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  • नवरात्री 2017 कहानी - देवी कात्यायनी

    देवी कात्यायनी, नवदुर्गा का छठा रूप है। अर्थात नवरात्री के छठे दिन देवी कात्यायनी की पूजा की जाती है। जब महिषासुर का आतंक बहुत बढ़ गया था तब ब्रह्मा, विष्णु, महेश और अन्य देवताओं के क्रोध से कात्यायनी का जन्म हुआ।

    कात्यायनी के विषय में अलग अलग पुराणों में अलग अलग विवरण दिए हुए हैं। कहा जाता है कि कात्यायनी, कात्यायन ऋषि की पुत्री थीं। कालिका पुराण के अनुसार ऋषि कात्यायन ने सर्वप्रथम देवी की पूजा की थी इसलिए इन्हे कात्यायनी कहा जाता है। वामन पुराण के अनुसार सभी देवों की आँखों और मुख से किरणें निकली जिससे प्रभा का एक पर्वत बन गया जिससे कात्यायिनी का जन्म हुआ। उनके मुख पर हज़ारों सूर्यों के सामान तेज़ था, तीन नेत्र थे, काले बाल और अठाहरह भुजाएं थीं। शिव ने उन्हें त्रिशूल दिया, विष्णु ने सुदर्शन, वरुण ने शंख, कुवेर ने गदा, ब्रह्मा ने कमंडल और पुष्पमाला, काल ने तलवार और ढाल, विश्वकर्मा ने खडग और अन्य हथियार। हथियारों से सुसज्जित हो कर कात्यायिनी मैसूर पर्वत पर चली गयीं। वहां महिषासुर उनकी सुंदरता पर मोहित हो कर उनसे विवाह करने का स्वप्न देखने लगा। माता ने कहा कि अगर उनसे विवाह करना है तो पहले उन्हें युद्ध में हराना होगा। महिषासुर और माता के बीच युद्ध हुआ और माता ने महिषासुर का वध किया। तब से माता को महिषासुरमर्दिनी भी कहा जाता है।

    देवी कात्यायिनी के मंत्र -
    चंद्र हासोज्ज वलकरा शार्दू लवर वाहना|
    कात्यायनी शुभं दद्या देवी दानव घातिनि

    || जय देवी कात्यायिनी ||

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