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  • नवरात्रि में दुर्गा माँ के नौ रूपों की कथा ( शैलपुत्री माँ ) प्रथम रात्रि

    जय माँ शैलपुत्री

    नवरात्रि माँ दुर्गा की पूजा हेतु समर्पित नौ रात्रियाँ हैं। नवरात्रि में माँ के पूजन का विशेष महत्व होता है। माँ की लीलाओं का सम्पूर्ण वर्णन करने में कोई समर्थ नहीं। मेरा यह प्रयास भक्तों की सेवा करने के भाव से प्रेरित होकर किया गया है। हे दुर्गा माँ ! हे शिव ! आप मुझे मेरे इस लेखन में हुए अपराधों के लिए क्षमा कीजियेगा और यह लेख सभी भक्तों के लिए कल्याणकारी सिद्ध हो ऐसी दया कीजियेगा।
    शिव शिव शिव...

    दुर्गा माँ की प्रथम रूप माँ शैलपुत्री हैं। शैल का तात्पर्य पर्वत से है अत: पर्वतराज हिमालय की पुत्री होने के कारण माँ का नाम शैलपुत्री पड़ा। माँ का एक और नाम पार्वती माँ भी है।

    इस रूप में माँ शैलपुत्री हिमालय तथा माता मैना की पुत्री हैं। माँ का वाहन गाय हैं तथा ये हाथों में कमल पुष्प और त्रिशूल धारण की हुई हैं। ये शिव जी की पत्नी हैं।

    कथा - माँ पार्वती पूर्वजन्म में प्रजापति दक्ष जी के यहाँ जन्मीं थीं। दक्ष ब्रह्मा जी के पुत्र हैं। ब्रह्मा जी जब सृष्टि का विस्तार करना चाहें तब उन्होंने अपने कई पुत्रों की रचना की उनमे सबसे श्रेष्ठ दक्ष थे जिसके कारण उन्हें प्रजापति नियुक्त किया गया।

    ब्रह्मा जी तथा विष्णु जी विवाहित थे किंतु शिव अविवाहित इसलिए शिव जी की प्रेरणा से ब्रह्मा जी आदिशक्ति माँ को प्रसन्न करने हेतु कठोर तप करने लगे उनकी आज्ञा पर दक्ष भी तप करने लगे। जिससे प्रसन्न होकर आदिशक्ति माँ ब्रह्मा जी को दर्शन दीं इच्छानुसार वरदान मांगने को कहने पर ब्रह्मा जी ने कहा कि आप दक्ष जी की पुत्री के रूप में जन्म लेकर संसार का उद्धार करें। माँ उन्हें वरदान देकर अंतर्धान हो गयीं। जब दक्ष जी का तप पूर्ण हुआ माँ पुन: प्रकट हुई । दक्ष जी ने भी यही वरदान मांगा तब माँ उन्हें वरदान दी थीं किन्तु सावधान करते हुए बोलीं की जब तुम मेरा अनादर करोगे तब मैं अपना वह रूप त्याग दूँगी। दक्ष जी ने बात स्वीकार कर ली।

    इसके पश्चात दक्ष जी के यहाँ माँ का जन्म हुआ उन्हें सती पुकारा जाने लगा। क्योकि वे जन्म जन्मांतर से शिव का अभिन्न रूप हैं शिव की अर्धांगिनी हैं इसलिए उनके मन मे शिव जी को पाने की इच्छा हुई। किन्तु दक्ष शिव को अपना शत्रु मानते थे इसके कई कारण थे।

    मुख्य कारण यह था कि एक बार ब्रह्मा जी द्वारा शिव जी को तप से उठाने हेतु वेदों की निंदा किया गया तब शिव जी ने क्रोधित हो उनका वह शीश काट दिये जिससे वे लगातार वेदों की निंदा बहुत समय से किये जा रहे थे। ब्रह्मा जी के चार शीश थे जिनमे से तीन मुखों से वे वेदों का निरंतर गुणगान कर रहे थे और चौथे से वेदों की निंदा। उसी एक शीश को शिव जी द्वारा काटा गया जब यह बात ब्रह्मापुत्र दक्ष जी को पता चला तो वे शिव जी को अपना शत्रु मान बैठे।

