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  • धनतेरस - धन्वंतरि त्रयोदशी

    धनतेरस, आश्विन माघ के कृष्णा पक्ष की त्रयोदशी अर्थात तेरहवे दिन आती है। ये दिवाली का प्रथम दिन होता है। अर्थात इसी दिन से दीपावली का शुभारम्भ माना जाता है। इस दिन धनवंतरि की पूजा की जाती है और इसीलिए धनतेरस का दूसरा नाम धनवंतरि त्रयोदशी भी है। धनवंतरि श्री विष्णु का रूप हैं जो समुद्र मंथन के समय अमृत कलश ले कर प्रकट हुए थे। इन्हे सभी चिकित्सकों का गुरु माना जाता है। आयुर्वेद का जन्म, धनवंतरि से ही हुआ है। 2017 में धनतेरस 17 अक्टूबर को है।

    धनतेरस पर लोग नए बर्तन, सोने-चांदी के गहने आदि खरीदते हैं परन्तु इसका धनतेरस से सीधा कोई सम्बन्ध नहीं माना जाता है। धनवंतरि अच्छी सेहत प्रदान करते हैं। वे धन के देवता नहीं हैं। धनतेरस पूर्णतः नयी वस्तुओं की खरीदी का दिवस है। महिलायें नए वस्त्र, गहने, बर्तन आदि खरीदती हैं।

    इस दिन समुद्र मंथन के दौरान देवी लक्ष्मी क्षीर सागर से निकली थीं। इसलिए देवी लक्ष्मी और धन के देवता, कुबेर, की भी पूजा की जाती है।

    चूँकि ये दिवाली का प्रथम दिन होता है इसलिए लोग अपने कारोबार स्थल को साफ़ करते हैं और सजाते हैं। मुख्य द्वार पर रंगोली आदि बनाई जाती है। दीपक जलाए जाते हैं। पुष्प से घर को सजाया जाता है। आटे से घर के अंदर प्रवेश करते हुए श्री लक्ष्मी के चरण छाप बनाये जाते हैं। दीपकों को पूरी रात्रि जलने दिया जाता है।

    धनतेरस को नयी वस्तुएं खरीदना शुभ माना जाता है ख़ास तौर पर सोने और चांदी की वस्तुएं। इस दिन बाज़ार में सोने की बहुत अधिक बिक्री होती है। रात को लक्ष्मी पूजा की जाती है और दिए जलाये जाते हैं। महाराष्ट्र में देवी लक्ष्मी को नैवेद्य अर्पण किया जाता है अर्थात गुड़ के साथ सूखे धनिये के बीजों को मिलाकर देवी को अर्पण करते हैं। गाँव में किसान अपने पशुओं को प्रेम करते हैं और उनकी पूजा करते हैं क्योंकि वे उनके जीवन का बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

    जय श्री धनवंतरि

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