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  • 【अध्याय 1 अर्जुनविषादयोग 37】

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    🐁🐁🐁🕯ॐ श्रीगणेशाय नम:🕯🐁🐁🐁
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    सम्बन्ध -
    पूर्वश्लोकमें युद्धका दुष्परिणाम बताकर अब अर्जुन युद्ध करनेका सर्वथा अनौचित्य बताते हैं।
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    श्लोक -
    तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान्।
    स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिन: स्याम माधव॥ 37॥
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    श्लोकार्थ -
    इसलिये अपने बान्धव (इन) धृतराष्ट्र-सम्बन्धियों को मारने के लिये हम योग्य नहीं हैं; क्योंकि हे माधव! अपने कुटुम्बियों को मारकर (हम) कैसे सुखी होंगे?
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    शब्दार्थ -
    तस्मात् =इसलिये
    स्वबान्धवान्=अपने बान्धव (इन)
    धार्तराष्ट्रान्=धृतराष्ट्र-सम्बन्धियों को
    हन्तुम्=मारने के लिये
    वयम्=हम
    न, अर्हा:=योग्य नहीं हैं;
    हि=क्योंकि
    माधव=हे माधव!
    स्वजनम्=अपने कुटुम्बियों को
    हत्वा=मारकर (हम)
    कथम्=कैसे
    सुखिन:=सुखी
    स्याम=होंगे?
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    भावार्थ -
    'तस्मान्नार्ह वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान्’ - अभीतक (पहले अध्यायके अट्ठाईसवें श्लोकसे लेकर यहाँतक) मैंने कुटुम्बियोंको न मारनेमें जितनी युक्तियाँ, दलीलें दी हैं, जितने विचार प्रकट किये हैं, उनके रहते हुए हम ऐसे अनर्थकारी कार्यमें कैसे प्रवृत्त हो सकते हैं? अपने बान्धव इन धृतराष्ट्र-सम्बन्धियोंको मारनेका कार्य हमारे लिये सर्वथा ही अयोग्य है, अनुचित है। हम-जैसे अच्छे पुरुष ऐसा अनुचित कार्य कर ही कैसे सकते हैं ?

    'स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिन: स्याम माधव’—हे माधव! इन कुटुम्बियोंके मरनेकी आशंकासे ही बड़ा दु:ख हो रहा है, संताप हो रहा है, तो फिर क्रोध तथा लोभके वशीभूत होकर हम उनको मार दें तो कितना दु:ख होगा! उनको मारकर हम कैसे सुखी होंगे?

    यहाँ 'ये हमारे घनिष्ठ सम्बन्धी हैं’—इस ममताजनित मोहके कारण अपने क्षत्रियोचित कर्तव्यकी तरफ अर्जुनकी दृष्टि ही नहीं जा रही है। कारण कि जहाँ मोह होता है, वहाँ मनुष्यका विवेक दब जाता है। विवेक दबनेसे मोहकी प्रबलता हो जाती है। मोहके प्रबल होनेसे अपने कर्तव्यका स्पष्ट भान नहीं होता।
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    ⭐ गीता का श्लोक सहित अध्ययन कीजिये क्योंकि -

    अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयो:।
    ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्ट: स्यामिति मे मति:॥ 18/70॥

    जो मनुष्य हम दोनों के इस धर्ममय संवाद का अध्ययन करेगा, उसके द्वारा भी मैं ज्ञानयज्ञ से पूजित होऊँगा — ऐसा मेरा मत है।

    ⭐ गीता को शेयर कीजिये क्योंकि -

    य इदं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति।
    भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशय:॥ 18/68॥

    मुझमें पराभक्ति करके जो इस परम गोपनीय संवाद गीता को मेरे भक्तों में कहेगा, वह मुझे ही प्राप्त होगा- इसमें कोई सन्देह नहीं है।
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    स्मरणीय तथ्य -
    1⃣ यह लेख स्वामी रामसुखदास जी द्वारा रचित साधक संजीवनी से लिया गया है।

    2⃣ कहीं कुछ समझ न आने पर आप कमेंट बॉक्स में मुझसे प्रश्न कर सकते हैं यदि मैं उत्तर देने में सक्षम रहा तो अवश्य आपका शंकासमाधान करूँगा।
    शिव शिव शिव ...
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    इसे पढ़िए व शेयर कीजिये कृष्ण प्रसन्न होंगे।
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