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  • जी हरे कृष्णा 🙏 साधक~१

    Vishal Vaishnav

    हमे देखना चाहिए कि हमारा सम्बन्ध हमारी ओर से किसके साथ है? परमात्मा के साथ है या जगत् के साथ है; अच्छाई के साथ हैं या बुराई के साथ? हमको क्या पसंद आता है? अगर हमको परमात्मा का सम्बन्ध अच्छा लगताहै,तो संसार का सम्बन्ध अपने आप ही टूट जायेगा। अगर संसार का सम्बन्ध हमने तोड़ दिया है, तो परमात्मा से सम्बन्ध अपने आप हो जायेगा। तो आपके और परमात्मा के बीच संसार पर्दा नहीं है, उससे सम्बन्ध पर्दा है।

    मांग तीन प्रकार से हो सकती है, कामना को लेकर, लालसा को लेकर और जिज्ञासा को लेकर। भोग की कामना, सत्य की जिज्ञासा, और ब्रह्म की लालसा।

    जिज्ञासा कहते हैं, जानने की इच्छा। लालसा कहते हैं, पाने की इच्छा। और कामना कहते हैं, भोग की इच्छा। तो यह भोग की कामना, सत्य की जिज्ञासा और परमात्मा की लालसा- ये तीनों लक्षण जिसमें रहते हैं उसे हम मैं कहते हैं। इन तीनों में जो कामना है, वह तो भूल से उत्पन्न होती है। और जिज्ञासा एवं लालसा स्वभाव से उत्पन्न है। जो भूल से उत्पन्न होती है उसकी तो निवृत्ति हो जाती है और जो स्वभाव से उत्पन्न होती है, उसकी पूर्ति हो जाती है एवं लालसा की प्राप्ति हो जाती है। इसीलिए कामना की निवृत्ति, जिज्ञासा की पूर्ति और परमात्मा की प्राप्ति मनुष्य को ही हो सकती है।

    प्रेम करने का तरीका आज तक संसार में कोई बतला नहीं सका, और निकला भी नहीं है। तरीके से प्रेम नहीं हुआ करता, क्योंकि प्रेम का तरीका होता, तो जो काम तरीके से हो सकता है यह मशीन से भी हो सकता है। तब तो आज के वैज्ञानिक युग में प्रेम प्राप्त करने की मशीनें भी बन जाती। तो प्रेम करने का कोई तरीका नहीं है, पर प्रेम करना सब को आता है। जीवन में एक अनुभव की बात यह है कि हम जिसको अपना लेते हैं वह प्यारा लगता है और हम उसे अपना सब कुछ देने को तैयार हो जाते हैं। परमात्मा अपना है, उसे अपना बना लें, तो वह प्यारा लगता है। जब परमात्मा प्यारा लगता है, तो उस पर सर्वस्व अर्पण कर देते हैं। ईश्वर को हम अपना दिल दे बैठें, तो फिर हमारे पास अपना क्या रह जायेगा? मनुष्य के पास जब उसका दिल न रहे, तो वह भक्त हो जाये, मुक्त हो जाए और शांति पा जाए।

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    बातें करने को तो बहुत बातें हो सकती हैं। परन्तु आप बातें करने के साथ सोचो भी, विचारों भी और जीवन में अनुभव भी करो। आप सुनना और सीखना बंद करें और जानना और मानना प्रारम्भ करें, तो काम बन जाएगा।जाननेके स्थान पर- मेरा कुछ नहीं है इसके सिवाय और कुछ नहीं जानना है। और मानने के स्थान पर सिवाय परमात्मा के और कोई मानने में आता नहीं है।

    जब तक तुम बुरे नहीं होते, बुराई नहीं पैदा होती। मन में कोई विकृति नहीं है। ईश्वर में, मन में कोई खराबी होती ही नहीं। अपनी खराबी ठीक करो, मन ठीक हो जायेगा। तुम किसी को बुरा मत समझो, मन में बुरी बात कभी नहीं आएगी। तुम किसी का बुरा मत चाहो, मन में बुरी बात कभी नहीं आएगी। तुम किसी के साथ बुराई मत करो, मन में बुरी बात कभी नहीं आएगी। हमारी भूल हमें मन में दिखती है। भूल हम करते हैं और नाम मन का रख देते हैं। बुराई करने वाला खुद दुःखी होता है और दूसरों को भी दुःखी करता है।

    अपने को बुरा मानोगे, तो बुराई करोगे। अपने को भला मानोगे, तो भलाई करोगे। और भला-बुरा कुछ नहीं मानोगे, तो परमात्मा में रहोगे।

