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  • विजयादशमी (दशहरा) की कहानी

    Akash Mittal

    विजयादशमी, जिसे दशहरा भी कहा जाता है, नवरात्री के दसवें दिन मनाया जाता है। हिन्दू पंचांग के अनुसार दशहरा, अश्विन माघ के दसवें दिन मनाते हैं। अंग्रेजी पंचांग के अनुसार ये सितम्बर या अक्टूबर में पड़ता है।

    विजयादशमी का अर्थ है विजय की दशमी (आश्विन माघ की) अर्थात अच्छाई की बुराई पर जीत। देवी दुर्गा ने महिषासुर का वध करके संसार को दैत्य के आतंक से मुक्ति दिलाई थी। दशहरा का अर्थ होता है दशम + अहर अर्थात दसवां दिन। इसका एक और अर्थ होता है दुश + हर अर्थात पाप, बुराई, अन्याय को हर लेना अर्थात उसे ख़त्म कर देना।

    देश-विदेश के विभिन्न प्रांतों में दशहरा अलग अलग तरह से मनाया जाता है। परन्तु उसे मनाने के मुख्य दो कारण हैं -

    १. नवरात्री का समापन होता है और दसवें दिन माता की मूर्ति को नदी में विसर्जित किया जाता है।

    २. श्री राम द्वारा रावण का वध।

    दशहरा के बीस दिन बाद रौशनी का त्यौहार, दीपावली मनाई जाती है।

    उत्तर और पश्चिम भारत में दशहरा मनाने का मुख्य कारण, श्री राम का रावण वध और लंका पर विजय है। जगह जगह पर रामायण और रामचरितमानस का पाठ किया जाता है। नृत्य, नाटक और संगीत से श्री राम की कथा का प्रसार किया जाता है। मेघनाथ, कुम्भकरण और रावण के पुतलों का दहन किया जाता है। यह क्रोध, अहंकार, अत्याचार के अंत का प्रतीक है। ये बताया जाता है कि महाज्ञानी, महापंडित, महाभक्त होने के बावजूद अहंकार पतन का कारण बन सकता है।

    अयोध्या, वाराणसी, वृन्दावन जैसे स्थानों पर रामलीला का आयोजन किया जाता है। सभी लोग पूरे भक्ति भाव और श्रद्धा से कलाकारों की मंच सजाने में सहायता करते हैं।

    हिमाचल का कुल्लू दशहरा बहुत प्रचलित है। करीब पांच लाख लोग हर साल इसका हिस्सा बनते हैं। एक भव्य मेला का आयोजन किया जाता है और जुलूस निकाला जाता है। उस जुलूस में विभिन्न प्रांतों के देवी-देवताओं की झांकियाँ निकाली जाती हैं जो अत्यंत सुन्दर होती हैं।

    दक्षिण भारत में विजयादशमी पर देवी दुर्गा का पूजन किया जाता है। मंदिरों और किलों को रोशन किया जाता है। मैसूर के किले को रौशनी से जगमगा दिया जाता है और विभिन्न रंगीन आकृतियाँ दिखाई देती हैं जिसे गोलू कहा जाता है। विजयनगर साम्राज्य में इस त्यौहार का बहुत महत्व था। राजा की सहायता से धार्मिक और फौजी प्रसंग प्रस्तुत किये जाते थे। विभिन्न प्रकार की बल प्रदर्शन प्रतियोगिताएं रखी जाती थीं। नाच, गाना, आतिशवाजी, दान-दक्षिणा, फौजी जुलूस से इस त्यौहार को भव्य बनाया जाता था। मैसूर जिला दशहरा मनाने का प्रमुख स्थान माना जाता है।

    दक्षिण भारत के अन्य जगहों पर इसे अन्य कारणों से भी मनाया जाता है। काफी जगहों पर माँ सरस्वती की भी पूजा की जाती है। माँ सरस्वती विद्या, संगीत, ज्ञान और कला की देवी हैं। इसके साथ साथ लोग अपने यन्त्र, उपकरण, गाड़ी, पालतू जानवरों आदि की भी पूजा करते हैं।

    महाराष्ट्र में इसका महत्व वीर शिवाजी से भी जुड़ा हुआ है। शिवाजी ने मुग़लों के साथ युद्ध किया था और पश्चिमी और मध्य भारत में हिन्दू शाशन स्थापित किया था। मानसून के समय शिवाजी के सैनिक अपने गाँव में जाकर गाँव वासियों की खेती में मदद करते थे जिससे फसल अच्छी रहे। फिर दशहरा वाले दिन सभी सैनिक वापस अपने हथियारों से सुसज्जित होकर अपने कर्तव्य पूर्ती हेतु प्रस्थान कर जाते थे।

    पूर्वी भारत में दुर्गा माता की प्रतिमा को नदी में विसर्जित किया जाता है। लोग अपने माथे पर सिन्दूर सजाते हैं और भावुक अलविदा गानों और भजनों के साथ माता को विदा करते हैं।

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