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  • करवा चौथ - रानी वीरवती की कहानी

    रानी वीरवती की कहानी अति प्रचलित है। वीरवती एक सुन्दर और सात भाइयों की इकलौती बहन थीं। अपने पहले करवा चौथ पर वो अपने माता-पिता के घर पर थीं। उन्होंने अपने पति के लिए एक कठोर व्रत रखा। शाम होते होते रानी वीरवती भूख-प्यास से बेहाल हो कर चन्द्रमा के निकलने का बेसब्री से इंतज़ार करने लगीं। उनके भाइयों से ये देखा ना गया तो उन्होंने एक पहाड़ के पीछे आग लगा दी। आग लगने से रौशनी होने लगी। उन्होंने अपनी बहन को कहा की चन्द्रमा निकल आया। वीरवती बोली की कोई और क्यों नहीं अर्क दे रहा चन्द्रमा को तो उनके भाइयों ने उन्हें समझाया कि वे सभी भी अर्क देंगी पहले तुम अपना व्रत तोड़ लो।
    अपने भाइयों की बात को सत्य मान कर वीरवती ने व्रत तोड़ लिया। अगले ही पल उन्हें खबर आयी की उनके पति की मृत्यु हो गयी है। सदमे और दुःख के कारण वो पूरी रात रोती रहीं। उनके रुदन से स्वयं देवी विचलित हो कर उनके पास आयीं और उनसे उनके रोने का कारण पूछा। रानी वीरवती ने अपने पति की मृत्यु के विषय में बताया। तब देवी ने कहा कि उनके भाइयों ने बहन के प्रेम के कारण छल से उनका व्रत तुड़वा दिया था। वीरवती पर माता को दया आयी और उन्होंने उसे पुनः पूरी श्रद्धा से व्रत करने को कहा। रानी वीरवती ने पुनः व्रत पूर्ण किया और यमराज को उनके पति को जीवित करना पड़ा।

    अलग अलग जगह पर कहानी में थोड़े बदलाव कर दिए जाते हैं। जैसे पहाड़ी के पीछे आग लगाई थी इसकी जगह पर यह भी कहा जाता है कि वीरवती के भाइयों ने पीपल के पेड़ के पीछे एक शीशा रख दिया था जिसकी चमक से वीरवती ने चन्द्रमा समझ कर व्रत तोड़ दिया था।

    एक और बदलाव किया जाता है। जब वीरवती को अपने पति की मृत्यु का समाचार मिला तो वे तुरंत ही उनके घर दौड़ पड़ीं। मार्ग में उन्हें शिव-पारवती मिले। पार्वती ने उन्हें उनके भाइयों द्वारा किये गए छल के विषय में बताया और अपनी ऊँगली को काट कर अपने पवित्र लहू की कुछ बूँद वीरवती को दी और अगली बार पूर्ण व्रत करने की सलाह दी। रानी वीरवती ने वो लहू अपने पति के माथे पर लगाया और वे जीवित हो गए।

    ये थी रानी वीरवती की कहानी।

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