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  • नारद जी की कहानी - १

    एक बार सत्यभामा जी को अपने धन, ऐश्वर्य और श्री कृष्ण की पत्नी होने का घमंड हो गया था। जगत के नाथ को वो सिर्फ अपना नाथ समझने लगी थी। उन्होंने एक पूजा रखी जिसमें नारद मुनि जी को निमंत्रण दिया गया कि वो देवर्षि हैं उनसे बेहतर कोई और पूजा करा ही नहीं सकता।

    देवर्षि ने पूजा संपन्न की और जब दक्षिणा की बारी आयी तो उन्होंने श्री कृष्ण को ही मांग लिया। अब कृष्ण नारद मुनि जी के दास थे। उन्होंने अपना कार्य करवाना आरम्भ किया। नारद मुनि जी को चटनी खानी थी तो जगन्नाथ चटनी पीसने लगे। ये देख सत्यभामा को अपनी गलती का एहसास होने लगा कि जो कृष्ण कुछ क्षण पहले उनके साथ थे अब वो पल भर में दूर हो गए। जिन्हे वो पूर्ण रूप से सिर्फ अपना समझ कर अभिमान कर रही थीं वो अब उनके रहे ही नहीं। समय और नाथ दोनों ही बहुत बलवान हैं। अभिमान तोड़ते हुए समय नहीं लगता। एक मौका अवश्य देते हैं अपनी भूल सुधरने का अगर समझ जाओ तो सब पहले जैसे अच्छा हो जायेगा वरना आप अपना सब कुछ हार जाओगे।

    सब कुछ चल ही रहा था कि रुक्मणि जी, जो देवी लक्ष्मी हैं, उन्हें डर लगने लगा कि प्रभु तो मुझसे भी दूर हो गए। उन्होंने कहा कि मेरी क्या गलती है ? मैंने क्या किया? जिस तरह सत्यभामा आपकी पत्नी हैं उसी तरह में भी हूँ। सत्यभामा ने दान किया है मैंने नहीं इसलिए में अपने प्रभु को नहीं दुंगी। नारद मुनि बोले ठीक है तो जितना प्रभु पर हिस्सा सत्यभामा जी का है मुझे उतना दे दो। बताओ प्रभु के किस हिस्से पर सत्यभामा जी का हक़ है - आँख, कान, नाक ? लक्ष्मी जी सोचने लगीं कि अब तो हिस्से होने लग गए प्रभु के। वो बोली आप कुछ और मांग लीजिये हम प्रभु को नहीं देंगे। नारद जी बोले हम कोई बाबरे थोड़ी हैं जो हाथ आये प्रभु को जाने देंगे। बड़ी मुश्किल से मिले हैं भाई।

    अब विपत्ति सभी के ऊपर थी चाहे वो सत्यभामा हो चाहे लक्ष्मी। और प्रभु अपना चटनी पीसने में व्यस्त थे। जो हो रहा है होता रहे हमें तो स्वामि नारद मुनि जी की आज्ञा मिली हुई है। हमें तो चटनी पीसनी है।

    सत्यभामा समझ चुकी थीं कि प्रभु पाने का अभिमान भी प्रभु को दूर कर सकता है। इसलिए वो माफ़ी मांगने लगीं और कहने लगीं कि प्रभु को मत छीनो मुझसे। हे नारद मुनि कुछ और मांग लीजिये। नारद जी बोले तो ठीक है, प्रभु के भार के बराबर का कुछ भी मुझे दे दीजिये चाहे वो अन्न हो, घास हो, फूल हो या कुछ भी। सत्यभामा प्रसन्न हो कर बोलीं कि ये सब क्यों में आपको अपने नाथ के वजन के बराबर हीरे, मोती, माणिक, सोना, चांदी दूंगी। मेरे पास समृद्धि का भण्डार है। प्रभु ने सोचा कि अब फिर लीला दिखानी पड़ेगी।

    तुलादान शुरू हुआ। दुर्लभ रत्न, हीरे, मोती, सोना, चांदी धीरे धीरे चढ़ने लगे। जैसे जैसे चीज़ें चढ़ रहीं थी व्याकुलता बढ़ रही थी। आखिर ये हो क्या रहा है? ये चीज़ों का वज़न घट कर रुई के बराबर हो गया है या प्रभु का वज़न पृथ्वी के बराबर ? कुछ हो ही नहीं रहा। और अंत में सब कुछ चढ़ गया पर प्रभु का पलड़ा ज़मीन को ही छू रहा था। लक्ष्मी जी को सत्यभामा पर दया आयी तो उन्होंने प्रभु से कहा कि अब बस कीजिये। सत्यभामा का सारा धन, वैभव चढ़ चुका है। अब उसके पास कुछ है ही नहीं तो वो क्या दे ? श्री कृष्ण बोले - अभी अभिमान की एक इकाई बचती है। जब तक में अपने भक्तों का सम्पूर्ण अभिमान नष्ट नहीं कर देता तब तक में नहीं मानता। जिस प्रकार भक्तों को मुझसे प्रेम होता है, मेरी ज़रूरत होती है उसी तरह मुझे भी उनकी ज़रूरत और प्रेम होता है। उनके प्रेम के चलते में उनमें तनिक मात्र भी बुराई नहीं रहने दे सकता। इसलिए अभी मेरा हार मानने का समय नहीं आया है।

    रुक्मणि जी ने देखा की सत्यभामा एक बहुमूल्य अंगूठी पहने हुए हैं। वो समझ गयीं कि आखरी इकाई यही है। उन्होंने सत्यभामा से कहा की ये अंगूठी चढ़ा दो। सत्यभामा बोलीं कि सब कुछ चढ़ चूका है तब भी प्रभु हिले तक नहीं हैं तो इस अंगूठी के भार से क्या फर्क पड़ जायेगा ? रुक्मणि बोलीं - इस अंगूठी का भार तो बहुत ज्यादा है, प्रभु तो तुलसी के पत्ते से भी हार जायेंगे। अपना सम्पूर्ण उन्हें सौंप दो वो अपना संपूर्ण तुम्हे सौंप देंगे। अंगूठी में तुलसी के पत्ते को लपेट कर चढ़ा दो।

    सत्यभामा ने तुलसी के साथ अंगूठी चढाई और प्रभु का पलड़ा हल्का हो गया। अब नारद मुनि बोले कि मुझे तो बस प्रभु के वजन जितना चाहिए। ये तो ज्यादा हो गया है। थोड़ा काम करो। अब धीरे धीरे सामान निकाला जाने लगा। पर ये क्या, अब प्रभु का पलड़ा नीचे नहीं आ रहा। सब कुछ निकल गया केवल तुलसी रह गयी और प्रभु ने लीला का अंत किया और पलड़ा बराबर का हो गया। नारद मुनि तुलसी का पत्ता ले कर चले गए और सत्यभामा को सबसे बड़ा ज्ञान दे गए।

    हमारे शास्त्र में तुलसी को बहुत पवित्र और शक्तिशाली बताया गया है। उनकी भक्ति और तप के आगे सभी हार मान लेते हैं फिर चाहे वो हनुमान जी हो या गणेश जी या स्वयं नारायण।

    ।। जय श्री कृष्णा ।।

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