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  • नवरात्री 2017 कहानी - देवी ब्रह्मचारिणी

    ब्रह्मचारिणी का अर्थ होता है ब्रह्म का आचरण करने वाली। अर्थात जो तप, पुण्य, जप आदि में अपना समय व्यतीत करती हो। ये नवदुर्गा का दूसरा रूप है। इसे नवरात्री में दूसरे दिन पूजा जाता है।

    ब्रह्मचारिणी रूप में देवी सफ़ेद वस्त्र धारण करती हैं। उनके एक हाथ में जप माला और दूसरे हाथ में कमंडल होता है। जब देवी ने पार्वती के रूप में राजा हिमालय के घर जन्म लिया तब शिव को पुनः पाने के लिए उन्होंने तप करना चाहा। जब परिवारजनों को उनकी इच्छा का पता चला तो उन्होंने उन्हें मना किया परन्तु पार्वती का ह्रदय शिव को प्राप्त करने के लिए तप की और खींच रहा था।

    देवी ने ब्रह्मचारिणी रूप में पूरे 5000 वर्षों तक शिव की तपस्या की। इस बीच शिव ने अलग अलग रूपों में पार्वती को शिव से दूर जाने को कहा। उन्हें हतोत्साहित करने का प्रयास किया। उन्हें शिव के विषय में उनकी बुराईयाँ बतायीं परन्तु पार्वती का प्रेम बढ़ता ही गया।

    इन दिनों ताड़कासुर नामक दानव का उत्पात था। उसे वरदान था कि उसकी मृत्यु केवल शिव के पुत्र के द्वारा हो सकती है। पार्वती अपनी तपस्या कर रहीं थीं और शिव अपनी समाधी में बैठे थे। इन्द्र को भय सताने लगा कि शिव तो पार्वती जी की तपस्या का कोई उत्तर ही नहीं दे रहे। (अक्सर भोलेनाथ बहुत जल्दी प्रसन्न हो जाते हैं। परन्तु सती प्रकरण के बाद शिव गृहस्थ जीवन नहीं जीना चाहते थे। वो पीड़ा और खोने का भय अभी भी था। सती के विषय में जानने के लिए देवी शैलपुत्री की कहानी पढ़ें।) इन्द्र को ताड़कासुर का भय था। ताड़कासुर का अंत तब तक नहीं होगा जब तक शिव के पुत्र नहीं होगा और शिव अपनी समाधी तोड़ ही नहीं रहे। (शिव चाहते थे कि पार्वती उन्हें पाने का स्वप्न छोड़ कर वापस चली जाएँ) जब इन्द्र को कोई और मार्ग नहीं सूझा तो उसने काम देव (प्रेम के देवता) को शिव की समाधी तोड़ने के लिए भेजा। कामदेव ने प्रेम वाण शिव पर चला दिया जिससे शिव की समाधी भंग हो गयी। क्रोध में शिव का तीसरा नेत्र खुल गया और कामदेव भस्म हो गया। परन्तु समाधी तो टूट चुकी थी।

    महादेव, देवों के देव हैं। उन्हें सब ज्ञात है। उन्हें पता था कि देवी पार्वती ही शक्ति हैं और उन्हें एक न एक दिन पार्वती को अपनाना ही होगा। अंततः शिव, देवी पार्वती पर प्रसन्न हुए और उनसे विवाह किया। उनके पुत्र कार्तिकेय ने ताड़कासुर का वध किया।

    इस पूरे तप के प्रकरण में देवी का जो स्वरुप था उसी को ब्रह्मचारिणी कहा जाता है।

    || जय देवी ब्रह्मचारिणी ||

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