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  • रमा एकादशी व्रत कथा

    रमा एकादशी कार्तिक माघ की एकादशी है। इसका बहुत महत्व होता है। 2017 में ये 15 अक्टूबर को है। रमा एकादशी की कथा कुछ इस प्रकार है -

    महाराज युधिष्ठिर श्री कृष्ण से पूछते हैं - हे वासुदेव, हे जगत के तारणहार, वो कौन सी एकादशी है जो कार्तिक माघ में आती है? कृपया मुझे उसका ज्ञान दीजिये।

    श्री कृष्ण कहते हैं - हे सम्राट युधिष्ठिर कार्तिक माघ की एकादशी बहुत शुभ होती है। इसे रमा एकादशी कहते हैं और ये व्रत करने वालों को ईश्वर के धाम का मार्ग प्रदान करती है। मैं तुम्हे इसकी कहानी बताता हूँ।

    मुचकुन्द नाम का एक बहुत प्रतापी राजा हुआ करता था। वो सत्यवादी और दृण निश्चयी था। उसके राज के नियम धार्मिक डोर से बंधे थे। देवराज इंद्र, यमराज, वरुण, रावण के भाई विभीषण आदि उसके मित्र हुआ करते थे। उसके राज्य में किसी प्रकार का कोई उपद्रव नहीं था। प्रजा बहुत प्रसन्न और संतुष्ट थी। मुचकुन्द की एक पुत्री थी जिसका नाम चंद्रभागा था। अपने पिता की तरह वो भी बहुत धार्मिक और गुणवान थी। उसका विवाह चन्द्रसेना नामक राजा के पुत्र शोभन के साथ हुआ था।

    मुचकुन्द रमा एकादशी पर पूरे राज्य में घोषणा करवाते थे की आज के दिन सभी उपवास करेंगे। यहाँ तक कि जानवर भी पूर्ण रूप से उपवास करेंगे। श्री हरी की भक्ति में पूरा राज्य पूर्ण सहयोग करेगा।

    शोभन दुर्बल शरीर के थे। ज्यादा कष्ट वो सहन नहीं कर सकते थे। एक बार वो रमा एकादशी पर अपने ससुराल गए। राजा मुचकुन्द के नियम अनुसार सभी को व्रत करना अनिवार्य था। चंद्रभागा को शोभन की चिंता होने लगी क्योंकि नियम सभी पर लागू होते हैं और शोभन व्रत की पीड़ा को सहन नहीं कर सकते थे।

    जब व्रत की घोषणा हुई तो शोभन ने चंद्रभागा से कहा - हे प्रिये! में क्या करूँ? अगर व्रत करता हूँ तो अवश्य ही मृत्यु को प्राप्त हो जाऊंगा और नहीं करता हूँ तो राजा मुचकुन्द की अवेहलना होगी। ऐसा क्या करूँ कि नियम भी रह जाए और व्रत भी।

    चंद्रभागा ने कहा - स्वामी! मेरे पिता के राज्य में रमा एकादशी का व्रत करना अनिवार्य है। आपकी पीड़ा से में भलीभांति परिचित हूँ। परन्तु राज्य में सभी को व्रत करना ही पड़ता है फिर चाहे वो मनुष्य हो या पशु। आप अगर उपवास नहीं कर सकते तो कृपया आज के दिन के लिए राज्य से चले जाइए। यही सबसे उत्तम होगा।

    शोभन बोले - मैंने निर्णय कर लिया है की मैं यहीं रह कर एकादशी का व्रत करूँगा। जो मेरे भाग्य में होगा उसे कोई टाल नहीं सकता।

    एकादशी का व्रत आरम्भ हुआ। सभी लोग उत्साह से झूमते-गाते दिन भर पूजा में लीन थे। परन्तु शोभन को बहुत पीड़ा हो रही थी। सूर्यास्त हुआ और लोगों ने रात्रि जागरण किया। उनका उत्साह और भी बढ़ गया था परन्तु शोभन की पीड़ा असहनीय हो रही थी। भूख-प्यास से बेहाल हो रहे थे।

    द्वादशी को सूर्योदय हुआ और उसी के साथ शोभन ने प्राण त्याग दिए। राजा मुचकुन्द ने शोभन का विधिवत रूप से अंतिम संस्कार किया परन्तु चंद्रभागा को सती होने की अनुमति नहीं दी। राजा मुचकुन्द जानते थे कि शोभन ने व्रत पूर्ण किया है और उसी के चलते उसकी मृत्यु हुई है। श्री नारायण की कृपा उस पर अवश्य बरसेगी। चंद्रभागा ने अपने पति के अंतिम संस्कार की सभी विधियाँ पूर्ण की और अपने पिता के साथ महल में ही रहने लगीं।

