यकता है। शायद एक दिन वो दानवीय अवगुण, सुन्दर गुण में परिवर्तित हो जायेगा और महादेव प्रसन्न हो कर नृत्य करेंगे।

    जय भोलेनाथ।

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