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  • 【अध्याय 1 अर्जुनविषादयोग 38,39】

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    🐁🐁🐁🕯ॐ श्रीगणेशाय नम:🕯🐁🐁🐁
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    सम्बन्ध -
    अब यहाँ यह शंका होती है कि जैसे तुम्हारे लिये दुर्योधन आदि स्वजन हैं, ऐसे ही दुर्योधन आदि के लिये भी तो तुम स्वजन [अपने लोग,अपना परिवार] हो। स्वजन की दृष्टि से तुम तो युद्ध से निवृत्त होने की बात सोच रहे हो, पर दुर्योधन आदि युद्ध से निवृत्त होने की बात ही नहीं सोच रहे हैं—इसका क्या कारण है? इसका उत्तर अर्जुन आगे के दो श्लोकों में देते हैं।
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    श्लोक -
    यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतस:।
    कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम्॥ 38॥

    कथं न ज्ञेयमस्माभि: पापादस्मान्निवर्तितुम्।
    कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन॥39॥
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    श्लोकार्थ -
    यद्यपि लोभ के कारण जिनका विवेक-विचार लुप्त हो गया है[चला गया है], ऐसे ये (दुर्योधन आदि) कुल का नाश करने से होने वाले दोष को और मित्रों के साथ द्वेष करने से होने वाले पाप को नहीं देखते, (तो भी) हे जनार्दन! कुल का नाश करने से होने वाले दोष को ठीक-ठीक जानने वाले हम लोग इस पाप से निवृत्त होने का विचार क्यों न करें?
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    शब्दार्थ -
    यद्यपि=यद्यपि [भले ही]
    लोभोपहतचेतस:=लोभ के कारण जिनका विवेक-विचार लुप्त हो गया है, ऐसे
    एते=ये (दुर्योधन आदि)
    कुलक्षयकृतम्=कुल का नाश करने से होने वाले
    दोषम्=दोष को
    च=और
    मित्रद्रोहे=मित्रों के साथ द्वेष करने से होने वाले
    पातकम्=पाप को
    न=नहीं
    पश्यन्ति=देखते, (तो भी)
    जनार्दन=हे जनार्दन!
    कुलक्षयकृतम्=कुल का नाश करने से होने वाले
    दोषम्=दोष को
    प्रपश्यद्भि:=ठीक-ठीक जानने वाले
    अस्माभि:=हम लोग
    अस्मात्=इस
    पापात्=पाप से
    निवर्तितुम्=निवृत्त होने का
    ज्ञेयम्=विचार
    कथम्=क्यों
    न=न करें?
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    भावार्थ -
    'यद्यप्येते न पश्यन्ति ..... मित्रद्रोहे च पातकम्’—इतना मिल गया, इतना और मिल जाय; फिर ऐसा मिलता ही रहे—ऐसे धन, जमीन, मकान, आदर, प्रशंसा, पद, अधिकार आदि की तरफ बढ़ती हुई वृत्ति का नाम 'लोभ’ है। इस लोभ-वृत्ति के कारण इन दुर्योधनादि की विवेक-शक्ति लुप्त हो गयी है, जिससे वे यह विचार नहीं कर पा रहे हैं कि जिस राज्य के लिये हम इतना बड़ा पाप करने जा रहे हैं, कुटुम्बियों [परिवार]का नाश करने जा रहे हैं, वह राज्य हमारे साथ कितने दिन रहेगा और हम उसके साथ कितने दिन रहेंगे ? हमारे रहते हुए यह राज्य चला जायगा तो हमारी क्या दशा होगी और राज्य के रहते हुए हमारे शरीर चले जायँगे तो क्या दशा होगी ? क्योंकि मनुष्य संयोग का जितना सुख लेता है, उसके वियोग का उतना दु:ख उसे भोगना ही पड़ता है। संयोग में इतना सुख नहीं होता, जितना वियोग में दु:ख होता है। तात्पर्य है कि अन्त: करण में लोभ छा जाने के कारण इनको राज्य-ही-राज्य दीख रहा है। कुल का नाश करने से कितना भयंकर पाप होगा, वह इनको दीख ही नहीं रहा है।

