Loading...

  • 【अध्याय 1 अर्जुनविषादयोग 36】

    Ratnesh Kumar Sahu

    🐁🐁🐁🕯ॐ श्रीगणेशाय नम:🕯🐁🐁🐁

    __________________________________________

    सम्बन्ध -

    पूर्वश्लोकमें अर्जुनने स्वजनोंको न मारनेमें दो हेतु बताये। अब परिणामकी दृष्टिसे भी स्वजनोंको न मारना सिद्ध करते हैं ।

    __________________________________________

    श्लोक -

    निहत्य धार्तराष्ट्रान्न: का प्रीति: स्याज्जनार्दन।

    पापमेवाश्रयेदस्मान् हत्वैतानाततायिन:॥ 36॥

    __________________________________________

    श्लोकार्थ -

    हे जनार्दन! (इन) धृतराष्ट्र-सम्बन्धियोंको मारकर हमलोगोंको क्या प्रसन्नता होगी? इन आततायियोंको मारनेसे तो हमें पाप ही लगेगा।

    _________________________________________

    शब्दार्थ -

    जनार्दन=हे जनार्दन! (इन)

    धार्तराष्ट्रान्=धृतराष्ट्र-सम्बन्धियों को

    निहत्य=मारकर

    न:=हम लोगों को

    का=क्या

    प्रीति:=प्रसन्नता

    स्यात्=होगी?

    एतान्=इन

    आततायिन:=आततायियों को

    हत्वा=मारने से तो

    अस्मान्=हमें

    पापम्=पाप

    एव=ही

    आश्रयेत्=लगेगा।

    __________________________________________

    भावार्थ -

    'निहत्य धार्तराष्ट्रान्न: ............... हत्वैता-नाततायिन:’—धृतराष्ट्रके पुत्र और उनके सहयोगी दूसरे जितने भी सैनिक हैं, उनको मारकर विजय प्राप्त करनेसे हमें क्या प्रसन्नता होगी? अगर हम क्रोध अथवा लोभके वेगमें आकर इनको मार भी दें, तो उनका वेग शान्त होनेपर हमें रोना ही पड़ेगा अर्थात् क्रोध और लोभमें आकर हम क्या अनर्थ कर बैठे—ऐसा पश्चात्ताप ही करना पड़ेगा। कुटुम्बियोंकी याद आनेपर उनका अभाव बार-बार खटकेगा। चित्तमें उनकी मृत्युका शोक सताता रहेगा। ऐसी स्थितिमें हमें कभी प्रसन्नता हो सकती है क्या? तात्पर्य है कि इनको मारनेसे हम इस लोकमें जबतक जीते रहेंगे, तबतक हमारे चित्तमें कभी प्रसन्नता नहीं होगी और इनको मारनेसे हमें जो पाप लगेगा, वह परलोकमें हमें भयंकर दु:ख देनेवाला होगा।

    आततायी छ: प्रकारके होते हैं—आग लगानेवाला, विष देनेवाला, हाथमें शस्त्र लेकर मारनेको तैयार हुआ, धनको हरनेवाला, जमीन (राज्य) छीननेवाला और स्त्रीका हरण करनेवाला★1। दुर्योधन आदिमें ये छहों ही लक्षण घटते थे। उन्होंने पाण्डवोंको लाक्षागृह में आग लगाकर मारना चाहा था। भीमसेनको जहर खिलाकर जलमें फेंक दिया था। हाथमें शस्त्र लेकर वे पाण्डवोंको मारनेके लिये तैयार थे

    ही। द्यूतक्रीड़ा[जुए] में छल-कपट करके उन्होंने पाण्डवोंका धन और राज्य हर लिया था। द्रौपदी जी को भरी सभामें लाकर दुर्योधनने 'मैंने तेरेको जीत लिया है, तू मेरी दासी हो गयी है’ आदि शब्दोंसे बड़ा अपमान किया था और दुर्योधनादि की प्रेरणासे जयद्रथ द्रौपदी जी को हरकर ले गया था।

