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  • धनतेरस कहानी - राजा हिम के पुत्र की मृत्यु सर्प से।

    धनतेरस की ये कहानी अत्यंत प्रचलित है। राजा हिम का पुत्र जब 16 वर्ष का हुआ तब उसकी कुंडली से पता चला की उसके विवाह के चौथे दिन उसकी मृत्यु सर्प के काटने से होगी। ये सब जान कर राजा हिम परेशान हो गए। परन्तु नियति की इच्छा मान कर उन्होंने अपने पुत्र का विवाह किया। विवाह के चौथे दिन पूरा राजमहल परेशान था। भय और पीड़ा ने सभी को विचलित किया हुआ था।

    उस रात राजा हिम की पुत्रवधु ने अपने पति को सोने से मना किया। उसने अपने सभी आभूषण, सोना, चांदी, माणिक, मोती आदि का ढेर अपने शयन कक्ष के द्वार पर लगा दिया। अपना पूरा कक्ष दीपों से प्रकाशित कर दिया। पूरी रात वो अपने पति को कहानियाँ और गीत सुनाती रहीं ताकि उन्हें नींद ना आये।

    जैसा की कुंडली ने भविष्यवाणी की थी, यमराज सर्प का रूप रख कर राजा हिम के पुत्र के प्राण हरने आये। परन्तु दीपों के प्रकाश और आभूषणों की चमक से वे चकित हो गए। जिसकी मृत्यु आती है वो अक्सर उसका स्वागत नहीं करता अपितु भय के कारण छुपता फिरता है। परन्तु यहाँ पर यमराज का स्वागत किया गया था। दीपों को जलाकर उनके मार्ग को रोशन किया गया था। यमराज प्रसन्न हो कर सर्प रूप में ही आभूषणों के ढेर पर बैठ कर राजा हिम की पुत्रवधु की कहानियाँ और गीत सुनने लगे। वो उसमे इतने मुग्ध हो गए की उन्हें ज्ञात ही नहीं रहा की वो हिम के पुत्र के प्राण लेने आये हैं। प्रातः काल उन्हें आभास हुआ परन्तु तब तक मृत्यु का समय बीत चुका था। वे यमलोक वापस लौट गए।

    इस प्रकार राजा हिम के राजकुमार के प्राणों की रक्षा उनकी पुत्रवधु ने अपनी सूझबूझ और समझदारी से की।

    धनतेरस के अगले दिन नरकचतुर्दशी होती है। इसे यमदीपदान भी कहते हैं। इस दिन रात्रि को घर की महिलायें यमराज के सम्मान में दीप प्रज्वलित करती हैं और रात भर जलने देती हैं। इसे छोटी दीपावली भी कहा जाता है।

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