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  • कलियुग की महिमा

    शिव दास

    ॐ नम: शिवाय

    कलियुग, इसे चारों युगों में सबसे खराब युग कहा जाता है किंतु आज हम इनके गुणों के बारे में जानेंगे।

    कहा जाता है कि सतयुग में 10 वर्ष, त्रेता में 1 वर्ष, द्वापर में 1 माह तप करने का जो फल होता है वो फल कलियुग में केवल 1 दिन के तप से प्राप्त किया जा सकता है।

    कलियुग में नाम जप मात्र से मुक्ति संभव है अर्थात यदि आप केवल नाम भी जपते हैं तो मुक्त हो सकते हैं इस युग मे परमात्मा के दर्शन कुछ वर्षों के तप से संभव है जबकि सतयुग, त्रेता, द्वापर में दर्शन हेतु बहुत ज्यादा समय लगता था। अभी के मनुष्यों में पहले की भांति भक्तिभाव, दृढ़ता, एकाग्रता नही है इसलिए वह ईश्वर दर्शन असंभव मानता है। जो भक्त हैं दृढ़निश्चयी हैं उनके लिए परमात्मा सहज ही प्राप्त हैं।

    इस युग मे गीता जैसा ज्ञान हमे मिला जो सतयुग,त्रेतायुग में नही था अर्थात इस प्रकार इस ज्ञान को कृष्ण जी द्वारा नही कहा गया था। द्वापर के अंतिम समय मे कृष्ण जी द्वारा यह ज्ञान दिया गया अत: यह द्वापर के आरंभिक और मध्यम समय मे भी मनुष्यों को सहज रूप में प्राप्त न था। यह कलियुग ही है जो आप गीता जैसे अमृतसागर को मोबाइल में मुफ्त ही पढ़ सकते हैं इनको आप मात्र 10 से 15 रुपये में भी खरीद सकते हैं। मैं जब पहली बार गीता खरीदा तब उसका मूल्य मात्र 5 रुपये था।

    इस युग मे सबकुछ सुलभ है आप बहुत ही आसानी से गीता के श्लोकों को रामायण के दोहे चौपाइयों को सुन सकते हैं अर्थात अब आप पढ़ना न चाहें तो सुन भी सकते हैं। घर बैठे बैठे जब चाहें तब सत्संग का लाभ टेलीविजन इत्यादि से उठा सकते हैं।

    यह युग भक्तों के लिए स्वर्णिम युग है इसमें भक्त अपनी भक्ति से बहुत ही कम समय में अपने इष्ट के बहुत ज्यादा समीप आ सकता है जितना समीप आने में उस भक्त को अन्य युगों में न जाने कितने जन्म लग जाते।

    हमें कलियुग के इन लाभों से अवगत होना चाहिए और अपना जीवन अपने आराध्य की सेवा में समर्पित करना चाहिए।

    शिव शिव शिव...

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