    अच्छाई और बुराई जब दोनों होती हैं, तब तो बनता है अहम् परिच्छिन्नता बनती है और जब बुराई बिल्कुल नहीं रही, अच्छा ही अच्छा रह जाता है, तो अहम् का नाश हो जाता है। द्वन्द्व में अहम् बनता है, द्वन्द्वातीत में अहम् नहीं बनता। मनुष्य सर्वांश में बुरा नहीं हो सकता, पर सर्वांश में भला हो सकता है।

    गुरु वाणी से जो सुना, उसे मान लिया; वह निदिध्यासन हो गया।

    जिसके करने की सामर्थ्य प्राप्त हो, जिसमें किसी का अहित न हो, जिसके बिना करे नहीं रह सकते हो और जिसका सम्बन्ध वर्तमान से हो-ऐसा काम ही जरूरी होता है।

    किसी चीज की प्राप्ति के पहले उसकी आवश्यकता अनुभव होती है। अगर आप समाधि की आवश्यकता अनुभव करेंगे, तो भोग की वृत्ति नाश हो जायेगी, समाधि प्राप्त हो जायेगी। योग में भोग की रुचि ही बाधक है। आप योग की आवश्यकता अनुभव करें, योग मिल जाएगा।

    ध्यान लगाने की बात, समाधि लगाने की बात तो आप करते हैं, पर ध्यान किसका होगा? जिसकी आवश्यकता आप अनुभव करोगे। जिसकी स्मृति जगेगी, उसका ध्यान होगा। स्मृति उसकी जगेगी जिसको आप अपना मानोगे। तो एकदम ध्यान कैसे कर लोगे? पहले तो यह देखो कि जिसका आप ध्यान करना चाहते हैं, वह आपका अपना है या नहीं, वह अभी है या नहीं?

    ध्यान किसका करना है? ध्यान किसी का नहीं करना है। किसी का ध्यान नहीं करोगे, तो परमात्मा का ध्यान हो जाएगा। और किसी का ध्यान करोगे, तो वह फिर किसी और का ही ध्यान-मात्र रह जाएगा।

    आप लोग जीवन से बिल्कुल अलग हो करके सोचते हो। अपनी वर्तमान दशा का ठीक अनुभव करो। आपकी वर्तमान दशा क्या है? आपकी मांग क्या है? आपकी जिम्मेदारी क्या है? इत्यादि बातों पर विचार करने पर ही साधना होती है।

    संसार कभी आपसे नहीं कहता कि मुझे पसन्द करो, तुम्हीं पसन्द करते हो। संसार की किसी वस्तु ने कभी कहा है कि मैं तुम्हारी हूँ? तुम्हारे मकान ने कहा हो, तुम्हारी जेब के पैसों ने कहा हो, तुम्हारे हाथ ने कहा हो, तुम्हारी इन्द्रियों ने कहा हो। तुम्हारे शरीर से लेकर संसार की जितनी भी चीजें हैं, उनमें से किसने कहा है कि मैं तुम्हारी हूँ? तुम बिना वजह अपना-अपना गीत गाते हो। कहते हो मेरा मन मेरा हाथ आदि।

    जानी हुई बुराई करो मत और जो बुराई कर चुके हो, उसे दोहराओ मत। तो आगे बढ़ जाओगे।

    आदमी अपनी जगह पर ठीक बना रहे। तुम जो जानते हो, सो मानते रहो, सो करते रहो। तो तुम्हारी सारी जरूरतें अपने आप पूरी होंगी। आपको जो करना चाहिये, आप जो कर सकते हैं, उसको कीजिए। बस, फिर सारी बातें अपने-आप पूरी हो जायेंगी।

    जो व्यक्ति कुछ भी जानना चाहता है, उसने गुरु मान लिया और जो व्यक्ति कुछ भी करना चाहता है, उसने धर्म मान लिया और जिसे अपने से कोई भी बड़ा दिखता है, उसने ईश्वर मान लिया। जीवन में ये तीन ऐसे सत्य हैं कि हर आदमी किसी-न-किसी रूप में इन्हें मान ही लेता है।

    जगत् की उदारता, प्रभु की कृपालुता और सत्पुरुषों का सद्भावना- ये प्रत्येक साधक के साथ सदैव रहती है।

    यह जीवन का सत्य है कि आप अपने विरोधी मत बनिये, तो कोई आपका विरोधी नहीं होगा। आप अपनी जगह पर ठीक बने रहें, तो गुरु भी हमारे साथ, प्रभु भी हमारे साथ और संसार भी हमारे साथ। कोई आपका विरोधी नहीं है, सब आपके अनुकूल है। आप अपने विरोधी मत बनिए।

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