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  • नवरात्री 2017 कहानी - देवी कूष्माण्डा

    कूष्माण्डा देवी नवरात्री में चौथे दिन पूजी जाती हैं। जब ब्रह्माण्ड नहीं था और चारों और सिर्फ अन्धकार था तब सिर्फ देवी कूष्माण्डा का अस्तित्व था। इन्होने अपनी मधुर मुस्कान से एक अंडे का निर्माण किया जिसे ब्रह्माण्ड कहा जाता है। कूष्माण्डा का अर्थ होता है - कू + ऊष्मा + अंडा। अर्थात, हल्कि दैवीय मुस्कान की ऊर्जा से उत्पन्न अंडा।

    देवी कूष्माण्डा स्वयं सूर्य में निवास करती हैं। संसार को ऊर्जा प्रदान करने के लिए देवी ने सूर्य का निर्माण किया और स्वयं को उसी में समा लिया। देवी को केवल निस्वार्थ और पूर्ण पवित्रता से ही पूजना चाहिए। अगर आपकी श्रद्धा देवी के लिए निस्वार्थ है तो केवल कुछ समय में ही आपको देवी की अनुकम्पा का आभास होने लगेगा। देवी अपने भक्तों को अच्छे स्वास्थ्य, धन, शक्ति, खुशियाँ, समृद्धि सब कुछ प्रदान करती हैं।

    देवी कूष्माण्डा के आठ हाथ हैं जो चक्र, गदा, कमल, बाण, धनुष, कमंडल और अमृत कलश धारण किये हुए हैं। और उनके आठवे हाथ में जाप माला है जो अभयमुद्रा में है और मनुष्य को सिद्धि और निधि प्रदान करता है। इनका वाहन सिंह है।

    मान्यता अनुसार कूष्माण्डा ने ही त्रिदेवों और त्रिदेवियों को प्रकट किया है और श्रष्टि का कार्यभार सौंपा है।


    महाकाली का जन्म
    कूष्माण्डा की बाईं आँख की चमक से एक भयानक काले वर्ण की नारी प्रकट हुई। उसके दस मुख, दस हाथ, दस पैर, तीस आँखें, पचास हाथ की उँगलियाँ और पचास पैरों की उँगलियाँ थी। उसके बाल बिखरे हुए थे। वो जलती हुई चिता पर बैठी हुई थीं। उनके पास त्रिशूल, चक्र, ढाल, कटे सर, खोपड़ी, शंख, धनुष-बाण, खडग आदि अस्त्र-शास्त्र थे। कटे सर से खून टपकता हुआ खोपड़ी की कटोरी में गिर रहा था जिसे वो पी रही थीं। कूष्माण्डा ने इन्हे महाकाली कहा।

    महालक्ष्मी का जन्म
    कूष्माण्डा की तीसरी आँख की चमक से तीव्र चमक की नारी प्रकट हुई जिसका वर्ण लावा के समान चमक रहा था। उसके 18 हाथ थे। वे केसरी रंग के वस्त्र धारण किये हुए थीं। उनके शीश पर मुकुट और शरीर पर कवच था। वे खडग, त्रिशूल, चक्र, गदा, वज्र, धनुष, तलवार, कमल, गुलाब, शंख, घंटी, भाला, फांसी का फंदा, गोदन, धनुष, ढाल, कलश, मदिरा-प्याला जैसे अस्त्र-शास्त्र से सुशोभित थीं। वे कमल पर बैठे हुए थीं और प्रचंडता से दहाड़ रहीं थीं। कूष्माण्डा ने उन्हें महालक्ष्मी कहा।

