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  • नवरात्री 2017 कहानी - देवी शैलपुत्री

    देवी शैलपुत्री नवदुर्गा का पहला रूप है। प्रथम दिन इनकी पूजा की जाती है। शैलपुत्री का अर्थ है शैल (शिला) की पुत्री अर्थात पर्वत की पुत्री। देवी शैलपुत्री, हिमालय की संतान मानी जाती हैं।
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    इन्हे हम विभिन्न नामों से जानते हैं जैसे सती, भवानी, पार्वती, हेमावती। ये महादेव शिव की पत्नी हैं। गणेश और कार्तिकेय इनके पुत्र हैं और अशोक सुंदरी इनकी पुत्री। इनके शीश पर अर्ध चंद्र है। ये दायें हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल धारण किये होती हैं। इनकी सवारी नंदी महाराज हैं।
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    मान्यता है की पिछले जन्म में ये प्रजापति दक्ष की पुत्री हुआ करती थीं। इनका नाम सती था। शिव से प्रेम होने पर इन्होंने अपने पिता की आज्ञा के विपरीत इन्होने शिव से विवाह किया। दक्ष ब्रह्मा जी के पुत्र हैं। वो नारायण को अपना इष्ट मानते हैं परन्तु शिव को अपमानित करते थे। जब पुत्री ने शिव से विवाह कर लिया तो उन्होंने सारे सम्बन्ध तोड़ दिए। ईश्वर इस धरती पर जन्म लेने के लिए मनुष्यों का ही सहारा लेते हैं। वे उन्ही के नियम और बंधनों में बंधे होते हैं। पर कभी कभी मनुष्य अपनी अज्ञानता और हठ में पाप कर देता है। जो नर और नारी हैं, जो शक्ति और शिव हैं, जो अर्धनारेश्वर हैं उनके बीच आना केवल इसलिए कि आप पिता हैं और संतान के भविष्य का निर्णय लेना आपका हक़ है? परन्तु शिव बहुत भोले हैं। उन्हें कोई कुछ भी कहे वो रुष्ठ नहीं होते।
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    पर दक्ष ने सीमाएं लांघ दीं। हुआ यूँ कि एक बार दक्ष ने बहुत विशाल पूजा का आयोजन किया। ब्रह्मा, सरस्वती, नारायण, लक्ष्मी, चंद्र, अपने हर जमाता और हर विशेष व्यक्ति को आमंत्रित किया। नहीं किया तो बस शिव और शक्ति को। परन्तु भोलेनाथ को कुछ फर्क नहीं पड़ता। सती को ये सब अच्छा नहीं लगा। वो अपने पिता के यज्ञ में शामिल होना चाहती थीं। शिव ने मना किया परन्तु वो नहीं मानी। शिव बोले कि जब कोई निमंत्रण ना दे तो प्रसंग में हिस्सा नहीं लेना चाहिए। सती अपने पिता के घर जाना चाहती थीं उन्हें निमंत्रण की आवश्यक महसूस नहीं हुई।
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    जब सती यज्ञ में शामिल हुई तो दक्ष ने उन्हें और शिव को अपमानित करना शुरू कर दिया। महादेव के विषय में कटु शब्द बोलने लगे। सभी देवी देवता यहाँ तक की ब्रह्मा और विष्णु भी मौन रह कर सब सुन रहे थे। सती अपने पिता का अहित नहीं करना चाहती थीं इसलिए उन्होंने उसी यज्ञ में अपने आप को भस्म कर लिया। महादेव पीड़ा और क्रोध में विच्छिप्त हो गए। उन्होंने अपनी प्रतिकृति वीरभद्र को दक्ष के वध के लिए भेज दिया। भीषण युद्ध हुए पर वीरभद्र को रोकना संभव ही नहीं था। उन्होंने दक्ष का गाला काट कर उनके शीश को उसी यज्ञ में भस्म कर दिया।
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    दक्ष की मृत्यु के पश्चात सभी देवी देवताओं ने साहस जुटा कर महादेव से प्रार्थना की कि वो दक्ष को जीवित कर दें क्योंकि शृष्टि को सुचारु रूप से चलाने का दायित्व दक्ष का था और उसके बिना शृष्टि नहीं चल सकती थी। महादेव अपनी पीड़ा में डूबे हुए थे। वो एकांत चाहते थे और उन्होंने दक्ष को बकरे का शीश दिया और सती के जले हुए मृत शरीर को ले कर चले गए। दक्ष को अपनी भूल का एहसास हुआ और महादेव को अपना इष्ट मान लिया।
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    महादेव सती के मृत शरीर को लेकर तांडव करने लगे। क्रोध और पीड़ा में होने वाले इस तांडव से शृष्टि कांपने लगी। नारायण को इसे रोकना था वरना महादेव का क्रोध सब कुछ भस्म कर देगा। उन्होंने सती के अपने सुदर्शन से टुकड़े कर दिए और पृथ्वी पर बिखेर दिए। इन्हें हम शक्ति पीठ के नाम से जानते हैं। पूरे भारत में 51 शक्तिपीठ हैं। अर्थात सती के 51 टुकड़े हुए थे जो पूरे संसार में बिखर गए। महादेव ने इनकी सुरक्षा के लिए हर शक्तिपीठ पर अपना एक भैरव तैनात किया हुआ है। कहा जाता है कि आज भी भैरव उधर शक्तिपीठों की सुरक्षा करते हैं। ईश्वर अपना अहित भी इसी संसार के भले के लिए करते हैं।
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    शैलपुत्री का पुनः जन्म राजा हिमालय के घर हुआ। माता ने फिर शिव की तपस्या की और उन्हें प्रसन्न कर उनसे विवाह किया। उन्हें पार्वती के नाम से जाना गया। माता ने सभी देवताओं का अभिमान चूर किया। ब्रह्मा, विष्णु, महेश और सभी देवताओं ने माता को शक्ति माना और नारी को विश्व में सर्वोच्च स्थान प्राप्त हुआ। नारी का सम्मान मनुष्य का सबसे पहला धर्म बना।
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    शैलपुत्री माता को प्रसन्न करने का मंत्र है -
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    ___ वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्ध कृतशेखराम् ।
    ___ वृषारूढाम् शूलधराम् शैलपुत्रीम् यशस्विनीम् ॥
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    अर्थ: में अपनी वंदना माँ शैलपुत्री को समर्पित करता हूँ, जो अपने भक्तों को मन वाँछित फल प्रदान करती हैं। अर्ध चंद्र जिसके शीश का मुकुट है, जो बैल की सवारी करती हैं, जिसके एक हाथ में त्रिशूल है वो यशश्वी माँ शैलपुत्री हैं।

    || जय शैलपुत्री माँ ||

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