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  • श्राद्ध या पितृ पक्ष या कनागत क्या होता है ?

    श्री कृष्णा ने गीता का उपदेश देते हुए कहा था कि ये मनुष्य शरीर नश्वर है। इसे सृष्टि के पांच तत्त्व ( जल, वायु, अग्नि, भू और आकाश) से मिलकर बनाया गया है। इस नष्ट हो जाने वाले शरीर में आत्मा वास करती है जो इसे जीवित रखती है। जब ये आत्मा शरीर को त्याग देती है तो शरीर इन्ही पांच तत्वों में विलीन हो जाता है। और आत्मा धर्मराज यमराज के धाम चली जाती है।

    कहा जाता है कि जब सूर्य कन्याराशि में प्रवेश करते हैं तो श्राद्ध पूर्णिमा से लेकर सर्व पितृ अमावस्या तक यमराज सभी आत्माओं को अपने अपने वंशजों से मिलने की अनुमति दे देते हैं। पूर्वज अपने वंशजों को आशीर्वाद देने धरती पर आते हैं।

    पित्रों की शांति के लिए पिंड दान, तर्पण आदि किये जाते हैं। कुछ प्रमुख स्थलों पर जाकर स्नान किया जाता है और पूजा के साथ पंडितों को भोजन और दान दिया जाता है। मान्यता है कि पंडितों को दिया गया दान और भोजन सीधे पित्रों तक पहुँचता है। वे प्रसन्न होते हैं।

    मान्यता अनुसार श्राद्ध तीन पीडियों तक का किया जाता है। आदित्य देवता परदादा के समान, रूद्र देवता दादा के सामान और वसु पिता के समान माने जाते हैं।

    इसे कनागत भी कहा जाता है। कनागत का अर्थ है कन + आगत। अर्थात कनो (पित्रों) का आगमन।

    अपने पूर्वजों की शांति और प्रसन्नता से बढ़कर और क्या हो सकता है। इसलिए सभी लोग बड़ी श्रद्धा से श्राद्ध की विधि को संपन्न करते हैं।

    श्री कृष्णा सभी को प्रसन्न और संपन्न रखें। जय श्री कृष्णा।

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