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  • नवरात्री 2017 कहानी - देवी कालरात्रि

    Akash Mittal

    कालरात्रि, नवदुर्गा का सातवाँ रूप है अर्थात नवरात्री के सातवें दिन देवी कालरात्रि की पूजा की जाती है। कालरात्रि देवी दुर्गा के कई विनाशकारी रूपों जैसे काली, महाकाली, भद्रकाली, भैरवी, मृत्यु, रुद्राणी, चामुंडा, चंडी, दुर्गा आदि में से एक है।

    अलग अलग पुराणों और तंत्रों में कालरात्रि के अलग अलग वर्णन दिए जाते हैं। कुछ काली और कालरात्रि को एक ही मानते हैं जबकि कुछ उन्हें अलग। कालरात्रि, देवी का अत्यंत भयानक रूप है। इसके प्रकट होते ही भय फ़ैल जाता है। ये दुष्टों के नाश के लिए प्रकट होती हैं। जहाँ एक ओर दुष्ट प्रवृति के लोग भय में कांप उठते हैं वहीँ इनके भक्त शांति का अनुभव करते हैं। माँ अपने भक्तों पर जल्दी प्रसन्न होती हैं और उन्हें ज्ञान, बल, धन से परिपूर्ण कर देती हैं। भक्तों को माँ हर प्रकार के भय, भूत, प्रेत, नकारात्मक ऊर्जा से मुक्त करती हैं। माँ का रूप भयानक है परन्तु उनके भक्तों को उनसे भय नहीं होना चाहिए क्योंकि भय का अंत करना ही माँ के इस रूप का ध्येय है।

    देवी कालरात्रि दिन-रात के रात प्रहर पर राज करती हैं। उन्हें शुभंकरी भी कहा जाता है अर्थात शुभ कार्य करने वाली। माता अपने भक्तों के जीवन में शुभ और निर्भयता का संचार कर देती हैं। माता के अन्य नाम रौद्री और धुमोरना भी है।

    कालरात्रि दो शब्दों से मिल कर बना है - काल और रात्रि। काल का अर्थ होता है समय। अर्थात वो चक्र जिस पर पूरा ब्रह्माण्ड चलता है। कहीं कहीं पर शिव को ही समय कहा गया है और काली को उनकी पत्नी।

    कालः शिवः। तस्य पत्नीति काली।

    अर्थात शिव काल हैं और काली उनकी पत्नी।

    काल का अर्थ काला भी होता है। अर्थात वो दशा जो सर्वप्रथम थी। जिसका अस्तित्व रौशनी से पहले था और जो हर जगह है। काल का समय साधारण मनुष्यों के लिए भयभीत कर देने वाला होता है परन्तु माता के भक्तों के लिए ये समय बहुत शुभ होता है। इसे दुसरे शब्दों में कहा जाए तो कालरात्रि अज्ञानता के अन्धकार को दूर कर देती हैं।

    कालरात्रि की कहानी कुछ इस प्रकार है -

    शुम्भ-निशुम्भ नाम के दो राक्षसों ने देवलोक पर आक्रमण कर देवताओं को पराजित कर दिया। देवता भगवान शिव के पास पहुंचे और देवी पार्वती से प्रार्थना की कि वो उन्हें उन राक्षसों से मुक्ति दिलाएं। देवी ने अपना एक रूप प्रकट किया जिसे चंडी कहा जाता है। शुम्भ-निशुम्भ ने दो राक्षसों को चंडी से युद्ध करने भेजा जिनका नाम चंड मुंड था। चंडी ने उनके वध हेतु एक देवी प्रकट की जिनका नाम काली/कालरात्रि था। काली ने उनका वध किया और उनका नाम चामुंडा पड़ा।

    इसके बाद रक्तबीज नामक राक्षस आया। रक्तबीज को वरदान था कि उसके लहू की बूँद अगर धरा पर पड़ी तो एक नया रक्तबीज पैदा हो जाएगा अर्थात उसका रक्त एक बीज के समान था तो अन्य रक्तबीज पैदा करेगा। कालरात्रि जैसे ही रक्तबीज को मारती थीं, सैकड़ों रक्तबीज उसके लहू से पैदा हो जाते थे। इस प्रकार उसका अंत करना असंभव हो रहा था। कालरात्रि ने फिर रक्तबीज का रक्त धरा पर गिरने से रोकने के लिए उसे पीना शुरू कर दिया और अंत में रक्तबीज का समूल नाश हुआ और चंडी की मदद की शुम्भ और निशुम्भ के वध में।

    ऐसा भी कहा जाता है कि कालरात्रि को देवी चामुंडा (काली) ने प्रकट किया था जो बहुत बलशाली गधे पर सवार थीं। कालरात्रि ने चण्ड-मुंड को पकड़कर चामुंडा के समक्ष प्रस्तुत किया और काली ने उनका वध किया।

    एक अन्य मान्यता के अनुसार दुर्गासुर नामक राक्षस कैलाश पर आक्रमण करने का विचार कर रहा था। तब शिव वहाँ उपस्थित नहीं थे। तब देवी पार्वती ने कालरात्रि को प्रकट किया उसे सन्देश देने के लिए कि वो कैलाश पर आक्रमण करने का दुस्साहस न करे वरना उसका नाश हो जायेगा। परन्तु फिर भी दुर्गासुर ने आक्रमण किया और पार्वती ने उसका अंत कर दिया। तब माता का नाम दुर्गा पड़ा। यहाँ कालरात्रि ने माता पार्वती के लिए सन्देश वाहक का कार्य किया।

    माता कालरात्रि के चार भुजाएं हैं जिनमें बाएं दो भुजाओं में शमशीर और वज्र है और दायीं दो भुजाएं वरदान और अभय मुद्रा में हैं। कालरात्रि के तीन नेत्र हैं जिनमे से बिजली के समान किरणें निकलती रहती हैं। जब वे सांस लेती हैं तो उनकी नाक से अग्नि निकलती है।

    माता का मंत्र -

    एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता, लम्बोष्टी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी। वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा, वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयङ्करी॥

    || जय माता कालरात्रि ||

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