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  • नवरात्रि में दुर्गा माँ के नौ रूपों की कथा ( ब्रम्हचारिणी माँ ) द्वितीय रात्रि

    शिव दास

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    जय माँ ब्रम्हचारिणी

    नवरात्रि माँ दुर्गा की पूजा हेतु समर्पित नौ रात्रियाँ हैं। नवरात्रि में माँ के पूजन का विशेष महत्व होता है। माँ की लीलाओं का सम्पूर्ण वर्णन करने में कोई समर्थ नहीं। मेरा यह प्रयास भक्तों की सेवा करने के भाव से प्रेरित होकर किया गया है। हे दुर्गा माँ ! हे शिव ! आप मुझे मेरे इस लेखन में हुए अपराधों के लिए क्षमा कीजियेगा और यह लेख सभी भक्तों के लिए कल्याणकारी सिद्ध हो ऐसी दया कीजियेगा।

    शिव शिव शिव...

    दुर्गा माँ की द्वितीय रूप माँ ब्रम्हचारिणी हैं। ब्रम्ह का तात्पर्य तप, चारिणी अर्थात आचरण करना होता है अत: तप का आचरण करने के कारण माँ को तप का आचरण करने वाली अर्थात ब्रम्हचारिणी कहा गया है।

    इस रूप में माँ पार्वती हिमालय जी तथा माता मैना की पुत्री हैं। माँ का यह स्वरूप अत्यंत तेज से परिपूर्ण और भव्य है । माँ के दाएं हाथ में रुद्राक्ष माला और बाएं में कमण्डलु है। माँ का यह स्वरूप शिव जी को पति रूप में पाने हेतु धारण किया गया अर्थात जब माँ शिव जी को पाने के लिए कठोर तप का आचरण करने लगीं उन्हें ब्रम्हचारिणी नाम से जाना जाने लगा।

    कथा - एक समय की बात है देवर्षि नारद जी हेमराज हिमालय जी के यहाँ पधारते हैं हिमालय जी माता मैना सहित उनका स्वागत करते हैं और माँ भवानी को उनके सामने प्रस्तुत करते हुए उनके विवाह के विषय में पूछते हैं । देवर्षि नारद जी माँ शिवा का हाथ देखकर शिव जी के गुणों का वर्णन करते हुए कहते हैं कि देवी उमा का विवाह ओम स्वरूप साक्षात महादेव से होगा क्योंकि जैसे लक्षण इनके पति के विषय में मुझे इनके हाथों में दिख रहा है वैसे लक्षणों से केवल भोलेनाथ ही युक्त हैं। माँ दुर्गा यह सुनकर मन ही मन अत्यंत प्रसन्न होती हैं। हरिप्रिय नारद कहते हैं किंतु उन्हें पति रूप में पाना अत्यंत कठिन है क्योंकि वे सांसारिक बंधनों से दूर एकांत में वास करते हैं उनका विवाहादि में कोई रुचि नही वे ब्रम्हचारी तथा एकांत प्रिय हैं। बड़े बड़े संत उनका कठोर तप युगों युगों से करते आ रहे हैं । उन्हें पाने के लिए हिमालय सुता को वन में जाना होगा जहाँ भयानक पशुओं और राक्षसों का वास होता है, कठिन तपस्या करना होगा, व्रत रखना होगा मैना माता की लाडली कोमलांगी पार्वती के लिए यह तप बिल्कुल सहज न होगा।

    यह सुनकर माँ के नेत्रों से अश्रु बहने लगते हैं वहाँ उपस्थित सभी यह सोचते हैं कि हिमालय पुत्री कष्टों से घबराकर रो रही हैं किंतु यह भेद कोई नही जान पाता कि माँ के सुंदर नेत्र प्रसन्नता के कारण सजल हो उठे ।

    नारद जी के जाने के बाद माँ पार्वती अपने पिता समस्त पर्वतों के राजा हिमालय और महारानी माता मैना से आज्ञा लेकर वन की ओर चल पड़ती हैं। उनका वेश अत्यंत साधारण है न सुंदर पुष्पों की माला न ही बहुमूल्य रत्नों से जड़ित हार उनके गले में शुशोभित है नंगे पांव वे कोमलांगी शिवप्रिया भयानक वन को चल पड़ीं जहाँ जाने और वास करने में बड़े बड़े शूरवीर भी भयभीत हो जाते हैं। जहाँ सच्चा प्रेम होता है कांटे भी फूल प्रतीत होते हैं शायद यही कारण है कि माँ के नेत्र प्रसन्नता से सजल हो उठे थे। माता मैना के बार बार कहने पड़ हिमालय पर्वत की राजकुमारी अपने साथ अपनी कुछ सहेलियां साथ ले लीं और वन को प्रस्थान कर गयीं।

