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  • पितृ पक्ष मनाने के पीछे का राज़ और कहानी

    Akash Mittal

    आखिर किस प्रकार पितृ पक्ष अर्थात श्राद्ध अर्थात कनागत मनाने की परंपरा शुरू हुई ? क्या कारण था जो पितृ पक्ष मनाया जाने लगा? चलिए जानते हैं पितृ पक्ष मानाने के पीछे की कहानी।

    पितृ पक्ष की काफी कहानिया प्रचलित हैं परन्तु सबसे अधिक लोकप्रिय कहानी दानवीर कर्ण से जुडी हुई है। अन्य प्रमुख कहानियाँ हैं जैसे श्री राम ने नासिक में गोदावरी तट पर अपने पिता राजा दशरथ और जटायु को जलांजलि दी थी। उसी प्रकार भरत जी ने दशरथ जी की मृत्यु पर दशगात्र विधि की थी जो तुलसीदास द्वारा रचित रामायण में उल्लेख की गयी है।

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    महारथी कर्ण के विषय में हम सभी जानते हैं। अत्यंत बलशाली, दानवीर, परोपकारी और गुरुभक्त होने पर भी उसे महाभारत के युद्ध में मृत्यु मिली थी क्योंकि उसने जीवन में एक बड़ी भूल की थी अन्याय का मित्र बन कर। कर्ण जो एक पांडव था और सभी भाइयों में सबसे बड़ा था उसे एक शूद्र का जीवन जीना पड़ा। पूरे जीवन काल में सिर्फ परेशानी और श्राप मिले। उसे नियति ने परिवर्तन का योद्धा चुना था क्योंकि हर विपत्ति से लड़ना वही जानता था। परन्तु जब सभी आपका तिरस्कार करते हैं और कोई एक आपके कंधे पर हाथ रख कर आपको मित्र बोल देता है तो आप उसी के लिए अपना जीवन न्योछावर कर देते हैं। कर्ण ने भी वही किया। जानते हुए भी कि वो अधर्म का साथ दे रहा है, उसने अपने मित्र को नहीं छोड़ा। मित्रता भी निभाई और धर्म के लिए प्राण भी दे दिए।

    कर्ण अपने कौशल और पराक्रम के लिए तो चर्चित था ही परन्तु सूर्यपुत्र होने के कारण उसमें दानवीरता का अमूल्य गुण था। यहाँ तक कि उसने अपने वो दिव्य कवच और कुण्डल दान कर दिए जो उसे अभेद्य बनाते थे। जिनके रहते हुए उसे परास्त करना असंभव था। परन्तु अपने पिता सूर्य का गौरव और प्रतिष्ठा का मान रखना उसके लिए सर्वोपरि था। वो दानवीर था और उसने वो कवच-कुण्डल दान कर दिए।

    जब कर्ण की मृत्यु हुई तो वो स्वर्ग पंहुचा। देवराज इंद्र ने उसे भोजन में सोने, चांदी, हीरे - जवाहरात दिए। उसने उसका कारण पुछा तो इंद्र बोले - हे कर्ण ! तुमने अपने जीवन में सब कुछ दान किया लेकिन अपने पूर्वजों की याद में अन्न दान नहीं किया। कर्ण बोले कि मुझे अपने पूर्वजों का पता ही नहीं था तो में कैसे दान करता। तब इन्द्र ने कर्ण को 16 दिन के लिए धरती पर जाने के लिए कहा और पिंड दान और श्राद्ध की विधि पूर्ण करने के लिए कहा। तब कर्ण सूर्य के कन्याराशि में प्रवेश करने पर धरती पर आये और अपने पूर्वजों के लिए अन्न दान किया।

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    ये थी कहानी कर्ण से जुडी श्राद्ध की। अगर आपको कोई और कहानी पता है तो उसे हमारे साथ साझा करें।

    हरे कृष्णा।

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