    महासरस्वती का जन्म
    कूष्माण्डा की दायीं आँख की चमक से एक दयालु नारी प्रकट हुई जिसका वर्ण दूध के समान सफ़ेद था। इनके आठ हस्त थे और त्रिनेत्र। उनके शीश पर अर्धचंद्र था और वे सफ़ेद वस्त्र धारण किये हुए थीं। वे त्रिशूल, चक्र, ढोल, तीर, शंख, कमान, घंटी और हल जैसे अस्त्र-शास्त्र धारण किये हुए थीं। उनका मुख शीतल था और चन्द्रमा के समान चमक रहा था। वो मोतियों के मालाओं से सुसज्जित थीं और दिव्य रत्नों से जड़ित सिंहासन पर विराजमान थीं। कूष्माण्डा ने उन्हें महासरस्वती कहा।


    ब्रह्मा और लक्ष्मी का जन्म
    कूष्माण्डा के पैरों के आभूषण महालक्ष्मी पर गिरे और महालक्ष्मी के शरीर से एक नर और नारी प्रकट हुए। नर के चार शीश और चार हस्त थे। उनका वर्ण लाल था और वे केसरी वस्त्र धारण किये हुए थे। वो कमल, पुस्तक, गुलाब और कमंडल धारण किये हुए थे। कूष्माण्डा ने उन्हें ब्रह्मा कहा। नारी के चार हस्त और गोरा वर्ण था। वो सुनहरे वस्त्रों को धारण किये हुए थीं। उनकी दो भुजाओं में कमल की कलियाँ थीं और दो भुजाएं खाली थीं। वो अत्यंत आभूषणों से सुसज्जित थीं। कूष्माण्डा ने उन्हें लक्ष्मी कहा।

    शिवा और सरस्वती का जन्म
    कूष्माण्डा के मुख के आभूषण महाकाली पर गिरे और महाकाली के शरीर से एक नर और एक नारी प्रकट हुए। नर के पांच शीश, पंद्रह आँखें, और दस भुजाएं थीं। उनका वर्ण गोरा था और वे बाघ की खाल पहने हुए थे। एक सर्प उनके गले से लिपटा हुआ था और शीश पर चन्द्रमा था। वे खडग, धनुष, बाण, त्रिशूल, वज्र, खोपड़ी, डमरू, गुलाब और कमंडल धारण किये हुए थे। कूष्माण्डा ने उन्हें शिव कहा। नारी के चार हस्त थे और उनका वर्ण दूध के समान था। वे सफ़ेद वस्त्र और गोदन, पुष्पमाला, पुस्तक और कमल धारण किये हुए थीं। कूष्माण्डा ने उन्हें सरस्वती कहा।

    विष्णु और शक्ति का जन्म
    कूष्माण्डा के हाथों के आभूषण महासरस्वती पर गिरे और महासरस्वती के शरीर से एक नर और नारी प्रकट हुए। नर के चार हस्त थे। उनका वर्ण श्याम था और वे पीले वस्त्र धारण किये हुए थे। वो आभूषणों से सुसज्जित थे और चक्र, गदा, शंख और कमल धारण किये हुए थे। कूष्माण्डा ने उन्हें विष्णु कहा। नारी के चार हस्त और गोरा वर्ण था। वो लाल वस्त्र धारण किये हुए थीं और उनके दो हस्त खाली और दो हस्त में गोदन और फांसी का फंदा था। कूष्माण्डा ने उन्हें शक्ति कहा और उन्हें अपना सबसे उत्तम रूप बताया।

    कूष्माण्डा ने फिर महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती को अपने अंदर समा लिया। शिव को शक्ति, ब्रह्मा को सरस्वती और विष्णु को लक्ष्मी, पत्नी के रूप में सौंप दी।

    शक्ति और शिवा ने मिलकल अपने आधे-आधे शरीर से अर्धनारीश्वर की रचना की और इस ब्रह्माण्ड का निर्माण किया। इसके साथ उन्होंने अन्य देवी - देवताओं का भी निर्माण किया। कुष्मांडा के सबसे नज़दीक देवी लक्ष्मी, देवी सरस्वती और देवी शक्ति हैं और शक्ति सबसे उत्तम रूप हैं।

    कूष्माण्डा के आराधना के लिए मंत्र -

    सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च।
    दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे॥

    || जय देवी कूष्माण्डा ||

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