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  • शरद पूर्णिमा - महाराष्ट्र, गुजरात, पश्चिम बंगाल, मिथिला और ओडिसा में

    शरद पूर्णिमा की मान्यता है कि देवी लक्ष्मी रात को भ्रमड़ पर निकलती हैं और देखती हैं कि कौन कौन जाग रहा है। वो पूछती हैं - को जागर्ति? अर्थात कौन जाग रहा है? जो जाग रहे होते हैं उन्हें माता धन-धान्य से कृतार्थ करती हैं। लोग चंद्र की रौशनी में बैठ कर मनोरंजन के लिए खेल खेलते हैं, बातें करते हैं, नारियल पानी, खीर आदि कहते हैं। दूध पोहा खाने का भी रिवाज़ है।

    महाराष्ट्र -
    महाराष्ट्र में इसे कृषि त्यौहार की तरह मनाया जाता है। घर के बड़े बच्चे को सम्मानित किया जाता है।

    गुजरात -
    गुजरात के लोग इसे शरद पूनम कहते हैं और गरबा और डांडिया रास से इसे मनाया जाता है।

    पश्चिम बंगाल -
    बंगाली लोग इसे लोक्खी पूजो कहते हैं। माता लक्ष्मी को विभिन्न प्रकार के भोग चढ़ाए जाते हैं।

    मिथिला -
    मिथिला में इस पूजा को कोजागारह कहते हैं। घर के सभी देवी देवताओं की प्रतिमा को स्नान कराया जाता है और उन्हें घर के आँगन में रख दिया जाता है। आँगन को साफ़ करके उसे चावल के आटे से सजाया जाता है। देवताओं को पान, मक्खन, बताशा, खीर आदि का भोग लगाया जाता है। शरद पूर्णिमा की रात को मूर्तियों को बाहर ही छोड़ दिया जाता है क्योकि माना जाता है की इस रात अमृत बरखा होती है।
    नवविवाहित जोड़ों के लिए भी ये त्यौहार मुख्य होता है। इस दिन दुल्हन घर को सजाती है। दूल्हा, दुल्हन और उसके देवर सभी रात को जागरण करते हैं और विभिन्न खेल खेलते हैं। दुल्हन के घर से चावल, मक्खन, पान, नारियल, केले, अखरोट, कलावा, लॉन्ग, इलाइची, चांदी का सिक्का, चांदी की मछली या कछुआ, दही, मिठाई, कपडे आदि दूल्हे के घर भेजे जाते हैं।
    एक मैथिलि कथा के अनुसार लक्ष्मी और अलक्ष्मी दोनों जुड़वाँ बहनें हैं। लक्ष्मी को मीठे व्यंजन पसंद हैं और वे सौभाग्य प्रदान करती हैं वहीँ अलक्ष्मी को तीखे व्यंजन पसंद हैं और वे दुर्भाग्य प्रदान करती हैं। इसलिए तीखे व्यंजन बना कर बाहर रख दिए जाते हैं ताकि अलक्ष्मी वहीँ से उन्हें ग्रहण करके चली जाएं। जबकि मीठे व्यंजन थोड़े से बाहर रखे जाते हैं और ज्यादा अंदर ताकि लक्ष्मी थोड़ा बाहर ग्रहण करने के बाद अंदर आ जाएँ और वही रुक जाएँ।

    ओड़िसा -
    ओडिसा में इसे कुमार पूर्णिमा कहते हैं। कुमार, शिव और पारवती के पुत्र, कार्तिकेय को कहा जाता है। कार्तिकेय ने इस दिन ताड़कासुर से युद्ध प्रारम्भ किया था और उसका वध करके देवताओं को उसके आतंक से मुक्त किया था। फिर देवताओं ने उन्हें अपना सेनापति घोषित किया। कार्तिकेय बहुत सुन्दर थे। कुँवारी कन्याएं कार्तिकेय के समान गुण और सुंदरता वाले पति की कामना से ये त्यौहार मनाती हैं। पर इनकी पूजा की कोई विधि नहीं होती। अपितु सूर्य और चंद्र की ही पूजा की जाती है। लोग अपने परिवार के साथ समय बिताते हैं और प्रसन्न हो कर इस त्यौहार को मानते हैं।

    गजलक्ष्मी पूजा -
    शरद पूर्णिमा को गजलक्ष्मी का जन्मदिवस भी माना जाता है। लोग पाशे आदि के खेल खेलते हैं जैसे चौसर। गजलक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए पूरी रात जागते हैं क्योंकि माना जाता है कि माता लक्ष्मी उल्लू पर सवार होती हैं और उल्लू दिन में सोते हैं और रात को ही जागते हैं। पंडालों को सजाया जाता है और माता लक्ष्मी की पूजा की जाती है।

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