Loading...

  • 🌞जन्म से पूर्व जीवन (विज्ञान)(2)🐚

    ४. हमारा पुनर्जन्म कब, कहां और किसके यहां होगा यह निर्धारित करने वाले घटक क्या हैं ?

    दो मुख्य घटक जो पृथ्वी पर हमारा पुनर्जन्म निर्धारित करते हैं :

    *1.क्या पृथ्वी पर हमारे लेन-देन चुकाने के लिए परिस्थिति अनुकूल है ?*
    *2.जन्म से पूर्व हम कौन से लोक में हैं ?*

    *४.१ लेन-देन और पूर्वजन्म*

    हमारे लेन-देन का हिसाब एक अकेला महत्त्वपूर्ण घटक है जो निर्धारित करता है कि

    पृथ्वी पर हमारा जन्म कब होगा और किस परिवार में होगा इत्यादि ।

    हमारे लेन-देन का हिसाब ही हमारे जन्म का समय, यहां तक कि वर्ष, माह, घंटा, मिनट और सेकंड निर्धारित करता है। इसका अर्थ यह है कि हमारा जन्म पृथ्वी पर तभी होता है जब अधिकाधिक मात्रा में लेन-देन चुकाने के लिए वह हमारे अनुकूल है । अत: हमारा जन्म उस समय पर होता है जब वे लोग, जिनके साथ हमारा लेन-देन है, वहां हों और पृथ्वी की बाहरी परिस्थितियां भी अनुकूल हों । आइए इसे एक उदाहरण से समझ लेते हैं :

    *‘अ’ ने ‘ब’ का सारा धन धोखे से हथिया लिया ।* इसलिए ‘अ’ ने ‘ब’ के साथ प्रतिकूल लेन-देन का हिसाब बना लिया है । यदि ‘अ’ की मृत्यु ब का ऋण चुकाए बिना हो जाए, तो उसे तभी पुनर्जन्म लेना होगा जब ब तब जीवित है अथवा ब का पुनर्जन्म होने तक प्रतीक्षा करनी होगी; और यदि ‘अ’ ने अन्यों के साथ भी धोखा किया है तो इससे उऋण होने के लिए उसे अत्यधिक दु:खद जीवन का सामना करना होगा । स्वभाविक है कि उसका जन्म संघर्ष के काल में होगा । अत: वह शांतिकाल में जन्म नहीं ले सकता ।

    लेन-देन हिसाब की एक मुख्य बात है कि कितनी धन-संपदा लौटानी है, इसकी अपेक्षा यह सुख अथवा दुःख की इकाई में होता है । उदाहरण के लिए यदि ‘अ’ ने ‘ब’ का सारा धन धोखे से छीन लिया और वह १००० इकाई दु:ख के लिए उत्तरदायी है, तो ‘अ’ का पुनर्जन्म मां और ‘ब’ का जन्म उसके पुत्र के रूप में हो सकता है । या फिर उसकी मृत्यु लगभग १० वर्ष की आयु में किसी दुघर्टना अथवा थोडी सी बीमारी के पश्चात हो जाती है । तब तक मां का बच्चे से बहुत अधिक लगाव हो जाता है और उसकी असमय मृत्यु से १००० इकाई दु:ख उसकी इस जन्म की मां, पर पहले के ‘अ’ को होता है ।

    जिन माता-पिता के यहां हमारा जन्म हुआ है उनके साथ लेन-देन की तुलना में जिस संप्रदाय / धर्म में जन्म हुआ है, उसका महत्त्व अल्प है ।

    *४.१.१ संचित का कौन सा भाग पृथ्वी पर प्रारब्ध बनेगा इसका निर्धारण कैसे होता है ?*

    यहां पुन: वही नियम लागू होता है कि संचित का जो भाग आने वाले जन्म में अधिकाधिक चुकाया जा सकता है वही चुना जाता है ।

    *४.१.२ क्या माता-पिता नामजप इत्यादि साधना द्वारा उच्च स्तर के सात्त्विक सूक्ष्म शरीर को आकर्षित कर सकते हैं ?*

    हां, साधना से अधिक उच्च स्तर के और अधिक सात्त्विक सूक्ष्म शरीर को गर्भ में आकर्षित कर सकते हैं , यह केवल तभी सम्भव है जब माता पिता पर्याप्त मात्रा में (साधना के छ: मूलभूत सिद्धांत के अनुसार और ईश्वर के लिए तन-मन-धन का त्याग करते हुए प्रतिदिन न्यूनतम ४-५ घंटे ) साधना करते हों ।

    माता-पिता के साधक होने पर यदि गर्भ में आनेवाला पहला सूक्ष्म शरीर (माता-पिता की लेन-देन की शक्ति के अनुसार) यदि अधिक सात्त्विक नहीं है तो अगले सबसे अधिक सात्त्विक सूक्ष्म शरीर को प्राथमिकता मिलेगी । सात्त्विक बच्चों की विशेषताएं हैं कि वे सभ्य, बुद्धिमान, सहजता से वातावरण के अनुरूप स्वयं को ढाल लेने वाले होते हैं । उनके शारीरिक अथवा मानसिक रूप से विकलांग होने की संभावना भी न्यून होती है । इसका कारण यह है कि विकलांग बच्चे नकारात्मक प्रारब्ध के कारण होते हैं । साधना से प्रारब्ध का निवारण होता है । यदि माता-पिता साधना के छ: मूलभूत सिद्धांतों के अनुसार तीव्र साधना कर रहे हैं तो उनका नकारात्मक प्रारब्ध न्यून (कम) हो जाता है ।

    यदि किसी संत का (७०% से अधिक आध्यात्मिक स्तर) जन्म होना है तो मां का आध्यात्मिक स्तर बालक की सकारात्मकता सहन करने के लिए न्यूनतम ५०-६०% होना चाहिए । पिता के आध्यात्मिक स्तर की तुलना में मां के आध्यात्मिक स्तर का महत्त्व ७०% है ।

    *४.१.३ यह कैसे निर्धारित होता है कि किसी का जन्म संपन्न अथवा उच्च आध्यात्मिक स्तर के परिवार में होगा ?*

    यदि सूक्ष्म शरीर के गुण अधिक हैं तो वह सामान्यत: अच्छी परिस्थितियों और संपन्न परिवारों में जन्म लेते हैं । यदि सूक्ष्म शरीर का स्तर सामान्य से अधिक है तो इसका जन्म उच्च आध्यात्मिक स्तर के माता-पिता के यहां होगा जो इसकी आध्यात्मिक उन्नति के लिए पोषक होंगे । *यहां ध्यान रखने योग्य बात यह है कि संतों का जन्म गुणों-अवगुणों के परे किसी निर्धन परिवार में भी हो सकता है । यह पृथ्वी पर उनके उद्देश्य पर निर्भर है ।*

    हरे कृष्णा

    [continue=zdthnkp]2[/continue]

    Loading Comments...

Other Posts

Krishna Kutumb
Blog Menu 0 0 Log In
Open In App