    जहाँ लड़ाई होती है, वहाँ समय, सम्पत्ति, शक्ति का नाश हो जाता है। तरह-तरह की चिन्ताएँ और आपत्तियाँ आ जाती हैं। दो मित्रों में भी आपस में खटपट मच जाती है, मनोमालिन्य हो जाता है। कई तरह का मतभेद हो जाता है। मतभेद होने से वैरभाव हो जाता है। जैसे द्रुपद और द्रोण—दोनों बचपन के मित्र थे। परन्तु राज्य मिलने से द्रुपद ने एक दिन द्रोण का अपमान करके उस मित्रता को ठुकरा दिया। इससे राजा द्रुपद और द्रोणाचार्य के बीच वैरभाव[शत्रुता] हो गया। अपने अपमान का बदला लेने के लिये द्रोणाचार्य ने मेरे द्वारा राजा द्रुपद को परास्त कराकर उसका आधा राज्य ले लिया। इस पर द्रुपद ने द्रोणाचार्य का नाश करने के लिये एक यज्ञ कराया, जिससे धृष्टद्युम्न और द्रौपदी जी —दोनों पैदा हुए। इस तरह मित्रों के साथ वैरभाव होने से कितना भयंकर पाप होगा, इस तरफ ये देख ही नहीं रहे हैं!

    विशेष बात -
    अभी हमारे पास जिन वस्तुओं का अभाव है, उन वस्तुओं के बिना भी हमारा काम चल रहा है, हम अच्छी तरह से जी रहे हैं। परन्तु जब वे वस्तुएँ हमें मिलने के बाद फिर बिछुड़ जाती हैं, तब उनके अभाव का बड़ा दु:ख होता है। तात्पर्य है कि पहले वस्तुओं का जो निरन्तर अभाव था, वह इतना दु:खदायी नहीं था, जितना वस्तुओं का संयोग होकर फिर उनसे वियोग होना दु:खदायी है। ऐसा होने पर भी मनुष्य अपने पास जिन वस्तुओं का अभाव मानता है, उन वस्तुओं को वह लोभ के कारण पाने की चेष्टा करता रहता है। विचार किया जाय तो जिन वस्तुओं का अभी अभाव है, बीच में प्रारब्धानुसार उनकी प्राप्ति होने पर भी अन्त में उनका अभाव ही रहेगा। अत: हमारी तो वही अवस्था रही, जो कि वस्तुओं के मिलने से पहले थी। बीच में लोभ के कारण उन वस्तुओं को पाने के लिये केवल परिश्रम-ही-परिश्रम पल्ले पड़ा, दु:ख-ही-दु:ख भोगना पड़ा। बीच में वस्तुओं के संयोग से जो थोड़ा-सा सुख हुआ है, वह तो केवल लोभ के कारण ही हुआ है। अगर भीतर में लोभ-रूपी दोष न हो, तो वस्तुओं के संयोग[मिलने] से सुख हो ही नहीं सकता। ऐसे ही मोहरूपी दोष न हो, तो कुटुम्बियों से सुख हो ही नहीं सकता। लालचरूपी दोष न हो, तो संग्रह [पैसे बैंक आदि में जमा करके रखने पर अमीर होने]का सुख हो ही नहीं सकता। तात्पर्य है कि संसार का सुख किसी-न-किसी दोष से ही होता है। कोई भी दोष न होने पर संसार से सुख हो ही नहीं सकता। परन्तु लोभ के कारण मनुष्य ऐसा विचार कर ही नहीं सकता। यह लोभ उसके विवेक-विचार को लुप्त कर देता है।

