Loading...

  • पैसों से सम्बंधित सोच ० हमारे समाज में

    बाकी दुनिया से हमारी सोच कुछ अलग है पैसों के मामले में। जहाँ एक ओर शादियों में अपनी हद से बाहर रह कर खर्चा कर देते हैं वहीँ एक सब्ज़ी वाले से 2 रुपए के लिए झगड़ा करते रहते हैं। अगर जो शादी में बहुत ज़्यादा खर्चा होता है उसे बचा लिया जाए तो पूरी ज़िन्दगी भर ना किसी सब्ज़ी वाले से, ना दूध वाले से और ना ही स्कूल की फीस के लिए इतना परेशान होना पड़ेगा। पर क्या करें, समाज में शादी तो धूम धाम से करनी ही होती है। एक ही तो ऐसा समय आता है जब हम अपने मन से बहुत प्रसन्न होते हैं। उसमे भी थोड़ा खर्चा ना करें तो कब करेंगे ? ठीक है। कीजिये। पर फिर कभी अगर उसी सब्ज़ी पर 2 रुपए बढ़ें तो शिकायत मत कीजियेगा। मत कहियेगा की बजट बिगड़ रहा है। क्योंकि दाम हमेशा बढ़ते ही रहेंगे। वो कभी कम नहीं होंगे। ज़मीन की कमी होती जा रही है और जनसँख्या बढ़ती जा रही है। जो जो चीज़ें सभी लोग उपयोग करते हैं उनके दाम बढ़ते ही रहेंगे और प्रसन्न रहना है तो इस तथ्य को स्वीकार कर लीजिये और उसके लिए हमेशा तैयार रहिये।

    दूसरी हमारी सोच होती है कि जब कोई कुछ कार्य करता है तो हमें उसे धन देना स्वीकार नहीं होता। सच्ची। जैसे हम कोई गाना सुनते हैं, या इंटरनेट पर पुस्तक पढ़ते हैं, या कोई अपनी सामग्री बना कर हमें देता है, या कोई हमारे लिए बाजार जा कर कुछ ले कर आता है, या इंटरनेट पर इतनी सारी चीज़ें होती हैं हमें लगता है की सब कुछ मुफ्त ही तो है। आखिर गाने तो ऐसे ही मिलते हैं इनके कैसे पैसे और क्यों दें हम ? गाने मुफ्त नहीं होते। उसमे किसी का बहुत परिश्रम लगा है। अगर आपको अपनी नौकरी या व्यवसाय में परिश्रम लगता है तो दुसरे के कार्य को भी उतना ही महेत्व दें क्योंकि अपने अपने कार्य के लिए सभी को धन की अपेक्षा होती है। जो गाने आपको मुफ्त डाउनलोड करने को मिल जाते हैं वो सब गैर कानूनी होते हैं। आज चल रहा है तो ठीक है परन्तु कल रुक जायेगा। अरे साहब कल रुक जायेगा तो हम भी रोक देंगे, कौनसी हमारी ज़िन्दगी रुक रही है गाने सुने बिना। सत्य वचन परन्तु ये बात याद रखें कि गाने मुफ्त नहीं हैं।

    हमें ऐसा लगता है कि हम बहुत परिश्रम करते हैं और हमें उतना धन नहीं मिलता। सत्य कहा आपने। परन्तु अपने आप से पूछिए और सत्य बोलिये कि किसी और के कार्य में आपको परिश्रम नज़र आता है जो आपके लिए कुछ कार्य करते हैं ? वो जितना धन आपसे मांगते हैं क्या आपको लगता है कि वो ठीक मांग रहे हैं ? अगर नहीं तो हो सकता है कि आप जिनके लिए कार्य करते हैं उन्हें भी आपके कार्य में उतना परिश्रम नहीं दिखता होगा जितना आपको लगता है। तो अंततः सब कुछ बराबर है। दोष किसी का है ही नहीं। सब बिलकुल एक सामान सोचते हैं।

    जब हम कोई वस्तु खरीदते हैं जैसे कि कपडे, बर्तन, आभूषण इत्यादि तो हमें प्रतीत होता है कि इसके लिए धन चुकाना चाहिए। क्योंकि हम कुछ खरीद रहे हैं। वो हमें दिख रहा है। हमारे हाथ में है। अर्थात इसका मूल्य है। परन्तु कुछ चीज़ें दिखती नहीं हैं जैसे ज्ञान, इंटरनेट पर मिलने वाली सामग्री, सॉफ्टवेयर, परिश्रम क्योंकि हम उसे छू नहीं सकते। वो हमारे हाथ में नहीं होती। हमारे पुत्र - पुत्री को हम इंजीनियर बनाना चाहते हैं और सोचते हैं की वो बहुत धन कमायेगा परन्तु उन्ही चीज़ों के लिए हमारी नज़र में मूल्य नहीं है। अगर मूल्य नहीं है या आप उस चीज़ का मूल्य चुकाना पसंद नहीं करते तो फिर कामना क्यों करते हैं कि पुत्र बहुत कमायेगा ?

    निष्कर्ष ये है कि इस संसार में हर चीज़ का मूल्य होता है जो हमें चुकाना होता है। अगर आपको उस चीज़ की आवश्यकता नहीं है तो आप उसका मूल्य बिलकुल नहीं देंगे। परन्तु मूल्य है ये ज़रूर समझेंगे। ईश्वर को पाना भी मुफ्त नहीं मिलता। उसका पूर्ण मूल्य चुकाना पड़ता है। परन्तु जब तुच्छ चीज़ों का मूल्य चुकाना आपको गवारा नहीं तो आप ईश्वर के प्रेम का मूल्य कैसे चुकाएंगे। ईश्वर के प्रेम का मूल्य धन नहीं है अपितु उसका मूल्य बहुत कीमती चीज़ है। धन का प्रयोग ईश्वर के लिए नहीं लोगों और जानवरों की सेवा के लिए करें और ईश्वर के लिए प्रेम और मित्रता छोड़ लें।

    आपके सुखद जीवन की कामना करता हु।

    Loading Comments...

Other Posts

Krishna Kutumb
ब्लॉग सूची 0 0 प्रवेश
Open In App