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  • राम चले गए वनवास,माता कैकेयी को मिला दोष क्या ये सही है ?

    शिव दास

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    श्रीराम जी श्रीहरि जी के ऐसे अवतार हैं जिन्हें कभी कोई भूल नही सकता कलियुग में राम जी की महिमा से सभी अवगत हैं। राम न एक अच्छे पति, एक अच्छे पिता, एक अच्छे पुत्र, एक अच्छे भाई हैं अपितु वे जननायक,प्रजापालक और मर्यादा पुरुषोत्तम भी हैं चाहे विभीषण जी, सुग्रीव जी के प्रति राम की मित्रता का वर्णन हो चाहे दशरथ जी के प्रति राम के पुत्र दायित्व के निर्वाह का वर्णन हो, चाहे राम के पत्नीव्रत धर्म का वर्णन हो, चाहे राम के द्वारा प्रजा का पुत्रवत पालन का दृश्य हो, चाहे राम जी द्वारा एक बड़े भाई के दायित्व का वर्णन ही क्यों न हो राम सदैव और सर्वत्र सर्वश्रेष्ठ हैं।

    राम राम हैं जिनका नाम स्वयं शिव जपतें नहीं थकते, राम उस सुधा का नाम है जिनका पान कर देव,मनुज, स्त्री, पुरुष, किशोर, वृद्ध, युवा यहाँ तक कि पशु पक्षी भी कृतार्थ हो जाते हैं।

    कहा जाता है कि काशी में शरीर छोड़ने वाले पुण्यात्माओं को, भक्तों को महादेव जी राम नाम ही देते हैं जिनसे वे जन्म मरण के चक्र से मुक्त हो जाते हैं।

    राम का चिंतन, राम की लीला, राम का दर्शन, राम का नाम सभी अमृततुल्य हैं जिन्हें इनका पान करना आ गया उनके समान आनंदमयी कोई नही रह जाता।

    उनके चरणों की भक्ति प्राप्त हो जाये वे हमें याद करें हम उनके मित्र न सही , पुत्र न सही, सेवक (भक्त) न सही उनके सेवकों (भक्तों) के सेवक (नौकर) मात्र हो जायें तो हमारा जीवन सफल हो जाय।

    जरा सोचिए जो राम की माता हैं जो राम की तीनों माताओं में सबसे अच्छी हैं जिनके राम सबसे लाडले पुत्र हैं वो माता कैकेयी भला कैसे राम के प्रति कठोर हो सकती हैं क्या सच मे वे गलत हो सकती हैं।

    राम का राज्याभिषेक है सभी हर्षोल्लास में मग्न हैं तभी माता कैकेयी जो कोपभवन में बैठी हैं से मिलने दशरथ जी आते हैं उन्हें मनाने का प्रयत्न करते हैं।

    तब माता कुछ ऐसा कह जाती हैं जिससे सारा राज्य ही एक शमशान में परिवर्तित हो जाता है वहाँ की प्रजा भूत प्रेतों से प्रतीत होने लगते हैं जो एक दूसरे को देख कर ही भयभीत हो जाते हैं।

    माता कैकेयी दशरथ जी को वो समय याद दिलाती हैं जब माता कैकेयी द्वारा दशरथ जी के प्राणों की रक्षा करने पर दशरथ जी उन्हें दो वर मांगने को कहते हैं और माता बाद में मांग लुंगी कहकर टाल देती हैं। दशरथ जी वचन देते हैं कि आप जब भी चाहो अपने दोनों वर मांग सकती हो मैं आपकी इच्छा अवश्य पूरी करूँगा।

    माता उन्हें वचन याद दिलाते हुए कहती हैं कि एक वर में राम को चौदह वर्षों का वनवास मिले और दूसरे में मेरे पुत्र को राज्य।

    दशरथ जी व्याकुल हो उठते हैं वे माता को बार बार समझाते हैं किंतु माता नहीं मानतीं तब दशरथ जी राम को बुलाकर कहते हैं पुत्र तुम समर्थ हो तुम मुझे बलपूर्वक बंदी बना लो और इस राज्य पर राज करो।

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    राम मुस्कुराते हैं और मना कर देते हैं क्योंकि

    रघुकुल रीति सदा चली आयी।

    प्राणजाए पर वचन न जाई।।

    राम अपने पिता का वचन मिथ्या कैसे होने दे सकते हैं वे अपने पिता के वचन का लाज रखने हेतु वन को चले जाते हैं।

    कल तक जो माता दशरथ जी के आंखों का तारा थीं, न सिर्फ रानियों को, भरत, शत्रुघ्न, लक्ष्मण जी को अपितु पूरे राज्य को अत्यंत प्रिय थीं सहसा सबके घृणा का केंद्र बनकर रह जाती हैं।

    क्या माता सच में ऐसी ही थीं।

    राम केवल राज्य करने के लिए नही अपितु साधु संतों की रक्षा और दुष्टों का संहार करने के लिए भी अवतरित हुए हैं।

    इसलिए गीता में कहा गया है -

    परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्‌ । धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥

    अर्थात : साधु पुरुषों का उद्धार करने के लिए, पाप कर्म करने वालों का विनाश करने के लिए और धर्म की अच्छी तरह से स्थापना करने के लिए मैं युग-युग में प्रकट हुआ करता हूँ॥

    वही होता है जो नियति हो या कहें राम की इच्छा के बिना एक पत्ता भी नही हिलता।

    जब राम अपनी लीला करते हैं सभी उनके मायापाश में बंध जाते हैं फिर चाहे घटना माँ सती द्वारा राम की भगवत्ता पर शंशय करना हो, चाहे माता सीता द्वारा एक बनावटी स्वर्ण मृग पर मोहित होना हो, चाहे नारद जी द्वारा श्रीहरि जी को शाप देना हो, चाहे कामदेव द्वारा अपने ही पिता ब्रम्हा पर कामबाण से प्रहार करना हो, या फिर ब्रम्हा जी द्वारा अपनी ही पुत्री पर कामी होना ही क्यों न हो हरि इच्छा सदैव और सर्वत्र बलवान है।

    इसमे कैकेयी माता को दोष देना सर्वथा अनुचित है।

    जय श्रीराम, जय जय श्रीराम

    शिव शिव शिव

    ॐ नम: शिवाय

    ॐ तत्सत।

    इस वीडियो में देखिए राम वनवास के कारण

    शिव शिव शिव....

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