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  • नवरात्री 2017 कहानी - देवी स्कंदमाता

    देवी स्कंदमाता, नवदुर्गा का पांचवां रूप हैं। अर्थात देवी स्कंदमाता की पूजा नवरात्रि के पांचवे दिन की जाती है। इन्हें स्कंदमाता इसलिए कहा जाता है क्योंकि ये स्कन्द की माता हैं अर्थात इनके पुत्र का नाम स्कन्द (कार्तिकेय या मुरुगन) है।

    माता के चार हस्त हैं जिनमें से दो कमल के पुष्प पकडे हुए हैं, एक से स्कन्द को थामा हुआ है और एक अभय मुद्रा में अपने भक्तों को आशीर्वाद दे रहा है। इनका वाहन सिंह है और इनका वर्ण गोरा है।

    जब ताड़कासुर का उत्पाद बहुत बढ़ गया था तो देवताओं ने शिव से प्रार्थना की कि वो पार्वती की तपस्या से जल्द ही प्रसन्न हो जाएँ क्योंकि ताड़कासुर का वध केवल शिव-पार्वती के पुत्र द्वारा ही हो सकता था। तब देवी ब्रह्मचारिणी रूप में थीं। ब्रह्मचारिणी के विषय में जानने के लिए, नवरात्री 2017 कहानी - देवी ब्रह्मचारिणी पढ़ें।

    जब शिव - पार्वती का मिलन हुआ तो उनके नृत्य और ध्यान के बल से ऊर्जा उत्पन्न हुई जो एक दुसरे में समा कर एक ऊर्जा पिंड में परिवर्तित हो गयी। देवताओं के राजा इंद्र को भय था कि कहीं ये पिंड ताड़कासुर के हाथ ना लग जाए इसलिए उसने अग्नि देव को आदेश दिया कि वो उस पिंड को चुरा लें और उसे सुरक्षित रख दें। अग्नि देव ने पिंड चुरा लिया और गायब हो गए। वो सीधे देवी गंगा के पास पहुंचे उसे सुरक्षित रखने के लिए। देवी गंगा पार्वती जी की बहन हैं। जब देवी पार्वती का ध्यान पूर्ण हुआ तो उन्हें ज्ञात हुआ कि अग्नि देव उस ऊर्जा पिंड को चुरा लिया है। उन्होंने देवताओं से उसका कारण पूछा और क्रोध में दुर्गा का रूप रख लिया। उन्होंने श्राप दिया कि किसी भी देवता की पत्नि अपने संतानों से प्रसन्नता नहीं पाएंगी और अग्नि देव अच्छे और बुरे में फर्क करना भूल जायेंगे। वो सिर्फ जलाना जानेंगे। उनके आस पास काला धुआं रहेगा और जो भी उन्हें स्पर्श करने का प्रयास करेगा वो जल कर भस्म हो जायेगा। तब शिवा गुफा से बाहर आये और पार्वती को शांत किया। इस बीच उस ऊर्जा पिंड के 6 विभाजन हो गए थे जिन्हे 6 अलग अलग कृतिकाओं ने पाला। इसलिए उनका नाम कार्तिकेय पड़ा। माता उसी दुर्गा रूप में स्कन्द को लेने पहुंची। उन 6 पिंडों से जन्में 6 बालकों ने एक 6 शीश वाले बालक का रूप लिया जिसे माता अपनी गोद में बिठा कर बड़े स्नेह से कैलाश ले कर गयीं और कृतिकाओं को आशीर्वाद दिया कि स्कन्द उनका भी पुत्र है इसलिए वो संसार में कार्तिकेय के नाम से जाना जायेगा। स्कन्द को कैलाश ले जाने वाले इस रूप को स्कंदमाता कहते हैं। बाद में कार्तिकेय को ज्ञान हुआ कि उनका सर्वप्रथम लक्ष्य ताड़कासुर का वध है तो उन्होंने अपनी माता, पिता और अन्य देवी देवताओं से युद्ध कौशल और अस्त्र-शस्त्र की विद्या ली और ताड़कासुर का अंत किया।

    माता अपने भक्तों को ज्ञान, धन, दौलत, सम्मान, यश, वैभव सब कुछ प्रदान करती हैं। जो निस्वार्थ भाव से देवी की पूजा करते हैं उनपर देवी की असीम कृपा रहती है। स्कंदमाता की पूजा करने से भक्तों को द्विलाभ होते हैं। माता की पूजा तो हो ही रही होती है साथ ही कार्तिकेय की भी पूजा हो जाती है। देवी का ये रूप ममता का रूप है, माता का रूप है, मातृप्रेम का रूप है।

    माता का मंत्र -
    सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया।
    शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी॥

    || जय स्कंदमाता ||

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