    श्री कृष्णा बोले - हे युधिष्ठिर! यूँ तो शोभन ने व्रत मजबूरी में किया था परन्तु उसने बहुत कष्ट सहते हुए भी व्रत का मान रखा। इसलिए श्री हरी ने उसे मंदराचल पर्वत पर देवपुर नामक राजमहल का राजा बनाया जो शत्रुओं से रहित था। स्वर्ग के समान सुन्दर वो राजमहल स्वयं इंद्र के महल जैसा था। सोना, चांदी, हीरे और मोतियों से महल जगमगाता रहता था। जिस सिंहासन पर शोभन बैठे हुए थे वो माणिकों से जड़ा हुआ था। सेवक पंखा कर रहे थे। सर पर भव्य मुकुट था। कानों में सुन्दर कुण्डल। गले में अदभुद माला। गंदर्भ और अप्सराएँ संगीत और नृत्य से उनका मनोरंजन कर रहे थे। प्रतीत होता था कि वे दुसरे इंद्र हैं।

    एक दिन सोमशर्मा नाम के एक ब्राह्मण मंदराचल पर्वत से गुज़र करे थे तो उन्होंने देवपुर को देखा। इतना भव्य महल देख कर वो चकित हो गए। अंदर शोभन को देखा तो वो समझ गए कि ये राजा मुचकुन्द के जंवाई हैं। ब्राह्मण को महल में आते देख शोभन अपने सिंहासन से उठ खड़े हुए और उनको सम्मान सहित अंदर ले कर आये। उनकी सेवा की और पुछा कि महाराज मुचकुन्द कैसे हैं? चंद्रभागा कैसी हैं? प्रजा कैसी है? सोमशर्मा ने आश्वासन दिया कि सभी कुशल मंगल हैं और राजमहल में हमेशा की भाँती सुख, संपत्ति और समृद्धि है।

    सोमशर्मा बोले - परन्तु मुझे एक चीज़ समझ नहीं आयी कि इतना भव्य राजमहल आपको कैसे प्रदान हुआ? आखिर क्या क्या हुआ कृपया मुझे विस्तार से बताएं।

    शोभन बोले कि ये सब कुछ रमा एकादशी के व्रत के प्रभाव से हुआ है। परन्तु ये अस्थायी है। मैं चाहता हूँ कि इसे स्थायी बनाया जाए। कृपया मेरा मार्ग दर्शन करें।

    सोमशर्मा ने कहा - हे राजन पहले मुझे ये बताएं कि ये अस्थाई क्यों है और इसे स्थाई कैसे बनाया जा सकता है?

    शोभन बोले - चूँकि मैंने रमा एकादशी का व्रत रखा था इसलिए मुझे ये देवपुर का राजा बनाया गया है किन्तु मैंने वो व्रत मजबूरी और बिना किसी श्रद्धा के किया था इसलिए ये सब कुछ अस्थाई है। आप चंद्रभागा के पास जाइये और उसे मेरे बारे में सब कुछ बता दीजिये। चंद्रभागा इसे स्थाई बना सकती है।

    ब्राह्मण मुचकुन्द के महल की ओर प्रस्थान कर गए और सारी बातें चंद्रभागा को सुनाई। अपने पति के सुख और समृद्धि की बात सुन कर चंद्रभागा अत्यंत प्रसन्न हुई और बोली - हे ब्राह्मण देवता ! क्या ये सत्य है या आपने ऐसा कोई स्वप्न देखा है?

    सोमशर्मा बोले - हे राजकुमारी, मैंने सम्मुख होकर शोभन से बात की है और मैं उसका भव्य महल और समृद्धि स्वयं देख कर आ रहा हूँ। परन्तु उसने कहा है कि उसकी ये समृद्धि अस्थाई है और कभी भी विलीन हो सकती है। उसे आशा है कि केवल तुम ही उसे स्थाई कर सकती हो।

    चंद्रभागा ने कहा - हे ब्राह्मण देवता कृपया मुझे मेरे स्वामी के पास ले चलिए। एक बार पुनः मैं उनके दर्शन करना चाहती हूँ। मेरे वर्षों के एकादशी व्रत के प्रभाव से मैं उस राज्य को स्थिर और स्थाई कर सकती हूँ। मुझे मेरे स्वामी से मिला दीजिये। जो बिछ्डों को मिलते हैं वो भी अत्यंत पुन्य पाते हैं।

    जब शोभन ने चंद्रभागा को मंदराचल पर्वत पर देखा तो वो ख़ुशी से झूम उठा और अपनी पत्नी को लेने दौड़ पड़ा। उसने चंद्रभागा को अपने साथ बैठाया। चंद्रभागा ने कहा - हे मेरे स्वामी मेरी बात ध्यान से सुनें। मैं जब आठ साल की थी तब से मैं एकादशी का व्रत करती हुई आ रही हूँ। मैंने ये व्रत पूरी श्रद्धा से किये हैं। अगर मैं अपने सारे पुन्य आपको समर्पित कर दूँ तो आपका ये साम्राज्य स्थिर हो जायेगा और प्रलय आने तक इसकी ख्याति और समृद्धि बढ़ती ही रहेगी।

    श्री कृष्ण बोले - हे युधिष्ठिर, इस प्रकार चंद्रभागा अपने पति शोभन के साथ बड़े प्रेम और समृद्धि के साथ जीवन यापन करने लगी। जो भी एकादशी के व्रत पूरी श्रद्धा से करेगा उसे श्री हरी की कृपा का पुन्य प्राप्त होगा। यही थी रमा एकादशी की कहानी।

    || जय श्री कृष्णा ||

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