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  • एक प्रश्न - आखिर क्या ज़रूरत है पूजा करने की ?

    Akash Mittal

    नहीं! कोई ज़रूरत नहीं है अगर आपको लगता है कि आपने कभी कोई पाप नहीं किये हैं तो।

    पाप का अर्थ क्या है?

    कभी कभी पाप वो होते हैं जो आप मानते नहीं। द्रौपदी चीरहरण में सभा में बैठे हर मनुष्य ने पाप किया क्योंकि वो मूकदर्शक बने देखते रहे और अंत में उनकी मृत्यु के साथ ही वो पाप ख़त्म हुए।

    पूजा करने से क्या लाभ?

    अपने अपने विचार और अपना अपना दृष्टिकोण। मैं केवल अपना दृष्टिकोण बताता हूँ। ईश्वर की आकृति हमारे मन ने निर्धारित की है। अगर मैं ईश्वर को अपने अंदर मानता हूँ तो ईश्वर मेरे अंदर ही है। पूजा करने से लाभ क्या है? सबसे पहले तो 'लाभ' और 'हानि' ये पूजा का हिस्सा है ही नहीं। यहाँ आपका लालच और स्वार्थ काम नहीं करता। जीवन भर लाभ की कामना से पूजा करें कभी कुछ नहीं होगा। अपने आप से पूछ लीजिये कि इतने वर्षों से पूजा की तो क्या मिल गया। मिलता कर्म से है। ईश्वर शक्ति देते हैं उस कर्म को करने की। अगर आप भी मेरी तरह ये मानते हैं कि ईश्वर आपके अंदर है तो आपकी सबसे बड़ी भक्ति होगी कि आप अपने आप से सच बोलना शुरू कर दें। अपने आप से सत्य बोलना बहुत मुश्किल कार्य है। क्योंकि सत्य आपको दिखा देता है कि आप अब तक किस झूठ में जी रहे हैं और आप जितना समझते हैं उससे बहुत कम काबिलियत रखते हैं। वो आपको दिखा देता है कि जितनी आप दूसरों की बुराईयाँ करते हैं उससे कहीं ज्यादा बुराईयाँ आप अपने अंदर धारण किये हुए हैं। अपने आप से सत्य बोलना ही पूजा है और पूजा का लाभ है आँख खोल कर जीना और परिस्थितियों को समझकर उन्हें स्वीकार कर लेना। इतना सीख जायेंगे तो जीवन में दुःख बहुत कम हो जायेंगे।

    पूजा करने के तरीके -

    अपने अपने विचार और अपना अपना दृष्टिकोण। मेरे लिए ईश्वर हर प्राणी के अंदर है। मेरा पूजा करने का तरीका और मान्यताएं भिन्न हैं। में जानवरों और बच्चों से प्रेम करता हूँ। उनके आस पास रहने से में प्रसन्न रहता हूँ। परन्तु में बड़े लोगों को पसंद नहीं करता। जिसके अंदर मुझे ईश्वरीय तत्व नहीं दिखता मैं उसे अपने जीवन से दूर ही रखता हूँ। मैं फिर कहुँगा कि ये मेरा दृष्टिकोण है और मेरा हक़ भी कि तय मैं करूँ कि मुझे किसमें अपने ईश्वर को देखना है। मेरे लिए पूजा करने का तरीका है जीवदया और सेवा। मैं आरती, चालीसाएँ गा कर पूजा नहीं करता। क्योंकि मुझे उन सभी चीज़ों से कोई भावना नहीं आती। मुझे लगता ही नहीं कि मैं आरतियाँ गाना चाहता हूँ। बस गा रहा हूँ क्योंकि मेरे माँ-बाप सभी इसी तरह से पूजा करते आ रहे हैं। शायद उनके लिए पूजा का वही तरीका होगा मेरे लिए नहीं है। मुझे अच्छा लगता है जब मेरे कहीं जाने पर बच्चे खुश हो जाते हैं कि आकाश भैया आ गए। मुझे अच्छा लगता है जब जानवर खुश हो जाते हैं। सच कहूं तो ईश्वर से मुझे ज्यादा प्रेम या लगाव नहीं है। पर ईश्वर को मुझसे बहुत प्रेम और लगाव है ये मैं जानता हूँ क्योंकि मैं बहुत प्रसन्न रहता हूँ।

    तो हमारा प्रश्न अंततः यह था कि पूजा करने की क्या आवश्यकता है? पूजा करने से, जो कि आपके द्वारा निर्धारित होती है कि आपको किस तरह करनी है, आप अपने किये गए पाप और त्रुटियों के लिए सुधार का मौका मांगते हैं। जो पाप किये जाते हैं उनका दंड अवश्य मिलता है। वो टाला नहीं जा सकता। ईश्वर की आराधना कर हम कहते हैं कि हम उन पापों को सुधारना चाहते हैं। जब हम सच्चे मन से ये प्राथना करते हैं तो ईश्वर हमें मौका देते हैं अपनी भूल सुधारने का। पाप का दंड तो फिर भी मिलता ही है परन्तु तब उस दंड को हमारे साथ साथ ईश्वर भी अपने ऊपर ले लेते हैं। आपकी पीड़ा वो बहुत कम कर देते हैं और हो सकता है बिलकुल समाप्त ही कर दें। ईश्वर मित्र की तरह है। एक सच्चा मित्र आपकी पीड़ा अपने ऊपर ले लेता है उसी प्रकार ईश्वर आपकी पीड़ा खुद सहते हैं। पीड़ाएँ ख़त्म नहीं होती। पाप दंड देता है। जब आप सुधार नहीं करते या दिखावे के साथ पूजा (ईश्वर से प्रेम) करते हैं तो ईश्वर आपकी कोई मदद नहीं करता। आप बाद में उसे कोस सकते हैं परन्तु उसका कोई लाभ नहीं क्योंकि उसको आपने मित्र माना ही नहीं है और उसे आप से भी कोई मतलब नहीं है। आपकी पीड़ा आप ही सहोगे।

    प्रयास करें कि कोई पाप ना हो और आपके मित्र को पीड़ा ना सहनी पड़े।

    || जय श्री कृष्णा ||

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