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  • 🌞​🌿सत्संग की महिमा 🌿​🌍

    Vishal Vaishnav

    मनुष्य के जीवन में अशांति ,परेशानियां तब शुरु हो जाती है जब मनुष्य के जीवन मे सत्संग नही होता.संतो के संग से मिलने वाला आनंद तो बैकुण्ठ मे भी दुर्लभ है.

    कबीर जी कहते है की:- राम बुलावा भेजिया , दिया कबीरा रोय ,,, जो सुख साधू संग में , सो बैकुंठ न होय!!

    रामचरितमानस मे भी लिखा है की:-तात स्वर्ग अपवर्ग सुख धरि तुला एक अंग। तुल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग।।

    हे तात ! स्वर्ग और मोक्ष के सब सुखों को तराजू के एक पलड़े में रखा जाये ते भी वे सब सुख मिलकर भी दूसरे पलड़े में रखे हुए उस सुख के बराबर नहीं हो सकते, जो क्षण मात्र के सत्संग से मिलता है।’

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    सत्संग की बहुत महिमा है, सत्संग तो वो दर्पण है जो मनुष्य के चरित्र को दिखाता है ओर साथ साथ चरित्र को सुधारता भी है.

    सत्संग से मनुष्य को जीवन जीने का तरीका पता चलता है, सत्संग से ही मनुष्य को अपने वास्तविक कर्तव्य का पता चलता है.

    मानस मे लिखा है की:- सतसंगत मुद मंगल मुला,सोई फल सिधि सब साधन फूला…

    सत्संग सब मङ्गलो का मूल है,,जैसे फूल से फल ओर फल से बीज ओर बीज से वृक्ष होता है उसी प्रकार सत्संग से विवेक जागृत होता है ओर विवेक जागृत होने के बाद भगवान से प्रेम होता है ओर प्रेम से प्रभु प्राप्ति होती है.

    जिन्ह प्रेम किया तिन्ही प्रभु पाया…सत्संग से मनुष्य के करोडो करोडो जन्मो के पाप नष्ट हो जाते है,सत्संग से मनुष्य का मन बुद्धि शुद्ध होती है, सत्संग से ही भक्ति मजबूत होती है..

    भक्ति सुतंत्र सकल सुखखानि,,बिनु सत्संग न पावहि प्राणी… भगवान की जब कृपा होती है तब मनुष्य को सत्संग ओर संतो का संग प्राप्त होता है…

    सत्संग मे बतायी जाने वाली बातो को जीवन मे धारण करने पर भी आनंद की प्राप्ति ओर प्रभु से प्रीति होती है.

    जीवन से सत्संग को अलग नही करना चाहिये।जब सत्संग जीवन मे नही रहेगा तो संसार के प्रति आकर्षण बढेगा |

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