    'कथं न ज्ञेयमस्माभि:....प्रपश्यद्भिर्जनार्दन’—अब अर्जुन अपनी बात कहते हैं कि यद्यपि दुर्योधनादि अपने कुलक्षय[कुल का नाश]से होने वाले दोष को और मित्रद्रोह से होने वाले पाप को नहीं देखते, तो भी हम लोगों को कुलक्षय से होने वाली अनर्थ-परम्परा को देखना ही चाहिये [जिसका वर्णन अर्जुन आगे चालीसवें श्लोक से चौवालीसवें श्लोक तक करेंगे]; क्योंकि हम कुलक्षय से होने वाले दोषों को भी अच्छी तरह से जानते हैं और मित्रों के साथ द्रोह-(वैर, द्वेष-) से होने वाले पाप को भी अच्छी तरह से जानते हैं। अगर वे मित्र हमें दु:ख दें, तो वह दु:ख हमारे लिये अनिष्ट कारक नहीं है। कारण कि दु:ख से तो हमारे पूर्वपापों का ही नाश होगा, हमारी शुद्धि ही होगी। परन्तु हमारे मन में अगर द्रोह—वैरभाव होगा, तो वह मरने के बाद भी हमारे साथ रहेगा और जन्म-जन्मान्तर तक हमें पाप करने में प्रेरित करता रहेगा, जिससे हमारा पतन-ही-पतन [नाश ही नाश]होगा। ऐसे अनर्थ करने वाले और मित्रों के साथ द्रोह पैदा करने वाले इस युद्धरूपी पाप से बचने का विचार क्यों नहीं करना चाहिये? अर्थात् विचार करके हमें इस पाप से जरूर ही बचना चाहिये।

    यहाँ अर्जुन की दृष्टि दुर्योधन आदि के लोभ की तरफ तो जा रही है, पर वे खुद कौटुम्बिक स्नेह-(मोह-) में आबद्ध हो[फंस]कर बोल रहे हैं— इस तरफ उनकी दृष्टि नहीं जा रही है। इस कारण वे अपने कर्तव्य को नहीं समझ रहे हैं। यह नियम है कि मनुष्य की दृष्टि जब तक दूसरों के दोष की तरफ रहती है, तब तक उसको अपना दोष नहीं दीखता, उलटे एक अभिमान होता है कि इनमें तो यह दोष है, पर हमारे में यह दोष नहीं है। ऐसी अवस्था में वह यह सोच ही नहीं सकता कि अगर इनमें कोई दोष है तो हमारे में भी कोई दूसरा दोष हो सकता है। दूसरा दोष यदि न भी हो, तो भी दूसरों का दोष देखना—यह दोष तो है ही। दूसरों का दोष देखना एवं अपने में अच्छाई का अभिमान करना—ये दोनों दोष साथ में ही रहते हैं। अर्जुन को भी दुर्योधन आदि में दोष दीख रहे हैं और अपने में अच्छाई का अभिमान हो रहा है (अच्छाई के अभिमान की छाया में मात्र दोष रहते हैं), इसलिये उनको अपने में मोहरूपी दोष नहीं दीख रहा है।
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    ⭐ गीता का श्लोक सहित अध्ययन कीजिये क्योंकि -

    अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयो:।
    ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्ट: स्यामिति मे मति:॥ 18/70॥

    जो मनुष्य हम दोनों के इस धर्ममय संवाद का अध्ययन करेगा, उसके द्वारा भी मैं ज्ञानयज्ञ से पूजित होऊँगा — ऐसा मेरा मत है।

    ⭐ गीता को शेयर कीजिये क्योंकि -

    य इदं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति।
    भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशय:॥ 18/68॥

    मुझमें पराभक्ति करके जो इस परम गोपनीय संवाद गीता को मेरे भक्तों में कहेगा, वह मुझे ही प्राप्त होगा- इसमें कोई सन्देह नहीं है।
    _________________🙏🙏🙏_________________

    स्मरणीय तथ्य -
    1⃣ यह लेख स्वामी रामसुखदास जी द्वारा रचित साधक संजीवनी से लिया गया है।

    2⃣ कहीं कुछ समझ न आने पर आप कमेंट बॉक्स में मुझसे प्रश्न कर सकते हैं यदि मैं उत्तर देने में सक्षम रहा तो अवश्य आपका शंकासमाधान करूँगा।
    शिव शिव शिव ...
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    इसे पढ़िए व शेयर कीजिये कृष्ण प्रसन्न होंगे।
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