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  • 【अध्याय 1 अर्जुनविषादयोग 40】

    Ratnesh Kumar Sahu

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    🐁🐁🐁🕯ॐ श्रीगणेशाय नम:🕯🐁🐁🐁

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    सम्बन्ध -

    कुल का क्षय करने से होने वाले जिन दोषों को हम जानते हैं, वे दोष कौन-से हैं? उन दोषों की परम्परा आगे के पाँच श्लोकों में बताते हैं।

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    श्लोक -

    कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्मा: सनातना:।

    धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत॥ 40॥

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    श्लोकार्थ -

    कुल का क्षय होने पर  सदा से चलते आये कुल धर्म नष्ट हो जाते हैं और  धर्म का नाश होने पर (बचे हुए) सम्पूर्ण कुल को अधर्म दबा लेता है।

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    शब्दार्थ -

    कुलक्षये=कुल का क्षय होने पर

    सनातना:=सदा से चलते आये

    कुलधर्मा:=कुलधर्म

    प्रणश्यन्ति=नष्ट हो जाते हैं

    उत=और

    धर्मे=धर्म का

    नष्टे=नाश होने पर (बचे हुए)

    कृत्स्नम्=सम्पूर्ण

    कुलम्=कुल को

    अधर्म:=अधर्म

    अभिभवति=दबा लेता है।

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    भावार्थ -

    'कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्मा:  सनातना:’—जब युद्ध होता है, तब उसमें कुल-(वंश-) का क्षय (ह्रास) होता है। जबसे कुल आरम्भ हुआ है, तभी से कुल के धर्म अर्थात् कुल की पवित्र परम्पराएँ, पवित्र रीतियाँ, मर्यादाएँ भी परम्परा से चलती आयी हैं। परन्तु जब कुल का क्षय हो जाता है, तब सदा से कुल के साथ रहने वाले धर्म भी नष्ट हो जाते हैं अर्थात् जन्म के समय, द्विजाति- संस्कार के समय, विवाह के समय, मृत्यु के समय और मृत्यु के बाद किये जाने वाले जो-जो शास्त्रीय पवित्र रीति-रिवाज हैं, जो कि जीवित और मृतात्मा मनुष्यों के लिये इस लोक में और परलोक में कल्याण करनेवाले हैं, वे नष्ट हो जाते हैं। कारण कि जब कुल का ही नाश हो जाता है, तब कुल के आश्रित रहने वाले धर्म किसके आश्रित रहेंगे?

     'धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत’—जब कुल की पवित्र मर्यादाएँ, पवित्र आचरण नष्ट हो जाते हैं, तब धर्म का पालन न करना और धर्म से विपरीत काम करना अर्थात् करने लायक काम को न करना और न करने लायक काम को करना रूप अधर्म सम्पूर्ण कुल को दबा लेता है अर्थात् सम्पूर्ण कुल में अधर्म छा जाता है।

     अब यहाँ यह शंका होती है कि जब कुल नष्ट हो जायगा, कुल रहेगा ही नहीं, तब अधर्म किसको दबायेगा? इसका उत्तर यह है कि जो लड़ाई के योग्य पुरुष हैं, वे तो युद्ध में मारे जाते हैं; किन्तु जो लड़ाई के योग्य नहीं हैं, ऐसे जो बालक और स्त्रियाँ पीछे बच जाती हैं, उनको अधर्म दबा लेता है। कारण कि जब युद्ध में शस्त्र, शास्त्र, व्यवहार आदि के जानकार और अनुभवी पुरुष मर जाते हैं, तब पीछे बचे लोगों को अच्छी शिक्षा देने वाले, उन पर शासन करने वाले नहीं रहते। इससे मर्यादा का, व्यवहार का ज्ञान न होने से वे मनमाना आचरण करने लग जाते हैं अर्थात् वे करने लायक काम को तो करते नहीं और न करने लायक काम को करने लग जाते हैं। इसलिये उनमें अधर्म फैल जाता है।

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    ⭐ गीता श्लोक सहित अध्ययन कीजिये क्योंकि -

    अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयो:।

    ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्ट: स्यामिति मे मति:॥ 18/70॥

    जो मनुष्य हम दोनों के इस धर्ममय संवाद का अध्ययन करेगा, उसके द्वारा भी मैं ज्ञानयज्ञ से पूजित होऊँगा — ऐसा मेरा मत है।

    ⭐ गीता को शेयर कीजिये क्योंकि -

    य इदं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति।

    भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशय:॥ 18/68॥

    मुझमें पराभक्ति करके जो इस परम गोपनीय संवाद गीता को मेरे भक्तों में कहेगा, वह मुझे ही प्राप्त होगा- इसमें कोई सन्देह नहीं है।

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    स्मरणीय तथ्य -

    1⃣ यह लेख स्वामी रामसुखदास जी द्वारा रचित साधक संजीवनी से लिया गया है।

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    इसे पढ़िए व शेयर कीजिये कृष्ण प्रसन्न होंगे।

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