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  • 🌞तत्व व्याख्या

    Vishal Vaishnav

    ✅🌞

    जनकसुता जग जननि जानकी।

    अतिसय प्रिय करुनानिधान की॥

    ताकेजुग पद कमल मनावउँ।

    जासु कृपाँ निरमल मति पावउँ॥

    इस श्लोक की शुद्धतात्विक व्याख्या स्वयं ब्रह्मा , विष्णु, महेश भी करने मे असमर्थ है तो मैं मुढ़ किस प्रकार कर सकता हुं?

    परम भक्त और गुरू हनुमान जी कि कृपा से व्याख्या--->

    {१}जनकसुता

    जनकसुता {भक्ति , गुरू ,सिता} के होने से पहले जनक {आत्मज्ञान और विश्वास और कर्म योग }का होना आवश्यक है ।

    {२}जग जननी

    एक माँ {भक्ति , गुरू , सिता }से ज्यादा अच्छा पुत्र {भक्त का , शिष्य का ,आत्मा का} का भला कोई नही कर सकता ।

    {३}करूनानिधि प्रिया

    एक पत्नी{भक्ति , गुरू, सिता} से अच्छी तरह पति {भगवान ,परम ब्रह्म, राम} को कोई भी नही मना सकता ।

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    =====> बिना विश्वास{जनक}  के भक्ति{सिता माँ} नहीं होती, भक्ति के बिना जीव {आत्मा }परम ब्रह्म{श्री राम } और परमशान्ति नही प्राप्त कर सकता ।

    ~~> हृदय स्थली में आत्मज्ञान के साथ साथ परमात्मा को पाने की सच्ची चाहत (भक्ति ) का उदय हो , यही वास्तविक रूप से 'सीता जन्म' है.ऐसी सच्ची चाहत ही निर्मल मन व बुद्धि प्रदान कर सकती है ।

    🏵🌺🌹हरे कृष्णा🙏

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Krishna Kutumb
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