    माँ पार्वती एक वर्ष तक केवल फल - मूल खाकर तप करती रहीं, सौ वर्षों तक शाक (घांस और छोटे पौधे की प्रजाति अर्थात शब्जी) सेवन कीं, कठिन शिवरात्रि इत्यादि व्रत करती रहीं , माँ जगदम्बा शाक का भी त्याग कर तीन हजार वर्षों तक केवल बेल के गिरे हुए पत्तों को खाकर ही तप करने लगीं उसके पश्चात कई हजार वर्षों तक माँ अर्धनारीश्वरी पत्ते का भी सेवन त्याग निराहार तप करती रहीं। पत्तों ( पर्ण ) का भी त्याग करने के कारण माँ त्रिलोकों में अपर्णा नाम से प्रसिद्ध हो गयीं।

    इतने कठिन तप के तेज से वे अत्यंत तेजवती हो गयीं उनके तप के प्रभाव से तीनों लोक व्यथित होने लगा। देवता, सिद्धजन, गन्धर्व , यक्ष ,किन्नर सभी उनके दर्शन करने आने लगे उस समय वन की यह स्थिति थी कि वहाँ भयानक पशु पक्षी अपनी हिंसक प्रवृत्ति भूलकर शाकाहारी पशु पक्षियों के साँथ रहते थे सभी एक ही सरोवर से जल पीते थे जो दशा विष्णु जी के अवतार हिमालय जी के यहाँ माँ के प्रकट होने पर हिमालय पर्वत की हो गयी थी आज वही दशा इस वन की हो रही है। बहुत ही अद्भुत और मनभावन दृश्य है यह।

    पार्वती प्रिय शिव जी शिवा माँ के इस कठोर तप से अत्यंत प्रसन्न हैं इतना तप कभी किसी सुर, असुर या मनुज (मनुष्य) किसी ने नही किया।

    नंदिप्रिय भूतभावन महादेव भोलेनाथ शिव शम्भू सप्तऋषियों का स्मरण करते हैं ब्रम्हपुत्र सप्तर्षि हाथ जोड़कर खड़े हो जाते हैं रावणप्रिय कैलाशस्वामी कहते हैं, आप जाकर हिमालयसुता की परीक्षा लीजिये मेरी निन्दा कीजिये उन्हें हरि महिमा से अवगत कराइये । जगत के सभी मनुष्यों के पूर्वज, जो आज्ञा प्रभु कहकर चल पड़ते हैं। उन्हें देख माँ उनका सत्कार करती हैं वे उनकी सेवा से संतुष्ट होते हैं किंतु शिवाज्ञा कैसे टालें । वे शिवप्रिय श्रीहरि का गुणगान और हरिप्रिय आदिनाथ की निंदा करते हैं कहते हैं शिव तो शमशानवाशी, रुद्राक्ष के आभूषण धारण करने वाले, भष्म रमाये अवधूत हैं। सर्प उनका श्रृंगार भूत प्रेत उनके परिवार हैं। जटाजूट धारी, अत्यंत कठोर शरीर, ब्रम्हा का शीश काटने वाले कामदेव को भस्म करने वाले वे साक्षात महाकाल हैं। काल भी उनसे भयभीत रहता है ऐसे महाकालेश्वर एकांतप्रेमी भूत प्रेतों का संग करने वाले उन महारुद्र को आप पति रूप में स्वीकारना चाहती हैं जो पहले से ही विवाहित हैं उन्होंने अपनी पूर्व पत्नी माता सती को कोई सुख नही दिया उन्हें हवनकुंड में अपनी आहुति देनी पड़ी। महादेव को संसार के रीति रिवाजों का कोई ज्ञान नही, वे समभावी हैं सुख दुख का उन पर कोई प्रभाव नही पड़ता, न ही मान अपमान से कोई फर्क ही पड़ता है। न उनका गोत्र न ही कोई माता पिता हैं ऐसे असुरप्रिय, भूतों के स्वामी से विवाह करके आप क्या सुख पायेंगी।

    वे आपके सर्वथा अयोग्य हैं आप इंद्र से विवाह कीजिये वे अत्यंत सुंदर और देवों के राजा हैं या आप नारायण से भी विवाह कर सकती हैं ऐसे में आप चराचर जगत की स्वामिनी हो जाएंगी शिव के प्रति अपने प्रेम का त्याग कर दीजिए हरि दुखों को हरने के कारण सर्वथा कल्याणकारी हैं। ( शिव अर्थात कल्याण शंकर अर्थात कल्याण करने वाले )

    यह सब आदिशक्ति माँ भवानी के स्वामी शम्भू सुनकर मन ही मन मुस्कुरा रहे हैं। शिवस्वरूपा माँ सती जो अद्वितीय तप के कारण ब्रम्हचारिणी माँ के रूप में जगत प्रसिद्ध हो गयी हैं वे भी शिव के ऐसे विलक्षण स्वरूप तथा लीला को सुनकर मन ही मन मुग्ध हुए जा रही हैं।