    शास्त्रोंके वचनोंके अनुसार आततायीको मारनेसे मारनेवालेको कुछ भी दोष (पाप) नहीं लगता—'नाततायिवधे दोषो हन्तुर्भवतिकश्चन’ (मनुस्मृति ८। ३५१)। परन्तु आततायीको मारना उचित होते हुए भी मारनेकी क्रिया अच्छी नहीं है। शास्त्र भी कहता है कि मनुष्यको कभी किसीकी हिंसा नहीं करनी चाहिये—'न हिंस्यात्सर्वा भूतानि’; हिंसा न करना परमधर्म है—'अहिंसा परमोधर्म:★2।’ अत: क्रोध-लोभके वशीभूत होकर कुटुम्बियोंकी हिंसा का कार्य हम क्यों करें?

    आततायी होनेसे ये दुर्योधन आदि मारनेके लायक हैं ही; परन्तु अपने कुटुम्बी होनेसे इनको मारनेसे हमें पाप ही लगेगा; क्योंकि शास्त्रोंमें कहा गया है कि जो अपने कुलका नाश करता है, वह अत्यन्त पापी होता है—'स एव पापिष्ठतमो य: कुर्यात्कुलनाशनम्।’ अत: जो आततायी अपने खास कुटुम्बी हैं, उन्हें कैसे मारा जाय? उनसे अपना सम्बन्ध-विच्छेद कर लेना, उनसे अलग हो जाना तो ठीक है, पर उन्हें मारना ठीक नहीं है। जैसे, अपना बेटा ही आततायी हो जाय तो उससे अपना सम्बन्ध हटाया जा सकता है, पर उसे मारा थोड़े ही जा सकता है!

    __________________________________________

    ★1

    अग्निदो गरदश्चैव शस्त्रपाणिर्धनापह:।

    क्षेत्रदारापहर्ता च षडेते ह्याततायिन:।।

    (वशिष्ठस्मृति 3/19)

    अर्थात् ' आग लगाने वाला, विष देने वाला, हाथ में शस्त्र लेकर मारने को तैयार हुआ, धन का हरण करने वाला, जमीन छीनने वाला और स्त्री का हरण करने वाला - ये छहों ही आततायी हैं।'

    ★2

    आततायी को मार दे - यह अर्थशास्त्र है और किसी की भी हिंसा न करे - यह धर्मशास्त्र है। जिसमें अपना कोई स्वार्थ (मतलब) रहता है, वह 'अर्थशास्त्र' कहलाता है; और जिसमें अपना कोई स्वार्थ नही रहता, वह 'धर्मशास्त्र' कहलाता है। अर्थशास्त्र की अपेक्षा धर्मशास्त्र बलवान् होता है। अत: शास्त्रों में जहाँ अर्थशास्त्र और धर्मशास्त्र - दोनों में विरोध आये, वहाँ अर्थशास्त्र का त्याग करके धर्मशास्त्र को ही ग्रहण करना चाहिये-

    स्मृत्योर्विरोधे न्यायस्तु बलवान्व्यवहारत:। अर्थशास्त्रात्तु बलवद्धर्मशास्त्रमिति स्थिति: ।। (याज्ञवल्क्यस्मृति २/२१)

    __________________________________________

    स्मरणीय तथ्य -

    1⃣ यह लेख स्वामी रामसुखदास जी द्वारा रचित साधक संजीवनी से लिया गया है।

    2⃣ कहीं कुछ समझ न आने पर आप कमेंट बॉक्स में मुझसे प्रश्न कर सकते हैं यदि मैं उत्तर देने में सक्षम रहा तो अवश्य आपका शंकासमाधान करूँगा।

    शिव शिव शिव ...

    Download Image
    |0|0
Krishna Kutumb
ब्लॉग सूची 0 0 प्रवेश