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  • 🌞ईश्वरत्व का अनुभव {२} 🙏 हरे कृष्णा

    Vishal Vaishnav

    ---> ईश्वर दृष्टिगोचर व्यक्ति नहीं है। वे सब के परमकारण परमनियन्ता परमपिता परमात्मा परमेश्वर हैं। आम का पेड या गुठली इनमें से क्या पहले हुआ ? तो आप क्या उत्तर देंगे? आम के पेड के होने के लिए गुठली की आवश्यकता है। गुठली के होने के लिए आम के पेड का होना अनिवार्य है। अतः दोनो के होने के लिए अन्य किसी कारण की आवश्यकता है। " वह है ईश्वर! " वे सभी के मूल कारण हैं, स्रष्टा है , सर्वस्व हैं। उन्हें जानने का एकमात्र उपाय है हममें ईश्वरीय गुणों की वृद्धि; अपने अहंकार को ईश्वर में समर्पित करना। तब ईश्वरत्व का अनुभव कर पाएँगे।

    ---> भक्त प्रह्लाद की भाँति समर्पित भक्त को पाना कठिन है। यदि हम कोई कार्य करने के लिए उद्यत होते हैं परन्तु हमें उस कार्य में असफलता मिलती है तो हम किसी न किसी को दोष देकर लौट आते हैं। समस्याओं के उठने पर हम विश्वास खो बैठते हैं, ईश्वर को कोसते हैं। पर प्रह्लाद जी को देखो – *उन्हें पानी में डुबो कर मार डालने का श्रम किया गया; उबलते तेल में डाला गया, ऊँचे पहाड पर से नीचे खाई में धकेल दिया गया; आग में फेंक दिया गया। उन्हें मार डालने के अनेक श्रम किए गए परन्तु इन परिस्थितियों में भी प्रह्लाद जी विचलित नहीं हुए, उनकी भक्ति में अल्प मात्र भी कमी नही आई । वे ‘नारायण, नारायण’ जपते रहे। अन्ततः उन्हें उल्टा-सीधा पाठ पढाने का श्रम किया गया। उनसे कहा गया, “श्रीहरि चोर है, ईश्वर नहीं। ईश्वर का तो अस्तित्व ही नहीं है।” प्रह्लाद इस सब के बीच सदैव भक्ति से मंत्रजप करते रहे।*

    ---> अब हम अपनी ओर एक नजर डालें – किसी के बारे में कुछ सुनते नहीं कि हमारा उनपर से विश्वास उठ जाता है। जीवन में कोई दुःख आता है तो हमारा विश्वास उठ जाता है। हम सभी की भक्ति पार्ट टाईम (अल्प कालिक) भक्ति है। जब कुछ आवश्यकता होती है तो हम भगवान का स्मरण करते हैं अन्यथा उन्हें याद तक नहीं करते। यदि हमारी इच्छा की पूर्ति न हो तो? तब हमारा विश्वास उठ जाता है। यह है हमारी स्थिति।

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    परन्तु सभी प्रतिकूल परिस्थितियों के बीच भी प्रह्लाद अविचलित रहे। प्रत्येक प्रतिसंधि से गुजरते हुए उनका विश्वास दृढ होता गया।

    "संकटों के बढने के अनुसार भगवद् चरणों को और भी कसकर पकड लिजीए " प्रह्लाद में उतना समर्पण था। फलतः वे विश्वभर के लिए प्रकाश प्रसारते दीप बन गए ।

    हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।

    हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।।

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