    माँ सप्तऋषियों को पथ से च्युत न होने (मार्ग से न हटने) का अपना निश्चय सुनाकर आदरसहित वापस भेज देती हैं। सप्तर्षि उनकी दृढ़ता और प्रेम को देख मन ही मन प्रसन्न हो बाहर से रुष्टता प्रकट करते हुए प्रस्थान कर जाते हैं और कैलाश में आकर माँ की दृढ़ता और प्रेम की प्रशंसा करने लगते हैं और कहते हैं कि आपको अब उन्हें स्वीकार कर लेना चाहिये। भोलेनाथ की आज्ञा ले जगत के लिए पूज्यनीय सप्तर्षि कैलाश से भी चले जाते हैं। उधर माँ भवानी अब भी कठोर तप कर रही हैं।

    अब भोलेनाथ पुन: अपने प्राणों से भी प्रिय सनातन पत्नी की परीक्षा लेने का निश्चय करते हैं और स्वयं वन की ओर साधुवेश धारण कर चल पड़ते हैं।

    गुफा के द्वार पर साधु को आया देख शिव की प्राणप्रिया उनका स्वागत करती हैं। जो परमात्मा की प्राप्ति हेतु प्रयासरत हैं ऐसे साधु महात्माओं की सेवा हम सभी का धर्म होता है ये शीघ्र परमात्मा की कृपा दिलाने में पूर्ण सक्षम होते हैं। ये साधुवेशधारी विलक्षण ही हैं इनके आंखों में तेज और प्रेम का अद्भुत संगम है चेहरे में सौम्यता की दिव्य आभा है। भोलेनाथ जब मुस्कुराते हैं लगता है जैसे जगत की मोहकता इनके मधुर मुस्कान का एक अंश भी नहीं। ज्ञान के भंडार जगत गुरु होने के पश्चात भी अहंकार और घमंड से शून्य भूतभावन अत्यंत भोले और शीघ्र प्रसन्न होने वाले हैं शरीर से अत्यन्त कठोर, हृदय से अत्यंत कोमल मेरे शिव आज अपने ही स्वरूप अपने अर्धरूप अपने स्वामिनी के सामने खड़े हैं त्रिपुण्डधारी, हरि को अत्यन्तप्रिय माँ भवानी के पति शिव सच में बिना शिवा के शव ही हैं। ऐसे नाथ लगातार अपनी ही निंदा और अपने स्वामी तथा भक्त गोविंद की लगातार स्तुति किये जा रहे हैं।

    माँ को क्रोध आ जाता है वे शिव को डांटते हुए सप्तऋषियों के आगमन तथा शिव पथ से उन्हें हटाने की चेष्टा करने के विषय में बताती हैं और कहती हैं कि वे केवल शिव को ही अपना पति मान चुकी हैं । या तो वे शिव को प्राप्त करेंगीं या पुन: स्वयं को भष्म कर लेंगीं। शिव द्वारा अनेकों प्रकार से प्रयत्न करने पर भी माँ के न मानने पर उनकी दृढ़ता और प्रेम देख शिव प्रसन्न हो जाते हैं तथा अपने वास्तविक रूप में प्रकट होते हैं। जब हम सांसारिक मनुष्य से प्रेम करते हैं तो वह प्रेम कहलाता है और जब परमात्मा से प्रेम करते हैं तो भक्ति। आप किसी स्वार्थ जो आपके प्रेम को प्रदर्शित न कर आपके सांसारिक माया में आसक्ति को प्रदर्शित करती है से परमात्मा की सेवा (तप) करते हैं या केवल परमात्मा की महिमा से प्रभावित होकर परमात्मा से प्रेम करते हैं तो आपका वह प्रेम वह भक्ति विशुद्ध नहीं प्रेम अर्थात भक्ति में कभी स्वार्थ नही होता प्रेम त्याग का दूसरा रूप है जिसमे भक्त अर्थात प्रेमी अपना सबकुछ अपने प्रियतम के लिए त्यागने हेतु सदैव तत्पर रहता है। वह बस अपने आराध्य की खुशी चाहता है और अपने आराध्य को चाहता है।

    शिव जी ब्रम्हचारिणी माँ को अपनी प्रसन्नता और उनकी तप की पूर्णता से अवगत कराते हुए उनसे तुरंत विवाह कर कैलाश ले जाने की इच्छा प्रकट करते हैं। माँ मुस्कुराती हैं और समाज के रीति रिवाजों सहित माता मैना और पिता हिमालय की इच्छा से विवाह करने की इच्छा भोले शिव के सामने प्रकट करती हैं।

    शिव प्रसन्न होते हैं और तथास्तु ( ऐसा ही होगा) कहकर अंतर्धान हो जाते हैं माँ अपने घर की ओर प्रस्थान कर जाती हैं।

    जय शिव शिवा, जय गौरीशंकर, जय अर्धनारीश्वरी जय अर्धनारीश्वर, जय ओम जय उमा, जय मेरे पिता जय मेरी माँ। शिव शिव शिव...

    ओम नम: शिवाय नम: शिवाय नम: शिवाय...

    लिखने में हुई त्रुटियों के लिए कृपया मुझे क्षमा कीजियेगा शिव माँ आप सब को सद्बुद्धि देते हुए आप सब पर सदा दया करें।

    ।।।शिव शिव शिव।।।

    ।।।हर हर महादेव।।।

    ।।शिव शिव शिव, शिव शिव शिव, शिव शिव शिव।।

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