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  • 【अध्याय 1 अर्जुनविषादयोग 41】

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    🐁🐁🐁🕯ॐ श्रीगणेशाय नम:🕯🐁🐁🐁
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    श्लोक -
    अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रिय:।
    स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसङ्कर ॥ 41।।
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    श्लोकार्थ -
    हे कृष्ण! अधर्म के अधिक बढ़ जाने से  कुल की स्त्रियाँ दूषित हो जाती हैं (और) हे वार्ष्णेय ! स्त्रियों के दूषित होने पर  वर्णसंकर पैदा हो जाते हैं।
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    शब्दार्थ -
    कृष्ण=हे कृष्ण!
    अधर्माभिभवात् = अधर्म के अधिक बढ़ जाने से
    कुलस्त्रिय:= कुल की स्त्रियाँ
    प्रदुष्यन्ति=दूषित हो जाती हैं (और)
    वार्ष्णेय =हे वार्ष्णेय!
    स्त्रीषु=स्त्रियों के
    दुष्टासु=दूषित होने पर
    वर्णसङ्कर:=वर्णसंकर
    जायते=पैदा हो जाते हैं।
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    भावार्थ -
    'अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रिय:’—धर्म का पालन करने से अन्त:करण शुद्ध हो जाता है। अन्त:करण शुद्ध होने से बुद्धि सात्त्विकी बन जाती है। सात्त्विकी बुद्धि में क्या करना चाहिये और क्या नहीं करना चाहिये—इसका विवेक जाग्रत् रहता है। परन्तु जब कुल में अधर्म बढ़ जाता है, तब आचरण अशुद्ध होने लगते हैं, जिससे अन्त:करण अशुद्ध हो जाता है। अन्त:करण अशुद्ध होने से बुद्धि तामसी बन जाती है। बुद्धि तामसी होने से मनुष्य अकर्तव्य को कर्तव्य और कर्तव्य को अकर्तव्य मानने लग जाता है अर्थात् उसमें शास्त्र-मर्यादा से उलटी बातें पैदा होने लग जाती हैं। इस विपरीत बुद्धि से कुल की स्त्रियाँ दूषित अर्थात् व्यभिचारिणी हो जाती हैं।

     'स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसङ्कर:’—स्त्रियों के दूषित होने पर वर्णसंकर पैदा हो जाता है ★1। पुरुष और स्त्री—दोनों अलग-अलग वर्ण के होने पर उनसे जो संतान पैदा होती है, वह 'वर्णसंकर’ कहलाती है।

     अर्जुन यहाँ 'कृष्ण’ सम्बोधन देकर यह कह रहे हैं कि आप सबको खींचने वाले होने से 'कृष्ण’  कहलाते हैं, तो आप यह बतायें कि हमारे कुल को आप किस तरफ खींचेंगे अर्थात् किधर ले जायँगे?

     'वार्ष्णेय’ सम्बोधन देने का भाव है कि आप वृष्णिवंश में अवतार लेने के कारण 'वार्ष्णेय’कहलाते हैं। परन्तु जब हमारे कुल-(वंश-) का नाश हो जायगा, तब हमारे वंशज किस कुल के कहलायेंगे? अत: कुल का नाश करना उचित नहीं है।
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    ★1
    परस्पर विरुद्ध धर्मों का मिश्रण होकर जो बनता है, उसको 'संकर' कहते हैं। जब कर्तव्य का पालन नही होता, तब धर्मसंकर, वर्णसंकर,जातिसंकर, कुलसंकर, वेशसंकर, भाषासङ्कर, आहारसंकर आदि अनेक संकरदोष आ जाते हैं।
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    ⭐ गीता श्लोक सहित अध्ययन कीजिये क्योंकि -

    अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयो:।
    ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्ट: स्यामिति मे मति:॥ 18/70॥

    जो मनुष्य हम दोनों के इस धर्ममय संवाद का अध्ययन करेगा, उसके द्वारा भी मैं ज्ञानयज्ञ से पूजित होऊँगा — ऐसा मेरा मत है।

    ⭐ गीता को शेयर कीजिये क्योंकि -

    य इदं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति।
    भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशय:॥ 18/68॥

    मुझमें पराभक्ति करके जो इस परम गोपनीय संवाद गीता को मेरे भक्तों में कहेगा, वह मुझे ही प्राप्त होगा- इसमें कोई सन्देह नहीं है।
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    स्मरणीय तथ्य -
    1⃣ यह लेख स्वामी रामसुखदास जी द्वारा रचित साधक संजीवनी से लिया गया है।
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    इसे पढ़िए व शेयर कीजिये कृष्ण प्रसन्न होंगे।
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