    शिव जी से विवाह करने के कारण माँ सती से दक्ष बहुत नाराज थे। एक बार विशाल यज्ञ का आयोजन किया गया सभी साधु संत आये ब्रह्मा जी जो दक्ष जी के पिता और श्रीहरि जो दक्ष जी के आराध्य हैं वे भी आये किन्तु शिव जी को निमंत्रण ही नही भेजा गया।

    जब कैलाश के ऊपर से सभी देव अपनी पत्नियों के साथ यज्ञ में जा रही थीं और माँ सती की बहनें जिनका विवाह देवताओं से हुआ वे भी जा रही थीं माँ सती उन सब के जाने का कारण पूछने लगीं। जब यह बात पता चला कि दक्ष बहुत बड़ा यज्ञ कर रहे हैं जिसमे सभी देव और ऋषिजन सपरिवार आमंत्रित हैं किंतु उन्हें आमंत्रित नही किया गया माँ को दुख हुआ वे सोचने लगीं की अवश्य पिताश्री भूल गए होंगे।

    माँ शिव जी के पास जाकर दक्ष जी के यज्ञ में जाने की इच्छा प्रकट करने लगीं वे चाहती थीं कि वे भी शिव जी के साथ यज्ञ में जायें किन्तु शिव उन्हें सारा हाल कह सुनाये और बोले कि दक्ष ने हमे आमंत्रित नही किया है।

    तब माँ दक्ष जी को समझाने जाना चाहती थीं क्योंकि बिना शिव के कोई यज्ञ सम्पन्न नही होता । शिव जी उन्हें जाने से मना किये किन्तु माँ जिद करने लगीं तब शिव जी अपने बहुत सारे गणों के साथ सती माँ को यज्ञ में जाने हेतु विदा किये।

    यज्ञ में माँ का बिल्कुल सम्मान न हुआ वहाँ सभी देव ऋषि इत्यादि थे सभी को यज्ञ का भाग दिया गया शिव का ऐसा अपमान देख ऋषि दधीचि माँ के आने से पूर्व ही अपने शिष्यों सहित यज्ञ छोड़कर चले गये थे और जाते जाते यह शाप दे गए थे कि यह यज्ञ कभी सम्पन्न न होगा। माँ का निरादर हुआ शिव जी का भी अपमान हुआ ऐसा होता सभी देखते रहे । माँ प्रयास कर रही थीं दक्ष जी को समझाने का किन्तु दक्ष शिव जी का अपमान किये जा रहे थे ।

    माँ को यह सहन नही हुआ वे दक्ष जी के यहाँ जन्म लेने से पहले बोलीं थीं कि मेरा अपमान होने पर मैं अपना यह रूप त्याग दूँगी इसलिए माँ अपने पति का अपमान होता देख शरीर त्यागने का निश्चय कर बैठीं। शिव और माँ सती में भेद नहीं, शिव का अपमान माँ सती का अपमान है।

    वे सभी देवताओं और ऋषियों को यह शाप दीं की सभी शिव निंदा सुने हैं इसलिए सभी को इस पाप का उचित दंड मिलेगा और मैं भी इस पाप से मुक्त होने हेतु अपना शरीर त्याग दूँगी। माँ यज्ञ की अग्नि में कूदकर अपना शरीर भष्म कर दीं।

    सभी शिवगण यह देख अत्यंत व्याकुल हुए , वे रोने लगे । माँ के साथ शिव जी की पूरी सेना थी जिसमे से लाखों शिवसेना अर्थात शिवगण माँ के जल जाने के दुख में ही मर गए अर्थात शरीर छोड़ दिये। जो बचे वे सभी ऋषियों और देवताओं का नाश करने लगे। सप्तऋषियों में से एक ऋषि यज्ञ कुंड से महापराक्रमी सेना की रचना किये जो शिव सेना का नाश करने लगी कुछ शिव सेना शिव जी के पास पहुंची और सारा हाल कह सुनाई।

    इससे शिव अत्यंत कुपित हुए तथा वीरभद्र और माँ काली को दक्ष जी तथा वहाँ स्थित देवों तथा ऋषियों को दंड देने के लिए भेजे। वीरभद्र जी जो शिव जी के अवतार हैं उन्होंने दक्ष जी का शीश काट दिया और सभी जनों को उचित दंड दिए।

    उसके बाद सती माँ पर्वतराज हिमालय और माता मैना के यहाँ जन्म लीं। इस जन्म में ये पार्वती माँ, शैलपुत्री माँ आदि नामों से जानी जाती हैं।
    शिव शिव शिव...

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